Donald Trump and Nationalism Wave

ट्रंप की जीत : राष्ट्रवाद की “वैश्विक धमक” दुनिया भर में खुद को स्वघोषित बुद्धिजीवी, तथाकथित रूप से प्रगतिशील और उदारवादी समझने वाले और वैसा कहलाने का शौक रखने वाले तमाम इंटेलेक्चुअल्स तथा मीडिया में बैठे धुरंधरों को लगातार एक के बाद एक झटके लगते जा रहे हैं, परन्तु उनकी बेशर्मी कहें या नादानी कहें वे लोग अभी भी अपनी स्वरचित आभासी मधुर दुनिया में न सिर्फ खोए हुए हैं, बल्कि उसी को पूरी दुनिया का प्रतिबिंब मानकर दूसरों को लगातार खारिज किए जा रहे हैं. वास्तव में हुआ यह है कि जिस प्रकार अफीम के नशे में व्यक्ति सारी दुनिया को पागल लेकिन स्वयं को खुदा समझता है, उसी प्रकार भारत सहित दुनिया भर में पसरा हुआ यह “बुद्धिजीवी और मीडियाई वर्ग” भी खुद को जमीन से चार इंच ऊपर समझता रहा है. इन कथित बुद्धिमानों को पता ही नहीं चल रहा है की दुनिया किस तरफ मुड़ चुकी है और ये लोग बिना स्टीयरिंग की गाडी लिए गर्त की दिशा में चले जा रहे हैं. वास्तव में इस “कथित प्रबुद्ध वर्ग” की सोच और मानसिक ढाँचे पर पहला सर्जिकल स्ट्राईक तो भारत की जनता ने 16 मई 2014 को ही कर दिया था, जब मीडियाई मुगलों और बौद्धिक कंगालों को धता बताते हुए दुनिया के सबसे बड़े, उदार और समझदार लोकतंत्र ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री चुन लिया था. पिछले ढाई वर्ष में मीडिया और बुद्धिजीवियों का यह वर्ग भारत में अब तक सदमे में है. उसकी अवस्था ऐसी हो गई है मानो कोई राह चलते कोई उन्हें तमाचा जड़ गया हो, वे समझ नहीं पा रहे हों कि आखिर यह तमाचा पड़ा तो क्यों पड़ा? नरेंद्र मोदी नामक शख्सियत से लगातार घृणा, असहमति और भेदभाव की इस भावना तथा स्वयं के श्रेष्ठ बुद्धिमान होने के अहंकार एवं झूठे स्वप्नदोष के कारण उनके दिलो-दिमाग में यह बात गहरे तक पैठ गई है कि हम तो कभी गलत हो ही नहीं सकते... तो आखिर नरेंद्र मोदी जीते तो जीते कैसे? नहीं... हम नहीं मानते... ना जी, हम दिल से उन्हें अपना प्रधानमंत्री नहीं मानते. यही सब कुछ अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद हो रहा है.असल में एक शब्द है “राष्ट्रवाद” अर्थात ऐसी विचारधारा जिसके लिए “राष्ट्र प्रथम” है, बाकी सब कुछ गौण है, पीछे है. भारत के अंग्रेजीदां लोग इसी को “नेशन फर्स्ट” कहते जरूर हैं, लेकिन हिकारत भरी जुबान और खुरदुरे दिल से. बुद्धिजीवियों और मीडिया में बैठे तथाकथित प्रगतिशीलों एवं उदारवादियों के लिए “राष्ट्रवाद” नाम का शब्द या तो मखौल उड़ाने के लिए होता है, अथवा घृणास्पद होता है. क्योंकि ऐसे लोगों की पश्चिमी और कान्वेंटी समझ उन्हें अपने वैचारिक कुँए से बाहर आने ही नहीं देती. ये लोग अपने ही समविचारी गिरोह के लोगों को स्टूडियो और अखबारों के प्रमुख कॉलमों में स्थान देकर एक-दुसरे की बात पर ताली बजाया करते हैं. ऐसा ही इन्होने नरेंद्र मोदी के समय 2002 से लेकर 2014 तक लगातार किया और इसी वर्ग के अंतर्राष्ट्रीय गिरोह ने डोनाल्ड ट्रंप को लेकर अमेरिका में किया... बीच में इसी “बौद्धिक”(??) वर्ग ने ब्रिटेन के यूरोप से अलग होने के लिए की जाने वाली वोटिंग (अर्थात ब्रेक्जिट) के समय भी अपनी “कालबाह्य सोच” को लगातार विश्व पर थोपे रखा. ब्रिटेन और यूरोप पर मंडराते इस्लामी खतरे को यह मीडियाई वर्ग कतई नहीं समझ सका, क्योंकि इनकी सोच में “राष्ट्रवाद” कहीं आता ही नहीं. परन्तु ब्रिटेन की जनता ने इस बुद्धिजीवी एवं प्रगतिशील गिरोह के मुंह पर लगातार दूसरा तमाचा जड़ दिया और अंततः ब्रिटेन की जनता ने बहुमत से इस्लामी काली छाया और शरणार्थियों के आर्थिक बोझ तले चरमराने की शुरुआत वाले यूरोप से अलग होने का फैसला कर लिया. यह “वैश्विक राष्ट्रवाद” की लहर की दूसरी बड़ी जीत थी और कथित उदारवादियों एवं मीडियाई मुगलों की मुसीबत का दूसरा चरण. हाल ही में अमेरिका में भी राष्ट्रपति के चुनाव संपन्न हुए. लगातार दो बार झटके खा चुके और जनता के मतदान में अपना हाथ-मुँह जला चुके मीडियाई/बुद्धिजीवी वर्ग को फिर से अपनी नकली समझदारी दिखाने का सुनहरा मौका दिखाई दिया. इस वर्ग ने अमेरिका की जमीनी स्थिति, वहां के मतदाताओं के मनोमस्तिष्क तथा वास्तविक समस्याओं को पूरी तरह नज़रंदाज़ करते हुए ओबामा की उत्तराधिकारी के रूप में हिलेरी क्लिंटन को परिणामों से पहले ही “अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति” तक घोषित कर दिया था. इन्हें ऐसा लगता था मानो चुनाव परिणाम केवल औपचारिकता भर हैं. भारत से भी बरखा दत्त समेत कई “पत्तलकार” अमेरिका चुनाव का कवरेज करने वहाँ गए थे. वास्तव में ये लोग निष्पक्ष पत्रकार की हैसियत से “कवरेज” करने नहीं गए थे, अपितु विश्व की तमाम दूसरी मीडियाई शख्सियतों के साथ मिलकर हिलेरी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने गए थे. अमेरिका की एक प्रसिद्ध पत्रिका ने तो हिलेरी क्लिंटन के आमुख कवर वाली दस लाख पत्रिकाएँ भी छपवाकर रख ली थीं, ताकि परिणामों के तत्काल बाद उसे मार्केट में उतारा जा सके. लेकिन हा दुर्भाग्य!!! हाय रे फूटी किस्मत!!! दुनिया भर के बुद्धिजीवी और जमाने भर का मीडिया जिस व्यक्ति अर्थात डोनाल्ड ट्रंप को पागल, सनकी, हिटलर, स्त्री-विरोधी, मुस्लिमों का संहारक इत्यादि चित्रित करता रहा उसने बड़े आराम से चुनाव जीतकर इन सभी बुद्धिजीवियों के मुँह पर दो वर्ष के भीतर “तीसरा राष्ट्रवादी तमाचा” जड़ दिया. पिछले तीन वर्ष के दौरान भारत में जिस तरह से नरेंद्र मोदी के उभार और सीरिया-ईराक में आतंकी मुस्लिम संगठन आईसिस के घृणित कारनामों की वजह से समूचे विश्व में “राष्ट्रवाद” की लहर पैदा हुई है और लगातार बढ़ती जा रही है, उसे समझने में तथाकथित प्रगतिशील तबका पूरी तरह विफल रहा है. उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि दुनिया अब इनके पक्षपाती रवैये तथा दोमुंही बातों एवं कथनों से न सिर्फ ऊब चुकी है, बल्कि इन्हें लगभग खारिज भी कर चुकी है. विश्व के अलग-अलग भागों (भारत, ब्रिटेन और अमेरिका) में लगातार तीन-तीन बड़ी मात खाने के बावजूद “राष्ट्रवाद” की अवधारणा को समझने ये लोग नाकाम रहे हैं. यह विषय इन्हें आज भी मजाक उड़ाने अथवा खुद की सड़ी हुई वैचारिक श्रेष्ठता को दर्शाने का अवसर प्रतीत होता है, जबकि विश्व भर में राष्ट्रवाद की लहर ही नहीं, तूफ़ान चल रहा है और इधर यह वर्ग शतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सिर गड़ाए इस नए वैचारिक आन्दोलन की तरफ अपना पिछवाड़ा किए हुए है. डोनाल्ड ट्रंप की जीत ने इस वर्ग की चूलें हिला दी हैं. जिस ट्रंप को ये लोग लगातार नस्लवादी, बददिमाग और हिटलर वगैरह कहते रहे, वह आज अमेरिका का राष्ट्रपति है और अगले चार वर्ष (या शायद आठ वर्ष) उन्हीं के साथ बिताना है, चाहे अच्छा लगे या बुरा, यही स्थिति भारत में नरेंद्र मोदी की भी है. संभवतः 2024 तक तो कथित बुद्धिजीवियों और नकली प्रगतिशीलों को नरेंद्र मोदी की सत्ता के साए तले जीना होगा. इन्हें यह चिंता खाए जा रही है कि आखिर हमारे अनुमान बारम्बार गलत क्यों सिद्ध हो रहे हैं? दुनिया राष्ट्रवाद की तरफ क्यों बढ़ रही है? हमारी बातें और “भीषण कुप्रचार” भी जनता को प्रभावित क्यों नहीं कर पा रहा है? यह सोच-सोचकर इन बुद्धिजीवियों के दिमाग का दही बनता जा रहा है. भारत में नरेंद्र मोदी ने नारा दिया था, “अबकी बार मोदी सरकार”. इसी की नकल करते हुए भारतीय समुदाय को लुभाने के लिए ब्रिटेन के चुनावों में भी डेविड कैमरन ने नारा दिया था “अबकी बार, कैमरन सरकार” और वे भी जीते. नरेंद्र मोदी की खिल्ली उड़ाने वाले गिरोह ने इस नारे की भी खिल्ली उडाई, लेकिन अमेरिका के हालिया चुनावों में जब डोनाल्ड ट्रंप के बेटे हिन्दू मंदिरों में आशीर्वाद ग्रहण करने गए और एक छोटी ही सही, लेकिन काफी प्रभावी शक्ति अर्थात भारतीय समुदाय में नरेंद्र मोदी की चमकदार छवि के मद्देनज़र जब डोनाल्ड ट्रंप ने भी “अबकी बार, ट्रंप सरकार” का नारा दिया, उस समय भी इस वैचारिक कंगाल गिरोह ने उनकी भी जमकर खिल्ली उड़ाई, लेकिन जब ट्रंप भी जीत गए तो इनकी बोलती बंद हो गई. इस समय अमेरिका की जो वित्तीय हालत है उसे देखते हुए ट्रंप की यह जीत बिलकुल उसके मनमाफिक है, यही कुछ नरेंद्र मोदी के समय भी हुआ था, जब भारत की जनता मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी की सरकार के भीषण भ्रष्टाचार एवं कुशासन से त्रस्त होकर एक नया ईमानदार एवं स्पष्ट वक्ता नेता खोज रही थी. उसी प्रकार आठ वर्ष के ओबामा प्रशासन के दौरान अमेरिका में बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी, चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था इत्यादि ने अमेरिकी जनता को निराश कर दिया था. इन सारी समस्याओं के अतिरिक्त एक बात और थी जिससे आम अमेरिकी नागरिक चिढ़ा हुआ था, और वह थी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की घटती साख. जिसे हम भारत में “दबंगई” कहते हैं, वही मनोभाव अमेरिकी जनता में वैश्विक स्तर पर भी है की “हम अमेरिकी सर्वश्रेष्ठ हैं, हमसे कोई मुकाबला नहीं कर सकता, हम से कोई लड़ नहीं सकता... इत्यादि”. इस “साख” को ओबामा के शासनकाल में खासी चोट पहुँची थी. चीन ने जिस तरह अमेरिका को दो-तीन बार सम्पूर्ण विश्व के सामने शर्मसार किया और उसकी औकात दिखाई, उससे अमेरिकी “स्वाभिमान” को ठेस लगी, सीरिया में जिस तरह रूस ने अमेरिका की बातों पर कान नहीं दिया, उसने भी अमरीकियों को सोचने पर मजबूर किया, यही बात ट्रंप की जीत में मददगार साबित हुई, क्योंकि ट्रम्प का नारा था “लेट्स बिल्ड न्यू अमेरिका” (अर्थात आओ एक नया अमेरिका का निर्माण करें). जिस तरह से मैक्सिको से शरणार्थियों का बोझ अमेरिका पर बढ़ता जा रहा था और मैक्सिको के लोगों द्वारा अमेरिकी समाज के अन्दर अपराधों को बढ़ावा दिया जा रहा था, उसने सामान्य अमेरिकी को क्रोधित और निराश कर रखा था. ब्रिटेन में “ब्रेग्जिट” का नतीजों ने अमेरिकी जनमानस पर गहरा प्रभाव डाला. अमेरिकी नागरिकों को यह लगने लगा कि जिस प्रकार यूरोप में इस्लामिक शरणार्थी उनके संसाधनों पर बोझ बनते जा रहे हैं, नौकरियाँ हथिया रहे हैं, अपराध बढ़ा रहे हैं, वैसा ही हमारे यहाँ मैक्सिको के लाखों लोग कर रहे हैं, इन्हें यहाँ से हटाना अथवा दबाना बेहद जरूरी है, वर्ना अमेरिका का भविष्य खतरे में है. इसी बात को डोनाल्ड ट्रंप ने समय पर लपक लिया. जमीनी सच्चाई से दूर जिस कथित बुद्धिजीवी वर्ग ने डोनाल्ड ट्रंप के मुद्दों को “असंवेदनशीलता” और “हिटलरशाही” अथवा “पागलपन” कहते हुए अपने दिन गुज़ारे उन्हें पता ही नहीं था कि अमेरिकी जनता क्या सोच रही है. अमेरिकी समाज अन्दर ही अन्दर कैसा खदबदा रहा है. जिस मार्जिन से डोनाल्ड ट्रंप जीते हैं, वह इस बात को साबित करता है कि ट्रंप अमेरिकी लोगों की नब्ज को अच्छी तरह से पकड़ते हैं, जानते-समझते हैं. जहां तक डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की राजनीति और प्रचार अभियान का सवाल है, यह आराम से कहा जा सकता है कि हिलेरी कभी भी “जमीनी अमेरिका” के साथ नहीं थीं, और इस बात को अमेरिकी जनता ने अच्छी तरह समझ लिया था. अमेरिकी परिणामों ने ज्यादातर चुनाव सर्वेक्षणों को गलत साबित कर दिया. 19 में से केवल दो अंतिम सर्वेक्षणों में डोनाल्ड ट्रंप को हिलेरी क्लिंटन से आगे बताया गया था. चुनाव से दो दिनों पहले सभी बड़े चुनाव सर्वेक्षणों पर नजर रखने वाली “रियल क्लियर पॉलिटिक्स” ने हिलेरी की औसत बढ़त को घटाया जरुर था लेकिन कहा था कि अभी भी ट्रंप पर उनकी 1.6 प्रतिशत की बढ़त है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने नेट सिल्वर के पोल्स ओनली मॉडल से बताया कि हिलेरी के जीतने की संभावना 67.8 फीसद है. हफिंगटन पोस्ट तो ट्रंप से घृणा करने के मामले इतना आगे निकल गया की उसने हिलेरी की जीत की संभावना 97.9 फीसद बता डाली. भारत से भी बरखा दत्त ट्वीट पर ट्वीट मारे जा रहीं थी की हम एक इतिहास बनता हुआ देखने आए हैं, अमेरिका को पहली महिला राष्ट्रपति मिलने जा रही है आदि-आदि. ज़ाहिर है कि ये लोग अमेरिकी जनता से पूरी तरह कटे हुए थे. हिलेरी की पराजय एवं ट्रंप की विजय का अर्थ है कि अमेरिकी जनमानस में “व्यापक परिवर्तन” आ चुका है. स्वयं को विवेकशील मानने वाले ज्यादातर लोग मानते थे कि अमेरिका के लोग इतने समझदार हैं कि वे एक “अतिवादी” और नस्ली सोच रखने वाले डोनाल्ड ट्रंप को देश का सर्वोच्च पद और सेना का सर्वोच्च कमान नहीं दे सकते, ऐसा ही कुछ इन लोगों ने मई 2014 में भी भारत के बारे में कहा था. इन सब “कथित बुद्धिजीवियों” की सोच और अनुमान गलत साबित हुए हैं. वास्तव में देखा जाए तो हिलेरी क्लिंटन की पराजय एवं ट्रंप की विजय कोई सामान्य घटना नहीं है. कुछ लोग इसे इस दृष्टि से देखेंगे कि 1789 से शुरू हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के 227 वर्ष के इतिहास में पहली बार किसी पार्टी की प्रत्याशी बनी महिला सर्वोच्च पद पर पहुंचने से चूक गई, जबकि अमेरिका ने बराक ओबामा के रुप में एक “अश्वेत” को पहली बार राष्ट्रपति बनाकर इतिहास रचा था. अब उसके सामने एक महिला को निर्वाचित कर इतिहास बनाने का अवसर था. लेकिन अमेरिकी मतदाताओं का बहुमत दूसरी दिशा में ही सोच रहा था. इसीलिए जैसे-जैसे सर्वेक्षण एजेंसियां हिलेरी को आगे बताने लगीं अमेरिकी मतदाताओं का बड़ा वर्ग आक्रामक हो गया. जिस तरह से आरंभ में ही लोगों ने मतदान का रिकॉर्ड तोड़ा उससे साफ था कि अमेरिका नया करवट लेने वाला है, जो कईयों को हैरान कर देगा. मैं जानता हूँ कि पाठकों को यह सब भारत के चुनावों का “री-प्ले” जैसा लग रहा होगा, यहाँ भी यही खेल खेला गया था, लेकिन जैसे-जैसे कथित चुनाव “विश्लेषक”(??) नरेंद्र मोदी को बहुमत से पिछड़ता हुआ दिखाते थे, मोदी के खिलाफ आग उगलते थे, मोदी को बदनाम करने की कोशिश करते थे... भारत का जनमानस उतनी ही तेजी से मोदी के साथ आता जा रहा था. अमेरिका में भी ट्रंप को लेकर जनमानस के बीच भय पैदा करने की कोशिश की गई. दोनों उम्मीदवारों के बीच हुई तीनों बहस में “विचारकों”(??) द्वारा यह माना गया कि ट्रंप पराजित हो गए हैं. लेकिन यह निष्कर्ष सही नहीं था. भले ही ट्रंप की बातों से थोड़ी अशालीनता की बू आती थी. मसलन, उन्होंने हिलेरी पर निजी हमले तक किए. उनके विदेश मंत्री रहते समय निजी ईमेल का प्रश्न उठाकर कह दिया कि अगर वे राष्ट्रपति बने तो उनकी जगह जेल में होगी. अंततः हिलेरी को रक्षात्मक होना ही पड़ा. ऐसा नहीं था कि हिलेरी खेमे ने ट्रंप के खिलाफ महिला मुद्दों को प्रमुखता देने की कोशिश नहीं की. 40 महिलाएँ खोजकर लाई गईं जिन्होंने ट्रंप के चरित्र पर प्रश्न उठा दिया. इसे उनके खिलाफ मुद्दा बनाया गया. ट्रम्प के महिलाओं के खिलाफ सेक्सी कमेंट्स, महिलाओं से उनके रिश्ते और उनका बर्ताव मुद्दा बन गया था. महिलाओं को लुभाने के लिए हिलेरी का खास अभियान… “वुमन टू वुमन फोन बैंक” जैसे अभियान चलाए गए. अमेरिका में कुल 21 करोड़ 89 लाख 59 हजार मतदाता हैं. इसमें 14 करोड़ 63 लाख 11 हजार लोग रजिस्टर्ड हैं. रजिस्टर्ड मतदाताओं में 69.1 प्रतिशत पुरुष और 72.8 प्रतिशत महिलाएं हैं, यानी महिलाओं की संख्या ज्यादा है. वो किसी का समर्थन कर दें उसका जीतना निश्चित माना जाता है. स्वाभाविक है कि हिलेरी महिलाओं के खिलाफ ट्रंप की टिप्पणियों को अपने पक्ष में भुनाने में सफल नहीं रहीं. किंतु डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में दो बातें प्रमुखता से छा गईं - आतंकवाद के खिलाफ खरी-खरी और स्पष्ट बात करना तथा अमेरिकियों के अंदर “महाशक्ति राष्ट्रवाद” का भाव पैदा करना. उन्होंने अमेरिकियों के दिल में नए सिरे से अमेरिकी राष्ट्रवाद का एक श्रेष्ठता बोध पैदा किया, जिसमें अमेरिका को फिर से दुनिया का ऐसा महान राष्ट्र बनाने का वायदा था जो वास्तविक महाशक्ति होगा, तथा दुनिया के देश जिसकी इज्जत करेंगे और टकराने अथवा विरोध करने की हिम्मत नहीं करेंगे. महाशक्ति की गिरती महिमा के बीच इस “राष्ट्रवादी भावना” ने अमेरिकियों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया. इस समय जेहादी आतंकवाद ने जिस तरह दुनिया भर में भय पैदा किया हुआ है उससे अमेरिका भी अछूता नहीं है. कड़ी सुरक्षा के बावजूद वहां भी आए दिन कुछ न कुछ छिटपुट घटनाएँ हो ही रही हैं. इराक से लेकर अफगानिस्तान में अमेरिकियों को आतंकवाद की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है. इस स्थिति में ट्रंप ने अभी तक के सभी अमेरिकी नेताओं से भिन्न अपना विशेष मत व्यक्त किया. जब वे रिपब्लिकन उम्मीदवार के रुप में जनता के सामने आए, और मुसलमानों के खिलाफ बोलना आरंभ किया तो शुरुआत में लोगों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. आतंकवाद की चर्चा करते हुए अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की बात की, तो लगा कि कोई फासिस्ट ताकत अमेरिका में उभार ले रही है, जिसे उसकी पार्टी ही अंदरूनी रूप से पराजित कर देगी. तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग वाले लोग ऐसा सोचते रहे, और उधर वो लगातार ऐसे बयान देकर ग्रामीण और रूढ़िवादी अमेरिकी मन में समर्थन पाते रहे. ट्रंप का रिपब्लिकन उम्मीदवार बन जाना ही “बदले हुए अमेरिका” का प्रतीक था. वही बदला हुआ अमेरिका परिणाम के रुप में भी दिखा. यह सामान्य बात नहीं है कि, ट्रंप के आक्रामक राष्ट्रवाद और स्थानीयों को नौकरी में प्राथमिकता के बावजूद अमेरिकी भारतीयों के बड़े समूह ने ट्रंप के पक्ष में मतदान किया है. हालांकि चुनाव परिणाम के पीछे कुछ विश्लेषक आर्थिक मुद्दों को भी महत्वपूर्ण मान रहे हैं. आर्थिक मुद्दे अमेरिकी चुनाव में हमेशा भूमिका निभाते हैं. यहां भी ट्रंप ने अमेरिका के लिए एक नए “आर्थिक राष्ट्रवाद” की उग्र वकालत की. मसलन, उन्होंने महाशक्ति अमेरिका को कमजोर करने के लिए ओबामा सरकार को जिम्मेवार ठहराया. उन्होंने कहा कि जब भारत जैसा देश 8 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है, तो फिर अमेरिका क्यों नहीं कर सकता. उन्होंने आईबीएम जैसी कंपनियों को धमकी भी दी, कि उसने अपना काम भारत में ज्यादा स्थानांतरित कर दिया है, इसलिए अगर वो राष्ट्रपति बने तो उस पर भारी कर जुर्माना लगाएंगे. यह बात वहां के बेरोजगार या रोजगार तलाशते युवाओं के लिए आकर्षक साबित हुई. अमेरिका इस समय दो हिस्सों में बंटा हुआ है. एक हिस्सा पढ़े-लिखे, उदारवादी और सेक्युलर लोगों का है, तो दूसरा हिस्सा रूढ़िवादी, धार्मिक, श्रम वर्ग और शहर से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में कम पढ़े-लिखे लोगों का है. दूसरे हिस्से की तादाद वहां ज्यादा है. रिपब्लिकन पार्टी ने इन्हीं के बीच अपने चुनाव प्रचार के जरिये अमेरिका को दोबारा से एक ‘ग्रेट नेशन’ बनाने का आंदोलन चलाया था और कहा कि दुनिया में ‘अमेरिका फर्स्ट’ होगा. इस आंदोलन का तमाम रूढ़िवादियों, धार्मिकों, श्रम वर्गों और कम पढ़े-लिखे अमेरिकियों ने समर्थन किया था, जिसे तथाकथित उच्च वर्गीय “क्लब छाप” बुद्धिजीवी समझ ही नहीं पाए. ट्रंप का यह चुनाव प्रचार कामयाब रहा और वे जीत की तरफ बढ़े. अमेरिकी लोगों को यह यकीन हो चला था कि वहां नौकरियाँ आएँगी. “बाहरी” (यानी मैक्सिकन) लोगों को निकाला जायेगा, विकास और वैश्विक व्यापार का नया आयाम स्थापित होगा, सड़कें और पुल बनेंगे, स्वास्थ्य सेवा में सुधार होगा, “ओबामा केयर” जैसी खर्चीली योजना को खारिज करके नई स्वास्थ्य बीमा योजना आएगी. ‘ग्रेट नेशन’ बनाने के लिए ये सारे वादे ट्रंप ने किये हैं. अमेरिका को ‘ग्रेट नेशन’ बनाने का ट्रंप का यही सपना अमेरिका के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि ट्रंप के वायदे बड़े हैं और अब उन्हें पूरा करके दिखाना होगा. यही बात नरेंद्र मोदी पर लागू होती है कि जनता की उम्मीदें बहुत बड़ी हैं और समय कम है. अब तो यह समय ही बतायेगा, कि ये दोनों इसमें कितना सफल होते हैं. लेकिन “राष्ट्रवाद” और “नेशन फर्स्ट” की मनोभावना को दोनों ने पूरे विश्व में एक विशेष स्थान दिलवा दिया है. थोड़ी देर के लिए कहा जा सकता है कि ट्रंप की विजय ने हमें एक ऐसे अमेरिका का अहसास कराया है, जिससे किंचित भय एवं आशंका पैदा होती है, परन्तु ट्रंप की नीतियों के बारे में कोई भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगी. हालांकि उन्होंने अपने पहले भाषण में कहा है कि मैं सभी अमेरिकियों का राष्ट्रपति होउंगा और “सबका साथ सबका विकास” करके हम अपने महान देश को और महान बनाएंगे. किंतु इसके लिए अभी हमें थोड़ा इंतजार करना होगा. ट्रंप ने सबसे पहले यूरोप के साथ अच्छे संबंध रखने की बात की है. उनका मानना है कि रक्षा मामलों में उसे यूरोप का काफी सहयोग जरूरी है, यह काम अमेरिका अकेले नहीं कर सकता. दोनों में काफी मतभेदों के साथ यह एक बड़ा बदलाव है अमेरिका की विदेश नीति में. दूसरी तरफ मध्य-पूर्व (मिडिल इस्ट) के लिए जो अमेरिकी नीति है, उससे मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ सकता है, क्योंकि उस नीति के तहत सेना के जरिये ही मसलों को हल करने के बारे में अमेरिका सोच रहा है. मिडिल इस्ट, सऊदी अरब और गल्फ के देश चाहते हैं कि उनके ऊपर से अमेरिकी निर्भरता कम हो, इसे लेकर भी अमेरिका को पुनर्विचार की जरूरत होगी. मेरे ख्याल में अमेरिका का यह सत्ता परिवर्तन अपनी नीतियों में थोड़ी सख्ती रखेगा, जैसा कि जॉर्ज बुश ने किया था. स्वाभाविक है कि दुनिया के लिए अमेरिकी सत्ता का परिवर्तन कुछ नया लेकर जरूर आयेगा, लेकिन उसका स्वरूप क्या होगा, यह देखनेवाली बात होगी. जहां तक ट्रंप की जीत का भारत के लिए मायने का सवाल है, तो अमेरिका कभी भी भारत को अनदेखा नहीं कर सकता, क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा “मध्यमवर्गीय मार्केट” है. भारत में काफी तादाद में अंगरेजी बोलनेवाले, कंप्यूटर का इस्तेमाल करनेवाले लोग हैं और तकनीकी रूप से बहुत सक्षम हैं. भारत में सस्ता श्रम उपलब्ध है, इन सबका फायदा अमेरिका उठाता रहा है और आगे भी उठायेगा क्योंकि जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि अमेरिका एक विशुद्ध व्यापारी देश है, वह भारत को नाराज करने का खतरा मोल नहीं ले सकता. भारत और अमेरिका दोनों में लोकतांत्रिक व्यवस्था है. दोनों के बीच फिलहाल सौ बिलियन डॉलर का व्यापार है, जो आगामी वर्षों में पांच सौ बिलियन डॉलर होने की संभावना है. अमेरिका के अंदर जितने भी भारतीय हैं, वे सभी बहुत अच्छे काम कर रहे हैं, नौकरियों का सृजन कर रहे हैं और अच्छे-अच्छे पदों पर हैं. अमेरिका के आइटी सेक्टर में भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान है. इन सबके चलते अमेरिका कभी भी भारत के साथ संबंधों को खराब नहीं होने देना चाहेगा. हालांकि, ट्रंप यह कह रहे हैं कि आइटी सेक्टर में अमेरिकी लोगों के लिए नौकरियों का सृजन करेंगे, लेकिन यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि अमेरिका में श्रम महंगा है. इस क्षेत्र में भारत का मुकाबला करना अमेरिका के लिए फिलहाल संभव नहीं लगता. मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन वहीं काम करते हैं, जहां फायदा होता है. अमेरिका में किसी चीज को बनाने में अगर दस डॉलर खर्च आता है, तो उसी चीज को दूसरे देशों में छह-आठ डॉलर में बनाया जा सकता है. डोनाल्ड ट्रंप का “आर्थिक राष्ट्रवाद” इन छोटी-मोटी कठिनाईयों के साथ भी भारत के साथ अच्छा संबंध बनाए रखेगा. ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान आउटसोर्सिंग और बाहरी लोगों की नौकरी के मुद्दे पर काफी जोर देते हुए भारत विरोधी बयान भी दिया था. आईटी सेक्टर की अमरीकी नौकरियों का बड़ा हिस्सा पहले ही भारतीयों के कब्जे में है. भारत का ज्यादातर आईटी निर्यात अमरीका को ही होता है. ऐसे में यदि ट्रंप का बयान सिर्फ चुनावी जुमला ना होकर, किसी नीतिगत कदम में तब्दील हुआ तो इन सेक्टरों की नौकरियों पर असर देखने को मिल सकता है. इन कदमों को उठाने के लिए उन पर स्थानीय कर्मचारी यूनियनों का भी दबाव रहेगा. इन आशंकाओं के चलते एक्सपर्ट्स ट्रंप की तुलना में हिलेरी को भारत के लिए बेहतर मान रहे थे. परन्तु मेरा अनुमान यह है कि डोनाल्ड ट्रंप स्वयं एक सफल व्यापारी रहे हैं, व्यापार उनके खून में है. इसलिए भारत के आईटी पेशेवरों को नाराज करके अथवा अमेरिका में महंगे श्रम को प्राथमिकता देकर वे अमेरिका का नुक्सान नहीं करना चाहेंगे. हाँ, अलबत्ता भारत के फार्मा सेक्टर पर ट्रंप की नीतियों का क्या असर पड़ेगा यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि डेमोक्रेटिक ओबामा की “बदनाम हेल्थकेयर पॉलिसी” के चलते सन फार्मा, ल्यूपिन समेत तमाम भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए अमरीकी बाजार में अच्छी संभावनाएं बनी थीं. ट्रंप पहले ही इस पॉलिसी की समीक्षा की बात कह चुके हैं. ऐसे में USFDA से दवाओं को मंजूरी मिलने में समस्या आ सकती है, साथ ही विदेशी फार्मा कंपनियों पर ट्रंप सख्ती बरतते हैं तो राजस्व और फार्मा नौकरियों के मामले में भारत पर इसका बड़ा असर देखने को मिलेगा. हिलेरी क्लिंटन की “इन्वेस्टर-फ्रेंडली इमेज” के चलते दुनियाभर में उनकी जीत के लिए दुआएं की जा रही थीं. लेकिन तमाम अटकलों के बावजूद ट्रंप को अचानक मिली जीत का दुनियाभर के बाजारों पर नकारात्मक असर पड़ा है. वैश्विक अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ इसे दूरगामी समय के लिए इसे ब्रेक्जिट से भी ज्यादा खतरनाक मान रहे हैं. ट्रंप की जीत के संकेत मिलते ही डॉलर में येन और यूरो के मुकाबले गिरावट शुरू हो गई थी, परन्तु यह तात्कालिक भी हो सकता है. अभी हमें डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण, उनके मंत्रिमंडल और नीतियों की घोषणा का इंतज़ार करना चाहिए. अमेरिका के लिए भारत इसलिए भी बहुत मायने रखता है, क्योंकि चीन को लेकर अमेरिका के काफी मतभेद हैं. पाकिस्तान की नीतियां जैसी हैं, उसके चलते भी अमेरिका को भारत की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि पाकिस्तान इस समय ग्वादर बंदरगाह और व्यापारिक कॉरीडोर के कारण पूरी तरह से चीन के साथ है. मैं समझता हूं कि आनेवाले समय में पाकिस्तान के ऊपर और भी दबाव बढ़ जायेगा कि वह अमेरिका या चीन में से किसी एक को अपना “मालिक” चुने. चूंकि अमेरिका ने ही पाकिस्तान को भीख देकर मजबूत बनाने की कोशिश की है, और अमेरिकी बैसाखियों पर ही पाकिस्तान अब तक जिंदा रहा है. साथ ही पाकिस्तान के सारे हथियार अमेरिका ने ही पाकिस्तान को दिए हुए हैं. अमेरिका की जो लड़ाई सीरिया और ईराक में कट्टरपंथी इस्लाम के साथ है, वह अपनी जगह पर है, लेकिन फिर भी अमेरिका चाहेगा कि दक्षिण एशिया में भारत के सिर पर एक लटकती हुई तलवार के रूप में पाकिस्तान का उपयोग बीच-बीच में किया जाता रहे. अतः अमेरिका का राष्ट्रपति कोई भी बने, भारत में इस बात को लेकर ना तो दुखी होने की जरूरत है कि ट्रंप आ गये, तो अब क्या होगा... ना ही इतना खुश होने की जरूरत थी कि हिलेरी आ जातीं तो भारत स्वर्ग बन जाता. अमेरिका एक पूंजीवादी देश है और वह अपनी सैन्य ताकत और उससे उत्पन्न होने वाले “रोज़गार” पर चलता है. दुनिया वाले कुछ भी सोचते रहें, अमरीकी जनता के मन में यह अवधारणा बहुत गहरे तक पैठ किए हुए है, कि पूरी दुनिया में अमेरिका ही अव्वल देश है और दुनिया का कोई भी देश अमेरिका का मुकाबला नहीं कर सकता. अपने फायदे के लिए अमेरिका कुछ भी करेगा, और उसकी यह नीति ट्रम्प के कारण नहीं है, बल्कि चार सौ वर्ष पुरानी है. डोनाल्ड ट्रंप की जीत से दुनियाभर के शेयर बाजारों में जबर्दस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. जो कि एक स्वाभाविक घटनाक्रम है. अब आगे यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि ओबामा और बुश की तुलना में ट्रंप भारत के लिए कितने फायदेमंद साबित होंगे. उनके चुनावी भाषणों और बयानों के विश्लेषण के आधार पर विशेषज्ञ इंडो-यूएस ट्रेड के लिए बड़े झटके की आशंका जता रहे हैं. यदि आईटी क्षेत्र को छोड़ दें तो खासतौर से भारतीय फार्मा, और आईटीएस इंडस्ट्री पर ट्रंप की नीतियों का व्यापक असर हो सकता है. उल्लेखनीय बात यह है कि द्विपक्षीय व्यापार में आयात-निर्यात के मामले में फिलहाल भारत फायदे में है, जिसे ट्रम्प बदलना चाहेंगे. भारत-अमरीका के बीच करीब 4 लाख 29 हजार करोड़ से ज्यादा का द्विपक्षीय व्यापार है। इसमें से भारत करीब 2 लाख 83 हजार करोड़ रुपए का निर्यात, और एक लाख 46 हजार करोड़ रुपए का ही आयात करता है. ज़ाहिर है यह द्विपक्षीय व्यापार हमेशा से भारत के लिए फायदेमंद रहा है, लेकिन रिपब्लिकन नेताओं की “राष्ट्रवादी नीतियों” के अनुसार आयात घटाने पर उनका हमेशा से विशेष फोकस रहा है. तो कुछेक मामलों में ट्रंप की जीत द्विपक्षीय व्यापार में भारत के लिए हानिकारक भी हो सकती है. भारत अमरीका से सोना, एयरक्राफ्ट्स, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल, ऑप्टिक्स, मेडिकल इंस्ट्रुमेंट्स आदि आयात करता है. जबकि अमरीका भारत से टेक्सटाइल, ऑर्गेनिक केमिकल, मिनरल फ्यूल, फार्मा प्रोडक्ट्स, मसाले, ट्री नट्स, वेज ऑयल और सॉफ्टवेयर खरीदता है. हालांकि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने डोनाल्ड ट्रंप के बारे में बहुत सी अच्छी और सकारात्मक बातें कही हैं, लेकिन पुतिन जिस रूस का प्रतिनिधित्व करते हैं, उस रूस से “बुनियादी टकराव” अगर किसी के साथ है, तो वह अमेरिका ही है. परस्पर सहृदयता दिखाते हुए ट्रंप ने भी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की एक मजबूत नेता के रूप में कई बार तारीफ़ की है और ख़ुफ़िया सूत्रों से मिली उन चेतावनियों को उन्होंने नजरंदाज कर दिया, जिसके अनुसार अमेरिका और पश्चिमी देशों में बड़े पैमाने पर होनेवाली साइबर-हैकिंग के पीछे रूस और चीन ही हैं. रूस ने जब यूक्रेन पर हमला किया था, उस समय भी ट्रंप ने खुद को रूस की आलोचना करने से बचा लिया था. अतः इस मामले में भी अब नया मोड़ सामने आ सकता है. इस समय सीरिया और पश्चिम एशिया तथा यूरोप में जैसा संघर्ष चल रहा है उसे देखते हुए यह माना जा सकता है कि रूस और अमेरिका के बीच जो मधुर सम्बन्ध बनते दिखाई दे रहे हैं वे स्थायी नहीं रहेंगे. दूसरी तरफ चीन भी है, जिससे अमेरिकी हितों का सीधा टकराव है. अब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बन गए हैं तो इसका अर्थ यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के “आर्थिक राष्ट्रवाद” की नीति के कारण चीन से उनका टकराव जारी रहेगा, बल्कि तेज़ भी हो सकता है. चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिमी देशों को उन्होंने आगाह किया था कि अमेरिका नाटो गठबंधन को मदद देना बंद कर सकता है. अपने “राष्ट्रवाद” को परिभाषित करते हुए उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि जब बात अमेरिकी सैन्य और आर्थिक हितों से जुड़ी होगी, तो वे अमेरिका का हित सबसे पहले देखेंगे, नाटो या ब्रिटेन का बाद में. इसीलिए ट्रंप के सत्ता में आने से ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे के सामने भी चुनौती पैदा हो गई है, क्योंकि पूर्व में वे सीधे तौर पर उनकी आलोचना कर चुकी हैं. ईरान के साथ की गयी न्यूक्लियर डील की भी ट्रंप कड़ी आलोचना कर चुके हैं, जिसे ब्रिटेन की मदद से अंजाम दिया गया था. इस डील को वे ‘किसी भी देश द्वारा ऐतिहासिक तौर पर अब तक का सबसे खराब समझौता’ करार दे चुके हैं. उन्होंने अमेरिका से वादा किया है कि वे उन सभी खर्चीले विदेशी संबंधों और व्यापारिक समझौतों से अलग हो जायेंगे जो अमेरिकियों के जीवन-यापन को छीन रहे हैं. ऐसे प्रस्तावित वाणिज्यिक रवैये से वे अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व को बरकरार रखना चाहते हैं. खैर, फिलहाल शपथ ग्रहण से पहले ट्रंप की विदेश नीति को समझ पाना असंभव है. एक बात जरूर है की वे कम से कम एक बात पर लगातार कायम रहे हैं कि उनका प्रशासन महान होगा, और वे ही चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम हैं, भले ही वे उन्हें अधिक समझते न हों. अमरीकी जनता के इस राष्ट्रवाद ने यहूदियों को भी खासा प्रभावित किया है. जैसा कि सभी जानते हैं, अमेरिका में यहूदी लॉबी बेहद सशक्त है और चुनावी फंडिंग से लेकर मतदान नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है. अमेरिकी यहूदियों ने भी हिलेरी को उनकी इस्लाम समर्थक नीतियों के कारण साफ़-साफ़ नापसंद किया. इसके अलावा हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिका के “गन कल्चर” (बन्दूक संस्कृति) के खिलाफ बोलकर भी खुद को कमज़ोर किया. अमेरिका के लोग बन्दूक प्रेमी हैं, वहां पर छोटी-बड़ी बंदूकें आसानी से कोई भी खरीद सकता है, हिलेरी ने इसे बंद करने का वादा किया था जो स्थानीय अमरीकी को कतई पसंद नहीं आया, क्योंकि उसे अपनी और अपने घर की सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण लगती है. जबकि डोनाल्ड ट्रम्प ने आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने के संकेत पहले ही दे दिए थे. अंततः हिलेरी का “सॉफ्ट अमेरिका” हार गया और ट्रम्प का “मजबूत राष्ट्रवाद” जीत गया. कहने का तात्पर्य यह है कि विगत तीन वर्षों से दुनिया भर में “राष्ट्रवाद” की भावना जोर पकड़ रही है, जिसे समझने में तथाकथित बुद्धिजीवी नितांत असफल रहे हैं. ISIS के खतरे, इस्लामिक कट्टरपंथ के विस्तार, यूरोप में इस्लामिक शरणार्थियों के प्रति नरम रुख, पाकिस्तान की अनदेखी करना, दुनिया भर में बेरोजगारी और गरीबी की संख्या में वृद्धि के कारण दुनिया भर के लोगों में या भाव मजबूत होता जा रहा है कि “हमें पहले अपने राष्ट्र को मजबूत बनाना है, पहले अपने राष्ट्र का फायदा देखना-सोचना है, पहले अपने देश के युवाओं को नौकरी मिलनी चाहिए, पहले अपने देश की सुरक्षा होनी चाहिए... दुनिया की चिंता हम बाद में करेंगे”. निश्चित रूप से अब आप सोच रहे होंगे कि नरेंद्र मोदी, ब्रेक्जिट और डोनाल्ड ट्रम्प के बाद अब किसका नंबर है, तो मेरा अनुमान है फ्रांस की धुर “दक्षिणपंथी नेता मेरी ली पेन”. जी हाँ!! इन पर निगाह बनाए रखियेगा. जिस तरह से फ़्रांस में लगातार इस्लामी आतंकी मजबूत होते जा रहे हैं, शार्ली हेब्दो अखबार जैसे हमले बढ़ रहे हैं, फ्रांस के कई शहरों में आए दिन स्थानीय लोगों और शरणार्थी मुस्लिमों के बीच दंगे-फसाद हो रहे हैं, उसे देखते हुए फ्रांस की जनता के मन में भी राष्ट्रपति ओलांद की “सॉफ्ट नीतियों” के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है अतः संभव है कि फ्रांस के आगामी चुनावों में हमें पेरिस में भी एक नया “राष्ट्रवादी नेतृत्व” देखने को मिल जाए. भारत बदल रहा है, दुनिया बदल रही है... राष्ट्रवाद की अवधारणा मजबूत हो रही है. लेकिन “तथाकथित बुद्धिजीवी” और मीडिया के बिके हुए लोग इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं. खैर... मुर्गा बांग नहीं देगा, तो क्या सवेरा ही नहीं होगा?? 

Posted on: 30 November 2016 | 6:12 am

Benefits and Demerits of Demonetization

मोदी की आर्थिक क्रान्ति – प्रभाव और दुष्प्रभाव...  कहावत है की मुसीबत कभी अकेले नहीं आती, वह दो-चार और बड़ी-बड़ी समस्याएँ साथ लेकर ही आती है. भारत में इस समय मोदी विरोधियों तथा समूचे विपक्ष पर यह कहावत पूरी तरह से लागू हो रही है. पाकिस्तान के खिलाफ की गई “सर्जिकल स्ट्राईक” के सदमे से विपक्षी दल उबर भी नहीं पाए थे कि नरेंद्र मोदी ने “तलाक-तलाक-तलाक” का मुद्दा छेड़कर न केवल कट्टरपंथी मुसलमानों में बल्कि पिछले साठ वर्ष में “मुस्लिम वोट बैंक” की राजनीति से पीड़ित विपक्ष को सकते में डाल दिया था. मोदी द्वारा तीन तलाक का मुद्दा उठाकर एक तीर से दो निशाने साधे गए हैं, पहला तो यह कि भारत की जनता के सामने समूचे विपक्ष को बेनकाब कर दिया गया है कि ये लोग न्यायालय का सम्मान नहीं करते, क्योंकि शाहबानो मुद्दा भले ही कितना भी पुराना हो चुका हो, देश की जनता उसका इतिहास जानती है और यह भी जानती है कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के बारे में कांग्रेस, वामपंथ या सपा-बसपा के क्या विचार हैं. दूसरा यह कि तीन तलाक के मुद्दे ने मुस्लिम समुदाय में ही दो-फाड़ कर दिया. जहाँ मुस्लिम महिलाएँ इस पहल से बेहद खुश हैं, वहीं कट्टरपंथी मुस्लिम गुट सब के सामने बेनकाब हो रहे हैं कि इन लोगों का भारतीय संविधान में कतई भरोसा नहीं है. इस प्रकार जो मुस्लिम वोट बैंक “एकजुट” होकर भाजपा के खिलाफ मतदान करता आया है, उसके आधे हिस्से में मोदी ने सेंध लगा दी है. अब कोई भी राजनैतिक दल इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकता कि यूपी-पंजाब-गोवा के चुनावों में मुस्लिम महिलाएँ किस तरफ वोट करेंगी. “सर्जिकल स्ट्राईक” और “तीन तलाक” के दो झटकों से विपक्ष अभी सदमे की अवस्था में था, पाकिस्तान के समर्थन में इनके तमाम षड्यंत्र और सर्जिकल स्ट्राईक को लेकर झूठ फैलाने की सभी कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं. देश की जनता के सामने लगातार बेनकाब होते हुए विपक्ष जब तक यह समझ पाता कि आगे क्या करना है, इसी बीच नरेंद्र मोदी ने उनके माथे पर “परमाणु बम” का हमला कर दिया. यह परमाणु बम इतना अप्रत्याशित और खतरनाक है कि खुद भाजपा सहित देश के तमाम राजनैतिक दल, आतंकी गुट, हवाला ऑपरेटर, ड्रग्स के नीच धंधे में लगे हुए माफिया तथा काला कारोबार करने वाले व्यापारी वर्ग, अफसर, बिल्डर, वकील और डॉक्टरों को भी इस परमाणु हमले ने अपनी चपेट में ले लिया. भारत के इतिहास में केवल दो ही प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं, जिन्होंने बड़े नोटों को बंद करने की हिम्मत दिखाई है. पहले थे एक गुजराती मोरारजी देसाई और अब एक दुसरे गुजराती हैं नरेंद्र मोदी. आठ नवम्बर की रात को आठ बजे जब देश के टीवी चैनलों पर यह फ्लैश चमका कि देश के प्रधानमंत्री देश के नाम विशेष सन्देश देंगे, उस समय 99% लोगों के मन में सबसे पहले पाकिस्तान से युद्ध की घोषणा का संशय आया. क्योंकि उसी दिन प्रधानमंत्री सेना के तीनों प्रमुखों तथा राष्ट्रपति से चर्चा कर चुके थे, इसलिए ऐसी अफवाहें थीं की शायद नरेंद्र मोदी युद्ध की आधिकारिक घोषणा करेंगे. लेकिन मात्र आधे घंटे बाद अर्थात साढ़े आठ बजे तक समूचा देश यह जानकर हैरान हो गया कि प्रधानमंत्री ने एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम उठा लिया है, और अब देश में 500 व 1000 के नोट तत्काल प्रभाव से बंद किए जाते हैं. यह सुनते ही पूरे देश में एक हडकंप सा मच गया. जिस प्रकार एक बड़े भूकंप के बाद छोटे-छोटे झटके आते हैं और जनता को संभलने में समय लगता है, ठीक वैसा ही इस साहसिक घोषणा के बाद हुआ. अपने घरों में बिस्तरों के नीचे और कोठियों में करोड़ों रूपए का काला धन छिपाए बैठे “धनपशु” जब तक समझ पाते की वास्तव में हुआ क्या है, इससे पहले ही रात के बारह बजे की समय सीमा आरम्भ हो गई और उनके वे करोड़ों रूपए रद्दी का टुकड़ा भर रह गए. प्रधानमंत्री द्वारा 500 और 1000 के नोटों को रद्द किए जाने का यह फैसला वास्तव में एक “राजनैतिक मास्टर-स्ट्रोक” है, विशेषकर उत्तरप्रदेश और पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए. भारत जैसे विशाल अर्थतंत्र में से लगभग 70% करंसी को एक झटके में बाहर करने से कई दूरगामी प्रभाव होंगे, लेकिन इसके कई तात्कालिक प्रभाव तो पहले दिन से ही दिखाई देने लगे हैं. चूँकि बड़े नोटों को स्थान लेने के लिए सौ-सौ रूपए के नोट आएँगे तथा 2000 रूपए का नया नोट भी अपना स्थान बनाने में थोड़ा समय लेगा, उससे पहले उत्तरप्रदेश-पंजाब के चुनाव निपट चुके होंगे. इस क्रांतिकारी फैसले का पहला प्रभाव तो यह पड़ेगा कि धनबल से लादे जाने वाले उत्तरप्रदेश के चुनावों में नरेंद्र मोदी ने अपने विपक्षियों की “सप्लाई चेन” पर तत्काल लगाम लगा दी है. इसके अलावा यूपी की जनता के बीच यह साफ़ सन्देश गया है की नरेंद्र मोदी काले धन को समाप्त करने के प्रति वास्तव में गंभीर हैं और ऐसे बड़े निर्णय लेने की उनमें हिम्मत और क्षमता है. प्रेस कांफ्रेंस में जिस तरह से मायावती और मुलायम सिंह के चेहरे लटके हुए थे, उसे देखकर सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है कि इन लोगों को यूपी का चुनाव लड़ने में कितनी दिक्कत आने वाली है. मुलायम सिंह लगभग रुआंसे स्वर में आठ दिन की मोहलत देने की माँग करते रहे, जबकि मायावती जिन्होंने अपने उम्मीदवारों से नगद में दो-दो करोड़ रूपए लिए हैं, वे भी परेशान हैं की अब इन नोटों को कैसे ठिकाने लगाया जाए और जिसने “टिकट का पेमेंट” कर दिया है, उसे मना कैसे करें? दूसरा बड़ा झटका महानगरों में बैठे हवाला ऑपरेटरों को लगा है, जिनका करोड़ों रूपए रोज का कारोबार तत्काल प्रभाव से बंद हो गया है. तीसरा प्रभाव यह है कि संभवतः सोने के दामों में भारी बढ़ोतरी होगी क्योंकि काले धन के मालिक अपना धन ठिकाने लगाने के लिए सबसे सुरक्षित मार्ग सोना ही मानेंगे, जो तत्काल उपलब्ध भी हो जाता है.  लेकिन प्रधानमंत्री के इस निर्णय का देश को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि पाकिस्तान से आने वाले नकली नोट और आतंकवादियों की हवाला फंडिंग तुरंत प्रभाव से बंद हो गई है. नकली नोट तस्करी के लिए पश्चिम बंगाल के सबसे बदनाम इलाके मालदा में जो सन्नाटा पसरा है, वह देखने लायक है. ममता बनर्जी आने “मुस्लिम वोट बैंक” की तरफदारी में जिस तरह लगातार इस निर्णय के खिलाफ गरज रही हैं, उससे यह बात सिद्ध होती है की “चोट” बिलकुल मर्मस्थल पर लगी है. जिस प्रकार केवल तीन दिनों के अन्दर मायावती-मुलायम सिंह और ममता बनर्जी देश की जनता के सामने बेनकाब हुए हैं उससे यह स्पष्ट है कि इनकी राजनैतिक जमीन में भारी उथल-पुथल होने वाली है. सूत्रों के अनुसार पंजाब चुनावों के लिए अरविन्द केजरीवाल ने भारी मात्रा में करोड़ों रूपए नगद का चन्दा प्राप्त किया है. इसीलिए प्रधानमंत्री का यह निर्णय आने के दो दिन बाद तक तो केजरीवाल की बोलती ही बंद थी. पूर्व आयकर अधिकारी होने के नाते वे इस निर्णय के “भूकम्पकारी असर” को अच्छे से समझ चुके थे. इसलिए दिन-रात मोदी-मोदी भजने वाले केजरीवाल को अपनी प्रतिक्रिया देने में दो दिन लग गए. ज़ाहिर है की इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले प्रधानमंत्री और उनकी टीम ने कई जमीनी तैयारियाँ की थीं. एक नवम्बर से आठ नवम्बर के बीच सभी रिजर्व बैंकों के मैनेजरों और वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठकें हुईं. उन्हें कैश तैयार रखने के निर्देश दिए गए. 2000 रूपए का नया नोट छापने के बाद उसे देश के अन्य भागों में में स्थित बैंकों तक पहुँचाने के इंतजाम किए गए. यह सब कार्य करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि यह बात किसी के ध्यान में नहीं आने पाए कि सरकार 500 और 1000 के पुराने नोट सिरे से बंद करने जा रही है. यहाँ तक कि मोदीजी की कैबिनेट तक को इस निर्णय के बारे में कतई जानकारी नहीं थी, और जिन्हें आशंका थी कि ऐसा कुछ हो सकता है उन्हें भी निश्चित तारीख नहीं पता थी कि ऐसी घोषणा किस दिन होगी? आठ नवम्बर के दिन भर में मोदीजी ने केवल तीनों सेनाध्यक्षों तथा राष्ट्रपति से भेंट करके उन्हें इस निर्णय की सूचना दी. इस प्रकार मोदीजी, अरुण जेटली, तीनों सेनाध्यक्ष तथा राष्ट्रपति अर्थात केवल छः व्यक्तियों को ही पता था की आठ नवम्बर को भारत में एक ऐतिहासिक और हिम्मती कदम उठने जा रहा है. प्रधानमंत्री के इस निर्णय का सबसे बड़ा फायदा पेटीएम जैसी ई-वालेट कंपनियों तथा क्रेडिट-डेबिट कार्ड से किए जाने वाले भुगतानों की संख्या को होगा. सभी बैंकों को इस ऐतिहासिक अवसर का लाभ उठाते हुए इलेक्ट्रॉनिक मनी के अधिकाधिक उपयोग तथा मोबाईल पेमेंट को बढ़ावा देने में करना चाहिए, ताकि उनकी शाखाओं पर ग्राहकों का बोझ कम हो तथा संसाधन की बचत हो. इस निर्णय का सबसे खराब असर पड़ेगा “रियल एस्टेट” क्षेत्र को. बड़े-बड़े बिल्डर और कालोनाईज़र आठ नवम्बर की रात से ही धराशायी हो गए हैं. जैसा कि सभी जानते हैं कि बड़े-बड़े अफसरों, अधिकारियों, नेताओं और उद्योगपतियों ने पिछले कुछ वर्षों में गृह निर्माण के क्षेत्र में काले धन का जमकर उपयोग और उपभोग किया है. इस कारण मकानों के दामों में अनावश्यक बढ़ोतरी हुई और सामान्य जनता एक सामान्य कीमत का मकान खरीदने के लिए तरस गई. रियल एस्टेट के मार्केट में कालेधन ने एक गुब्बारा फुला दिया था, जिसके कारण मकानों की कीमतें अवास्तविक स्तर तक चढीं जिसके कारण भ्रष्टाचारियों के पास चार से लेकर दस-दस फ्लैट्स हो गए. ये बात और है कि वे मकान बिक नहीं पाए क्योंकि उनकी कीमत ही अवास्तविक थी. अब समस्या यह आएगी की जब बिल्डरों और कालोनाईज़रों के पास धन की कमी हो जाएगी, तथा भ्रष्ट अधिकारियों एवं नेताओं का काला पैसा उन तक नहीं पहुँचेगा तो बैंकों के ऋण भी डूबत खाते में जाएँगे. परन्तु इससे आम जनता को फायदा यह होगा कि मकानों और जमीनों के दाम वास्तविक स्तर पर आ जाएँगे, क्योंकि बिल्डरों को भी नगदी की आवश्यकता होगी तो वे थोड़ा नुक्सान सहकर अपने फ्लैट्स बेचेंगे ही. प्रधानमंत्री जी के इस निर्णय से प्रभावित होने वाला एक और सेक्टर है “रिटेल” व्यवसाय. बड़े नोटों को बंद किए जाने और उसके स्थान पर दुसरे बड़े नोटों को अपनी जगह संभालने के बीच जो वक्त लगेगा, इस दौरान तात्कालिक रूप से कुछ सप्ताह के लिए ट्रांसपोर्टेशन तथा रिटेल व्यवसाय में मंदी आएगी, क्योंकि अभी भी व्यापारियों को “नगद” लेनदेन ही सुहाता है. व्यापारियों तथा उन्हें सामान बेचने वाली इंडस्ट्री को अभी चेक, NEFT तथा RTGS इत्यादि की “आदत” नहीं है. क्योंकि ऐसा करने पर उनका समूचा ट्रांजेक्शन सरकार की निगाह में आ जाता है, जिस पर उन्हें टैक्स भी देना होगा, आयकर विभाग को हिसाब-किताब भी देना होगा. लेकिन यह आज नहीं तो कल होकर ही रहेगा. प्रधानमंत्री की इस पहल का उद्देश्य ही यही है की व्यापारियों द्वारा अधिकाँश पैसा हवाला अथवा नगद की बजाय इलेक्ट्रॉनिक तरीके से पारदर्शी हो. जो ईमानदार व्यापारी हैं, उन्हें इस निर्णय से कोई कष्ट नहीं है, लेकिन जिन्हें दो नंबर के काम करने की लत लगी हुई है, वे बिलबिला रहे हैं. तात्पर्य यह है कि प्रधानमंत्री के इस “बोल्ड” कदम से उन्हें संभवतः कुछ राजनैतिक लाभ अवश्य मिल सकता है, परन्तु भारत की आर्थिक गतिविधियाँ अगले छः माह तक लड़खड़ा जाएँगी और उन पर नकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा. आखिर इतने वर्षों की “बीमारी” जल्दी तो ठीक नहीं हो सकती. मोदीजी ने जिस व्यवस्थित और योजनाबद्ध तरीके से अपनी इस गुप्त योजना को अंजाम दिया, इसकी तारीफ़ तो करनी ही पड़ेगी. 500 और 1000 रूपए के नोट एक झटके में बंद नहीं हुए हैं, यह करने से पहले मोदीजी ने सबसे पहले गरीबों के लिए जन-धन योजना में उनके बैंक खाते खुलवाए. जब इन बैंक खातों की संख्या लगभग पच्चीस करोड़ पार कर गई, तब उन्होंने इन लोगों को उनके खाते में उपलब्ध राशि को देखते हुए “प्रोत्साहन” स्वरूप डेबिट कार्ड भी जारी कर दिए. आधार कार्ड को गैस कनेक्शनों तथा बैंक खातों से जोड़ने की प्रक्रिया तो पहले ही आरम्भ की जा चुकी थी, इसलिए सरकार के सामने देश की लगभग 70-80 प्रतिशत जनता के बैंक खातों, गैस कनेक्शन और आधार कार्ड की पुख्ता जानकारी आ चुकी थी. इसके बाद नंबर आया काला धन रखने वालों को अपनी संपत्ति घोषित करने के लिए दी जाने वाली छूट योजना का. जेटली और मोदी ने कालेधन वालों को प्रस्ताव दिया की तीस प्रतिशत जुर्माने के साथ वे अपना पूरा काला धन घोषित करें, और उसके पश्चात चैन की नींद सोएँ. इस योजना का काफी अच्छा प्रभाव भी पड़ा और सरकार के खाते में 66,000 करोड़ रूपए जुर्माने के रूप में एकत्रित हुए. इसके बाद भी प्रधानमंत्री ने एक अंतिम चेतावनी जारी करते हुए अपने संबोधन में कहा था कि कालाधन रखने वालों के लिए यह अंतिम मौका है, वे चाहें तो अभी भी संभल जाएँ और किसी भी हालत में तीस सितम्बर तक अपनी संपत्ति घोषित कर दें. ये बात और है कि अधिकाँश बड़े नेताओं-व्यापारियों-बिल्डरों और वकीलों-डॉक्टरों ने मोदीजी की इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया. बहुत से लोगों को यह लगा कि प्रत्येक प्रधानमंत्री तो ऐसा बोलते ही रहते हैं. कुछ नहीं होगा... परन्तु मोदीजी के मन में पहले से ही पक्का निश्चय था कि एक ही वार में काले धन वालों की गर्दन उड़ाना ही है. इसलिए एक अक्टूबर से ही इस घोषणा के लिए जमीन तैयार करने का काम शुरू हो गया, और ठीक एक माह आठ दिन बाद अंततः मोदीजी ने अपना बम धनपशुओं के सिर पर दे मारा. अब स्थिति ये है कि कोई अपने नोट जला रहा है, तो कोई टुकड़े करके गंगाजी में बहा रहा है. अपना काला पैसा बचाने के लिए नित नए हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं, लेकिन सरकार भी “तू डाल-डाल, मैं पात-पात” की तर्ज पर सारे रास्ते ब्लॉक करती जा रही है. सरकार को यह कदम इसलिए भी उठाना पड़ा क्योंकि अभी भी भारत की अधिकाँश जनता आयकर के दायरे से बाहर ही है. आयकर विभाग द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार 2012-13 में भारत में 2.88 करोड़ आयकरदाता थे, जो 2013-14 में बढ़कर 3.35 करोड़ तथा 2014-15 में बढ़कर 3.65 करोड़ हो गए. भले ही यह दो वर्ष के भीतर 27% की बढ़ोतरी हो, लेकिन अभी भी देश की विशाल जनसँख्या और उनकी आय को देखते हुए यह बहुत कम है. आयकर विवरणी भरना और आयकर चुकाना दोनों अलग-अलग बातें हैं. अभी जो आंकड़े मैंने आपको बताए वे आयकर विवरणी दाखिल करने वालों के है, जबकि वास्तविक आयकर चुकाने वालों की संख्या केवल 1.91 करोड़ ही है, यानी जनसँख्या का केवल 1 प्रतिशत. ज़ाहिर सी बात है कि जिस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लोगों की कमाई बढ़ रही है, वेतन बढ़ रहा है, व्यवसाय बढ़ रहा है, उसके अनुपात में आयकर नहीं भरा जा रहा. सीधा अर्थ है कि कालेधन में वृद्धि होती जा रही थी. जिसे तोड़ने के लिए सरकार ने यह क्रांतिकारी कदम उठायासंक्षेप में ठीक से समझने के लिए दो मिनट के इस वीडियो को जरूर देखिये... https://www.youtube.com/watch?v=JSsF5DqYpCUजनधन बैंक खाते, गैस कनेक्शन, आधार कार्ड, से सभी खातों को जोड़ने के अलावा सरकार ने GST वाले चैनल पर भी लगातार काम जारी रखा. विपक्ष का सहयोग लिया, राज्यों को समझाया और अंततः एक अप्रैल 2017 से GST के पूरी तरह से लागू होने की पूरी संभावना है, देश की अर्थव्यवस्था में यह एक और बड़ा कदम सिद्ध होगा. बड़े नोटों को बंद करने का तत्काल प्रभाव से किसानों और छोटे व्यापारियों पर काफी असर पड़ेगा. देश का मध्यम वर्ग काफी हद तक डिजिटल पेमेंट के युग में आरंभिक प्रवेश कर चूका है, इसलिए उसे अधिक फर्क नहीं पड़ेगा. परन्तु चूँकि अब नई फसल मंडियों में आने लगी है और किसानों को भी नगद में राशि लेने की आदत पड़ी हुई है, सो उन्हें शुरुआत में दिक्कत का सामना करना पड़ेगा. चूंकि कृषि पर आयकर नहीं लगता, इसलिए देश में अधिकाँश किसानों के पास PAN कार्ड भी नहीं है. परन्तु सौ-सौ के नोटों की विशाल संख्या को देखते हुए अब मजबूरी में किसानों को भी डिजिटल पैसे की तरफ अपना रुख करना ही होगा. मंडियों से व्यापारी सीधे उनके खाते में पैसा RTGS या NEFT करेगा. सरकार ने भी जनधन खाते और गैस कनेक्शन के बहाने बहुत से खातों को आधार कार्ड से जोड़कर जमीन तैयार कर दी है, इसके अलावा २२ बैंकों के संगठन ने ई-भुगतान हेतु जो UPI (यूनीफाईड पेमेंट इंटरफेस) आरम्भ किया है, उससे भी किसानों एवं छोटे व्यापारियों को जल्दी ही उसकी आदत पड़ जाएगी और भविष्य में धीरे-धीरे नगद भुगतान कालबाह्य होता चला जाएगा. देश में जितना ज्यादा “प्लास्टिक मनी” अर्थात डिजिटल मनी का उपयोग बढ़ता जाएगा, काले धन में उतनी ही कमी आती जाएगी. भ्रष्टाचार किसी भी देश के लिए “दीमक” के समान है, उसका निराकरण तभी होगा जब अधिकाधिक भुगतान नगद की बजाय डिजिटल हो. जैसा की वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा कहते हैं, कालेधन को समाप्त करने के लिए सरकार ने जो SIT (Special Investigation Team) बनाई थी, सरकार ने उसकी कई अनुशंसाओं को लागू करना आरम्भ कर दिया है. बड़े नोटों को बंद करना भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी थी, आने वाले समय में मोदीजी ज्वेलर्स, बिल्डरों, कालोनाईजरों, डॉक्टरों, वकीलों के कालेधन पर नकेल कसने के लिए कुछ और नई घोषणाएं और उपाय अपना सकते हैं.इस बात पर सवाल उठाए जाने लगे हैं कि बड़े नोटों को बंद करने के लिए भूकम्पकारी निर्णय का वास्तव में क्या कोई बड़ा फायदा हुआ है? क्योंकि बंद किए गए नोटों के बदले में सौ-सौ के तथा 500-2000 के नए नोट छापने का कुल खर्च लगभग 12,000 से 15000 करोड़ रूपए के बीच बैठेगा. इसके अलावा मानव संसाधन का समय जो लगेगा वह अलग ही है. तो क्या वास्तव में देश को इससे अधिक लाभ होगा? हम यह कैसे पता करें कि वास्तव में कालेधन वालों को इससे कोई बड़ा नुक्सान हुआ है? इसके लिए हमें कुछ मोटे-मोटे संक्षिप्त आंकड़े देखने होंगे. रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 के अंत तक देश में 500 और 1000 के नोटों की कुल कीमत थी 14,28,000 करोड़ रूपए. अब सामान्य समझ कहती है कि प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद मार्च 2017 तक यदि इतना पैसा रिजर्व बैंक के पास वापस लौटकर नहीं आता, तो समझ लीजिए कि इसमें से जितना पैसा बचा रह गया, वह कालेधन वालों का वास्तविक नुक्सान ही है. पहले ही दिन बरेली में लाखों रूपए के जले हुए नोट सडक पर पाए गए हैं, ऐसी घटनाएँ अभी और बढेंगी. सरकार को चूना लगाने की प्रवृत्ति वाले कथित “चतुर सुजान” लोग येन-केन-प्रकारेण अपनी ब्लैक मनी को ठिकाने लगाने का प्रयास अवश्य करेंगे. आठ नवम्बर की रात को ज्वेलर्स के यहाँ रात दो बजे तक जुटी भीड़ साबित करती है की भारत में बहुत पैसा है, लेकिन हर कोई “नगद” से ही कारोबार करना चाहता है, न कि चेक से. सरकार ने ऐसे सभी ज्वेलर्स पर निगाह बनाए रखी है जिन्होंने 8-9-10 नवम्बर को कारोबार किया है. पिछली तारीखों में बिलिंग करके भी कुछ काला धन बचाया जाएगा, लेकिन वह राशि बहुत ही कम होगी. छापे के दौरान भ्रष्ट अधिकारियों के घर से जिस प्रकार करोड़-पांच करोड़ रूपए निकलते हैं उसे देखते हुए ये लोग कितना भी प्रयास कर लें, उनका बहुत सारा धन तो डूबने ही वाला है. वहीं सरकार इस बात पर भी निगाह बनाए रखेगी, कि आगामी दो-तीन माह में उद्योगों द्वारा निर्यात में “अचानक” बढ़ोतरी अथवा आयात में “अचानक” कमी तो नहीं हो गई है. क्योंकि उस रास्ते से भी काले धन को सफ़ेद करने की कोशिशें जारी रहेंगी. विरोधी दल आरोप लगा रहे हैं की इससे पहले भी दो बार (1946 और 1977) नोटबंदी लागू की गई थी, परन्तु उस समय इसके परिणाम कुछ ख़ास नहीं मिले. परन्तु ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि उस समय सरकारों के पास प्रभावशाली निगरानी व्यवस्था नहीं थी, और ना ही आयकर विभाग के अधिकारी इतने चुस्त और आधुनिक थे. इस बार स्थिति दूसरी है, डिजिटल इण्डिया के कारण पैसों के लेनदेन पर निगाह रखना आसान हो गया है, साथ ही अधिकाँश बैंक खातों को आधार कार्ड से जोड़े जाने के कारण जासूसी सरल हो गई है. इसीलिए सरकार आठ नवम्बर के बाद जीरो बैलेंस के जन-धन खातों पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करेगी और पिछले एक वर्ष के लेनदेन से तुलना करके तुरंत पता चल जाएगा कि “अचानक” इस गरीब के खाते में लाख-दो लाख रूपए कहाँ से आ गए?रिजर्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़ 500 और 1000 के नोटों की कुल संख्या 16.4 लाख करोड़ रूपए है, जो कि देश में उपलब्ध कुल मुद्रा का 86% है. साफ़ बात है कि अब नगद में लेनदेन और मुश्किल से मुश्किल होता जाएगा. स्वाभाविक रूप से मकानों के भावों में जबरदस्त गिरावट देखने को मिलेगी. वैसे भी इशारों-इशारों में मोदीजी पहले ही बता चुके हैं कि उनका अगला हमला “बेनामी संपत्तियों” के कारोबार पर होने वाला है. यानी भ्रष्टाचारियों को चैन की साँस फिलहाल तो नहीं मिलने वाली. वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आशा जताई है कि यदि दबे पड़े काले धन में से आधा भी बैंकिंग सिस्टम में आ जाएगा तो बैंकों के पास नगदी बढ़ेगी और उन्हें ऋण देने में आसानी होगी, साथ ही आयकरदाताओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी. यदि इन सब तकनीकी बातों को छोड़ भी दिया जाए तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है कि नकली नोटों का धंधा ठप पड़ गया... नशीली दवाओं के कारोबार की कमर टूट गई... हथियारों के दलाल बिलबिला रहे हैं... दाऊद इब्राहिम जैसों का हवाला कारोबार खत्म हो गया है... और क्या चाहिए?? सच तो यही है कि बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स, वातानुकूलित सब्जी मार्केट और क्रेडिट कार्ड अभी फ़िलहाल भारत के केवल 10% लोगों की ही पहुँच में हैं. भारत की बाकी 90% जनता निम्न-मध्यमवर्गीय लोग हैं जिनका वास्ता ठेले वाले, सब्जी वाले, प्रेस के लिये धोबी, सुबह-सुबह ब्रेडवाले आदि लोगों से पड़ता है, जिनके पास 100 का नोट “बड़ा” नोट माना जाता है. एक सामान्य आम आदमी को दैनिक “व्यवहारों” में 1000 और 500 के नोटों की कितनी आवश्यकता पड़ती होगी? सवाल वैसे कुछ मुश्किल नहीं है क्योंकि भारत की 70% जनता की रोज़ाना की आय 100 रुपये से भी कम है. अब दूसरा पक्ष देखिये कि वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था के “ट्रांज़ेक्शन” में 80% नोट 50 रुपये से ऊपर के हैं, यानी कि अधिकतम 20% करंसी नोट 100 रुपये से कम वाले ऐसे हैं जिनसे 70% से अधिक जनता को अपना रोज़मर्रा का काम करना है. अमेरिका में सबसे बड़ा नोट 100 डॉलर का है, जबकि ब्रिटेन में सबसे बड़ा नोट 50 पाउंड का है, लेकिन भारत में सबसे बड़ा नोट अभी तक 1000 का था, जो अब 2000 का हो जाएगा. अगले पाँच वर्ष में 2000 का नोट भी बन्द किए जाने की पूरी संभावना है. जैसे-जैसे जनता में वर्चुअल मनी और डिजिटल भुगतान की आदत बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे नगद नोट अप्रासंगिक होते चले जाएँगे. अंत में इतना ही कहना चाहूँगा कि यदि एक हजार रूपए के नोटों की रिश्वत देने के लिए एक करोड़ रूपए एकत्रित किए जाएँ तो उनका कुल वजन लगभग 12 किलो होगा, जबकि 100 रूपए के नोटों के बण्डल में यदि एक करोड़ की रिश्वत देनी हो तो उसका वजन लगभग 100 किलो हो जाएगा... तो बड़े नोटों की जरूरत किसे है?? मुझे तो नहीं है... क्या आपको है?? 

Posted on: 25 November 2016 | 7:53 am

Hyderabad is Liberated, not merged

हैदराबाद की मुक्ति और ओवैसियों का काला इतिहास... इतिहास की पुस्तकों में अक्सर हमें पढ़ाया गया है कि हैदराबाद के निजाम ने सरदार पटेल की धमकी के बाद खुशी-खुशी अपनी रियासत को भारत में “विलय” कर लिया था. जबकि वास्तविकता यह है कि हैदराबाद के निजाम ने अंतिम समय तक पूरा जोर लगाया था कि हैदराबाद “स्वतन्त्र” ही रहे, या फिर तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की तरह पाकिस्तान का हिस्सा बना रहे. जबकि वास्तविकता यह है कि उस समय की सभी घटनाएँ स्पष्ट रूप से सिद्ध करती हैं कि हैदराबाद का भारत में “विलय” नहीं हुआ था, बल्कि उसे घुटनों के बल पर झुकाकर उसे “कट्टर मज़हबी रजाकारों” के अत्याचारों से मुक्त करवाया गया था... आईये सिलसिलेवार उन घटनाओं को एक बार पुनः अपनी यादों में सँजोते हैं... 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात लगभग 500 रियासतों ने भारत गणराज्य में विलय के प्रस्ताव को मंजूर कर लिया था और 1948 आते-आते भारत एक स्पष्ट आकार ग्रहण कर चुका था. केवल जूनागढ़ और हैदराबाद के निजाम इस बात पर अड़े हुए थे कि वे “स्वतन्त्र” ही रहेंगे, भारत में विलय नहीं करेंगे. प्रधानमंत्री नेहरू और गृहमंत्री सरदार पटेल लगातार इस बात की कोशिश में लगे हुए थे कि मामला सरलता से सुलझ जाए, बलप्रयोग न करना पड़े. पटेल का यह कहना था कि जब मैसूर, त्रावनकोर, बड़ौदा और इंदौर जैसी बड़ी-बड़ी रियासतों ने “भारत” के साथ एकाकार होने का फैसला कर लिया है तो देश के बीचोंबीच “हैदराबाद” नामक पाकिस्तानी नासूर कैसे बाकी रह सकता है? यही हाल जम्मू-कश्मीर रियासत का भी था, जब पाकिस्तान से आए हुए हमलावरों ने लगातार कश्मीर की जमीन हड़पना शुरू की, तब कहीं जाकर अंतिम समय पर कश्मीर के महाराजा ने भारत संघ के साथ विलय का प्रस्ताव स्वीकार किया और भारत ने वहाँ अपनी सेनाएँ भेजीं. हैदराबाद के निजाम ने पहले दिन से ही स्पष्ट कर दिया था कि वह स्वतन्त्र रहना चाहते हैं. निजाम ने 11 जून 1947 को एक फरमान जारी करते हुए कहा कि वह 15 अगस्त 1947 के दिन हैदराबाद को एक स्वतन्त्र देश के रूप में देखेंगे. निजाम भारत के साथ एक संधि करना चाहता था, न कि विलय. इस्लामी रजाकारों और इस्लामी प्रधानमंत्री मीर लईक अली ने निजाम पर अपनी पकड़ मजबूत बना रखी थी. जिन्ना, जो कि पाकिस्तान का निर्माण कर चुके थे, उन्होंने भी निजाम की इस इच्छा को हवा देना जारी रखा. जिन्ना ने निजाम को सैन्य मदद का भी आश्वासन दे रखा था, क्योंकि निजाम ने नवनिर्मित पाकिस्तान को “ऋण” के रूप में बीस करोड़ रूपए पहले ही दे दिए थे. 1946-48 के बीच नालगोंडा, खम्मम और वारंगल जिलों के लगभग तीन हजार गाँवों को कम्युनिस्ट पार्टी के गुरिल्लाओं ने “मुक्त” करवा लिया. उस समय कम्युनिस्ट और रजाकारों के बीच लगातार संघर्ष चल रहे थे. चूंकि अंग्रेजों से आजादी के बारे में कोई पक्का निर्णय, समझौता और स्पष्ट आकलन नहीं हो पा रहा था, इसलिए पूरी तरह से निर्णय होने एवं संविधान निर्माण पूर्ण होने तक तत्कालीन भारत सरकार एवं निजाम के बीच 29 नवम्बर 1947 को एक “अस्थायी संधि” की गई. उस समय लॉर्ड माउंटबेटन भारत के गवर्न-जनरल थे. उनकी इच्छा थी कि भारत सरकार, निज़ाम को विशेष दर्जा देकर हैदराबाद का विलय अथवा अधिग्रहण करने की बजाय उनके साथ स्थायी संधि करे. जवाहरलाल नेहरू भी इसी पक्ष में थे की भारत की सेना और निजाम के बीच कोई खूनी संघर्ष न हो. तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल इस बात पर अड़े हुए थे की भारत के बीचोंबीच एक पाकिस्तान समर्थक इस्लामी देश वे नहीं बनने देंगे. लेकिन अंततः नेहरू एवं माउंटबेटन के निज़ाम प्रेम एवं दबाव में उन्हें झुकना पड़ा, जब तक कि जून 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन वापस इंग्लैण्ड नहीं चले गए. इसके बाद तस्वीर में आए श्री केएम् मुंशी, जिन्हें समझौते के तहत भारत सरकार के एजेंट-जनरल के रूप में निज़ाम के राज्य में देखरेख करने भेजा गया. सरदार पटेल और मुंशी के बीच आपसी समझ बहुत बेहतर थी. हैदराबाद में रहकर केएम मुंशी ने इस्लामिक जेहादियों, रज़ाकारों और निज़ाम के शासन तले चल रहे हथियारों के एकत्रीकरण एवं उनके द्वारा किए जा रहे अत्याचारों को निकट से देखा और उसकी रिपोर्ट चुपके से सरदार पटेल को भेजते रहे. इस बीच निज़ाम ने अपनी तरफ से खामख्वाह ही संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में भारत की शिकायत कर दी कि भारत सरकार उनके खिलाफ हथियार एकत्रित कर रही है और आक्रामक रुख दिखा रही है. जबकि वास्तव में था इसका उलटा ही, क्योंकि निज़ाम स्वयं ही एक स्मगलर सिडनी कॉटन के माध्यम से अपने इस्लामी रज़ाकारों के लिए हथियार एकत्रित कर रहा था. निज़ाम की इच्छा यह भी थी की वह पुर्तगालियों से गोवा को खरीद ले, ताकि समुद्र के रास्ते हथियारों की आवक सुगम हो सके. फरवरी 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया (CPI) ने नेहरू सरकार को एंग्लो-अमेरिकन पूंजीवाद का प्रतीक घोषित करते हुए उसे उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया. CPI की मंशा थी कि देश में एक पार्टी शासन बने जो चीन की तानाशाही वाली तर्ज पर स्थापित हो. CPI ने अपने मृदु नेता पीसी जोशी को बाहर का रास्ता दिखाते हुए, उनके स्थान पर बीटी रणदीवे को लाए, जिन्होंने स्टालिन को अपने आदर्श मानते हुए भारत सरकार को सशस्त्र संघर्ष के सहारे उखाड़ फेंकने का संकल्प दोहराया. CPI के नेताओं के अनुसार, निज़ाम राज्य के जिन 3000 गाँवों पर कम्युनिस्टों ने अपना प्रभुत्व जमा लिया था, वहीं से पहले वे निजाम की सेना को हराएँगे और उसके बाद उस इलाके को “एक स्वतन्त्र वामपंथी गणतंत्र” घोषित करके नेहरू सरकार के खिलाफ अपने सशस्त्र संघर्ष जारी रखेंगे. जल्दी ही निज़ाम और कम्युनिस्टों को समझ में आ गया कि यह उनके बस की बात नहीं है, इसलिए दोनों ने मई 1948 में समझौता कर लिया. वामपंथियों ने निजाम को घुट्टी पिला दी कि वह नेहरूवादी पूंजीवाद को खारिज करते हुए निजाम राज्य को एक स्वतन्त्र देश घोषित करें. कम्युनिस्टों ने निजाम का पूरा साथ देने की कसमें खाते हुए अपने कैडर से कह दिया था कि अगर भारतीय सेना निजाम राज्य में प्रवेश करती है तो उसका पूरा विरोध किया जाए. माउंटबेटन ने भारत और निजाम सरकार के बीच कई दौर की बातचीत में हिस्सा लिया. माउंटबेटन को लगा था कि यह मामला आसानी से सुलझ जाएगा, इसलिए अंततः उसने एक समझौता मसौदा तैयार किया, जिसमें निजाम राज्य का भारत में ना तो विलय था, और ना ही उसका अधिग्रहण किया जा सकता था. इस मसौदे के अनुसार निज़ाम को कई रियायतें दी गई थीं, और भारत के साथ युद्ध विराम हेतु मना लिया गया था. जून 1948 में यह समझौता मसौदा लेकर माउंटबेटन और नेहरू देहरादून में बीमार पड़े सरदार पटेल से मिलने पहुँचे ताकि उनकी भी सहमति ली जा सके. सरदार पटेल ने समझौता देखते ही उसे खारिज कर दिया. माउंटबेटन और नेहरू उस समय और भी निराश हो गए, जब इसकी खबर निजाम को लगी और उसने भी इस समझौते को रद्दी की टोकरी में डाल दिया. बस फिर क्या था, सरदार पटेल के लिए अब सारे रास्ते खुल चुके थे, कि वे अपनी पद्धति से निज़ाम और रजाकारों से निपटें. सरदार पटेल ने भारतीय सेना का बलप्रयोग करने का निश्चय किया, लेकिन नेहरू इसके लिए राजी नहीं थे. तत्कालीन गवर्नर जनरल सी.राजगोपालाचारी ने नेहरू और पटेल दोनों को एक साथ बैठक में बुलाया, ताकि दोनों आपस में बात करके किसी समझौते पर पहुँचें. बलप्रयोग संबंधी नेहरू का विरोध उस समय अचानक ठंडा पड़ गया, जब राजगोपालाचारी ने ब्रिटिश हाईकमिश्नर से आया हुआ एक टेलीग्राम नेहरू को दिखाया, जिसमें कहा गया था कि सिकंदराबाद में कई ब्रिटिश ननों का इस्लामी रजाकारों ने बलात्कार कर दिया है. इधर भारतीय सेना के ब्रिटिश कमाण्डर जनरल रॉय बुचर ने नेहरू से मदद माँगी तो नेहरू ने उसे सरदार पटेल से बात करने की सलाह दी. असल में रॉय बुचर का कहना था कि चूँकि अभी पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की मौत का शोक चल रहा है, इसलिए हमें हैदराबाद पर हमला नहीं करना चाहिए. साथ ही साथ रॉय बुचर पाकिस्तानी सेना के तत्कालीन अंग्रेज जनरल से भी मिलीभगत करने में लगा हुआ था. सरदार पटेल ने रॉय बुचर का फोन टेप करवाया और उसे रंगे हाथों पकड़ लिया. पकडे जाने पर बुचर ने इस्तीफ़ा दे दिया, ताकि गद्दारी के आरोपों से बर्खास्तगी से बच जाए. अब सरदार पटेल के लिए रास्ता पूरी तरह साफ़ था. 13 सितम्बर को भारतीय सेनाओं ने तीन तरफ से हैदराबाद को घेरना शुरू किया. निज़ाम और रज़ाकारों को बड़ी सरलता से परास्त कर दिया गया. केवल पांच दिनों में अर्थात 18 सितम्बर 1948 को निज़ाम के जनरल सैयद अहमद इदरूस ने भारत के जनरल जेएन चौधरी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. लेकिन इतिहास की पुस्तकों पर काबिज वामपंथी इतिहासकारों ने लगातार इस झूठ को बनाए रखा की हैदराबाद का “विलय” हुआ है, जबकि वास्तव में निज़ाम को मजा चखाकर सरदार पटेल और केएम मुंशी ने हैदराबाद को “मुक्त” करवाया था. तेलंगाना और आंध्रप्रदेश के लोगों को सरदार पटेल का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनकी दूरदृष्टि के कारण भारत के बीचोंबीच एक पाकिस्तान बनने से बच गया. अन्यथा निज़ाम का प्रधानमंत्री कासिम रिज़वी तत्कालीन निज़ाम शासन में हिन्दुओं की ऐसी दुर्गति करता कि हम कश्मीर के साथ-साथ हैदराबाद को भी याद रखते... निज़ाम की नीयत शुरू से भारत के साथ मिलने की नहीं थी, वह इतनी सरलता से अपना इस्लामी राज्य छोड़ने को तैयार नहीं था. लगभग दो लाख हत्यारे और लुटेरे इस्लामी रज़ाकारों ने उसे समझा दिया था कि चाहे खून की नदियाँ बहानी पड़ें, लेकिन हम केवल पाकिस्तान में शामिल होंगे, भारत में नहीं... परन्तु अंततः भारतीय सेना के सामने यह विरोध केवल पांच दिन ही टिक पाया. कासिम रिज़वी जो कि मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (MIM) का संस्थापक था, वह इस पराजय को कभी नहीं पचा पाया. आईये अब हम देखते हैं कि आखिर हैदराबाद के वर्तमान ओवैसी बन्धु हिन्दुओं के प्रति इतना ज़हर क्यों उगलते हैं? ओवैसियों के काले इतिहास को जानने-समझने के बाद आपके सामने तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो जाएगी कि आखिर सरदार पटेल कितने दूरदृष्टि वाले नेता थे और नेहरू कितने कमज़ोर व अल्पदृष्टि वाले. अभी तक आपने भारत की आज़ादी और 1948 तक निज़ाम और रज़ाकारों की इस्लामी कट्टरता व पाकिस्तान प्रेम के बारे में जाना... अब आगे बढ़ते हैं... अंग्रेजों के जाने के बाद उस समय की अधिकाँश रियासतों, राजे-रजवाड़ों ने खुशी-खुशी भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार किया और आज जो भारत हम देखते हैं, वह इन्हीं विभिन्न रियासतों से मिलकर बना. उल्लेखनीय है कि उस समय कश्मीर को छोड़कर देश की बाकी रियासतों को भारत में मिलाने का काम सरदार पटेल को सौंपा गया था, जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया. नेहरू ने उस समय कहा था कि कश्मीर को मुझ पर छोड़ दो, मैं देख लूँगा. इस एकमात्र रियासत को भारत में मिलाने का काम अपने हाथ में लेने वाले नेहरू की बदौलत, पिछले साठ वर्ष में कश्मीर भारत की छाती पर नासूर ही बना हुआ है. ऐसा ही एक नासूर दक्षिण भारत में “निजाम राज्य” भी बनने जा रहा था. सरदार पटेल ने निजाम से आग्रह किया कि भारत में मिल जाईये, हम आपका पूरा ख़याल रखेंगे और आपका सम्मान बरकरार रहेगा. निजाम रियासत की बहुसंख्य जनता हिन्दू थी, जबकि शासन निजाम का ही होता था. लेकिन निजाम का दिल पाकिस्तान के लिए धड़क रहा था. वे ऊहापोह में थे कि क्या करें? चूँकि हैदराबाद की भौगोलिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी, कि वे पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के साथ को जमीनी तालमेल बना सकें, क्योंकि बाकी चारों तरफ तो भारत नाम का गणराज्य अस्तित्व में आ ही चुका था. फिर निजाम ने ना भारत, ना पाकिस्तान अर्थात “स्वतन्त्र” रहने का फैसला किया. निजाम की सेना में फूट पड़ गई, और दो धड़े बन गए. पहला धड़ा जिसके नेता थे शोएबुल्लाह खान और इनका मानना था कि पाकिस्तान से दूरी को देखते हुए यह संभव नहीं है कि हम पाकिस्तानी बनें, इसलिए हमें भारत में विलय स्वीकार कर लेना चाहिए, लेकिन दूसरा गुट जो “रजाकार” के नाम से जाना जाता था वह कट्टर इस्लामी समूह था, और उसे यह गुमान था कि मुसलमान हिंदुओं पर शासन करने के लिए बने हैं और मुग़ल साम्राज्य फिर वापस आएगा. रजाकारों के बीच एक व्यक्ति बहुत लोकप्रिय था, जिसका नाम था कासिम रिज़वी. कासिम रिज़वी का स्पष्ट मानना था कि निजाम को दिल्ली से संचालित “हिंदुओं की सरकार” के अधीन रहने की बजाय एक स्वतन्त्र राज्य बने रहना चाहिए. अपनी बात मनवाने के लिए रिज़वी ने सरदार पटेल के साथ कई बैठकें की, परन्तु सरदार पटेल इस बात पर अड़े हुए थे कि भारत के बीचोंबीच एक “पाकिस्तान परस्त स्वतंत्र राज्य” मैं नहीं बनने दूँगा. कासिम रिज़वी धार्मिक रूप से एक बेहद कट्टर मुस्लिम था. सरदार पटेल के दृढ़ रुख से क्रोधित होकर उसने रजाकारों के साथ मिलकर निजाम रियासत में उस्मानाबाद, लातूर आदि कई ठिकानों पर हिन्दुओं की संपत्ति लूटना, हत्याएँ करना और हिन्दुओं को मुस्लिम बनाने जैसे “पसंदीदा” कार्य शुरू कर दिए. हालाँकि कासिम के इस कृत्य से निजाम सहमत नहीं थे, लेकिन उस समय तक सेना पर उनका नियंत्रण ख़त्म हो गया था. इसी बीच कासिम रिज़वी ने भारत में विलय की पैरवी कर रहे शोएबुल्ला खान की हत्या करवा दी. मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन (MIM) का गठन नवाब बहादुर यारजंग और कासिम रिजवी ने सन 1927 में किया था, जब हैदराबाद में उन्होंने इसे एक सामाजिक संगठन के रूप में शुरू किया था. लेकिन जल्दी ही इस संगठन पर कट्टरपंथियों का कब्ज़ा हो गया और यह सामाजिक की जगह धार्मिक-राजनैतिक संगठन में बदल गया. 1944 में नवाब जंग की असमय अचानक मौत के बाद कासिम रिज़वी MIM का मुखिया बना और अपने भाषणों की बदौलत उसने “रजाकारों” की अपनी फ़ौज खड़ी कर ली (हालाँकि आज भी हैदराबाद के पुराने बाशिंदे बताते हैं कि नवाब जंग कासिम के मुकाबले काफी लोकप्रिय और मृदुभाषी था, और कासिम रिजवी ने ही जहर देकर उसकी हत्या कर दी). MIM के कट्टर रुख और रजाकारों के अत्याचारों के कारण 1944 से 1948 तक निजाम राजशाही में हिंदुओं की काफी दुर्गति हुई. सरदार पटेल, MIM और कासिम की रग-रग से वाकिफ थे. October Coup – A Memoir of the Struggle for Hyderabad नामक पुस्तक के लेखक मोहम्मद हैदर ने कासिम रिजवी से इंटरव्यू लिया था उसमें रिजवी कहता है, “निजाम शासन में हम भले ही सिर्फ बीस प्रतिशत हों, लेकिन चूँकि निजाम ने 200 साल शासन किया है, इसका अर्थ है कि हम मुसलमान शासन करने के लिए ही बने हैं”, इसी पुस्तक में एक जगह कासिम कहता है, “फिर एक दिन आएगा, जब मुस्लिम इस देश पर और निजाम हैदराबाद पर राज करेंगे”. जब सरदार पटेल ने देखा कि ऐसे कट्टर व्यक्ति के कारण स्थिति हाथ से बाहर जा रही है, तब भारतीय फ़ौज ने “ऑपरेशन पोलो” के नाम से एक तगड़ी कार्रवाई की और रजाकारों को नेस्तनाबूद करके 18 सितम्बर 1948 को हैदराबाद जीतकर भारत द्वारा अधिगृहीत करवा दिया. सरदार पटेल ने MIM पर प्रतिबन्ध लगा दिया, और कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया गया. चूँकि उस पर कमज़ोर धाराएँ लगाई गईं थीं, और उसने भारत सरकार की यह शर्त मान ली थी कि रिहा किए जाने के 48 घंटे के भीतर वह भारत छोड़कर पाकिस्तान चला जाएगा, इसलिए सिर्फ सात वर्ष में अर्थात 1957 में ही वह जेल से बाहर आ गया. माफीनामे की शर्त के मुताबिक़ उसे 48 घंटे में भारत छोड़ना था. कासिम रिजवी ने ताबड़तोड़ अपने घर पर MIM की विशेष बैठक बुलाई. डेक्कन क्रॉनिकल में इतिहासकार मोहम्मद नूरुद्दीन खान लिखते हैं कि भारतीय फ़ौज के डर से कासिम रिजवी के निवास पर हुई इस आपात बैठक में MIM के 120 में से सिर्फ 40 प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित हुए. इस बैठक में कासिम ने यह राज़ खोला कि वह भारत छोड़कर पाकिस्तान जा रहा है, और अब सभी लोग बताएँ कि “मजलिस” की कमान संभालने में किसकी रूचि है? उस बैठक में मजलिस (MIM) में भर्ती हुआ एक युवा भी उत्सुकतावश पहुँचा हुआ था, जिसका नाम था अब्दुल वाहिद ओवैसी (अर्थात वर्तमान असदउद्दीन ओवैसी के दादा). बैठक में मौजूद वरिष्ठ नवाब मीर खादर अली खान ने ओवैसी का नाम प्रस्तावित किया और रिजवी ने इस पर अपनी सहमति की मुहर लगाई और पाकिस्तान चला गया. वह दिन है, और आज का दिन है... तब से MIM अर्थात कट्टर “मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन” पर सिर्फ ओवैसी परिवार का पूरा कब्ज़ा है. ओवैसी परिवार का काला इतिहास जानने-समझने के लिए नीचे दी गई लिंक पर इस लेख का पूर्व प्रकाशित भाग अवश्य पढ़ें... http://blog.sureshchiplunkar.com/2015/09/owaisi-monarchy-and-history-of-kasim.html धन्यवाद... 

Posted on: 14 October 2016 | 1:04 am

Ideological Shift or Power Hunger - Changed BJP

विचारधारा से भटकाव, और संघ से विमुखता... – बदली हुई भाजपाकहावत है की “आधी छोड़, पूरी को धाए, न आधी मिले न पूरी पाए”. अर्थात हाथ में मौजूद आधी रोटी को छोड़कर पूरी रोटी लपकने के चक्कर में हमेशा ऐसा होता है की हाथ में जो आधी रोटी रखी है, वह भी छिन जाती है. जिस समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को गोवा में संघ के कार्यकर्ता काले झण्डे दिखा रहे थे, उस समय भाजपा और संघ के कई विचारकों के दिमाग में यही उक्ति कौंधी होगी. भाजपा जैसी “अनुशासित” कही जाने वाली पार्टी के अध्यक्ष को प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर के नेतृत्व में संघ के ही कार्यकर्ता काले झण्डे दिखाएँ और नारेबाजी करें, तो कोई सामान्य गैर-राजनैतिक व्यक्ति भी बता सकता है की स्थिति वाकई गंभीर है. परन्तु इसके समाधान की दिशा में कदम बढ़ाना तो दूर, भाजपा नेतृत्व के दबाव में आकर संघ मुख्यालय से प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर को उनकी संघ संबंधी सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करने संबंधी आदेश आ गया. “...भाजपा जब भी विपक्ष में होती है तब उसके मुद्दे कुछ और होते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसके सुर बदल जाते हैं...” ऐसा आरोप अभी तक विपक्षी लगाते थे, परन्तु अब भाजपा और संघ के भीतर से ही आवाज़ें उठने लगी हैं कि “सत्ता प्रेम” (या कहें कि सत्ता का नशा) भाजपा पर ऐसा भारी हो चला है कि यह पार्टी तेजी से अपनी “वैचारिक जमीन” छोडती चली जा रही है. यानी जो पार्टी और संगठन अपनी विचारधारा से ही पहचाना जाता था, अब वही केवल सत्ता पाने और बचाए रखने के लिए जिस तरह अपनी मूल विचारधारा से कटता जा रहा है, वह दूसरों के लिए आश्चर्यजनक और पार्टी के समर्पित, निष्ठावान और जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए दुखद अनुभव लेकर आ रहा है. इस लेख में ऐसे ही कुछ “वैचारिक स्खलन” के उदाहरण संक्षेप में समझने की कोशिश करेंगे. ज़ाहिर है सबसे पहले गोवा और प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर... चूंकि गोवा एक बहुत ही छोटा राज्य है, और फिलहाल “केवल दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र NCR” में विचरने वाले तथाकथित “राष्ट्रीय मीडिया” में इस राज्य के बारे में अधिक कवरेज नहीं दिया जाता, इसलिए अधिकाँश पाठकों को गोवा में चल रहे इस वैचारिक घमासान के बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी. चलिए पहले इसी को समझ लेते हैं.... सुभाष वेलिंगकर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, फिर भी जो लोग नहीं जानते उनके लिए संक्षेप में यह जानना जरूरी है कि वेलिंगकर गोवा में संघ की ओर से नींव का पत्थर माने जाते हैं. जिस समय पूरे गोवा में संघ की केवल एक शाखा लगा करती थी, यानी लगभग पचास साल पहले, उसमें भी वेलिंगकर सहभागी हुआ करते थे. इन पचास-पचपन वर्षों में प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर ने मनोहर पर्रीकर से लेकर पार्सेकर जैसे कई भाजपा नेताओं को सिखाया-पढ़ाया और परदे के पीछे रहकर उन्हें राजनैतिक रूप से खड़ा करने में मदद की. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि सुभाष वेलिंगकर जैसे खाँटी संघी और जमीनी व्यक्ति को पदमुक्त करने की नौबत आ गई? इसकी जड़ में भाजपा को लगी सत्ता की लत और उनकी वादाखिलाफी. आईये देखते हैं कि आखिर हुआ क्या है... “वेटिकन पोषित” मीडिया ने हमें यह बताया है कि प्रोफ़ेसर वेलिंगकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का विरोध कर रहे थे, इसलिए उन्हें हटा दिया गया... लेकिन यह अर्धसत्य” है. असल में सन 1990 से गोवा सरकार की यह नीति रही है कि सरकार केवल कोंकणी और मराठी भाषा में पढ़ाने वाले प्राथमिक विद्यालयों को अनुदान देगी. इसका मतलब यह नहीं था कि गोवा में अंग्रेजी स्कूल नहीं चलेंगे, वे भी चलते रहे, लेकिन उन्हें शासकीय अनुदान नहीं मिलता था, वे चर्च के अपने निजी स्रोतों से पैसा लाते और स्कूल चलाते थे. अर्थात 2011 तक स्थिति यह थी कि कोंकणी भाषा में पढ़ाने वाले 135 स्कूल, मराठी भाषा में पढ़ाने वाले 40 स्कूल शासकीय अनुदान प्राप्त करते थे, और अंग्रेजी माध्यम के किसी भी स्कूल को अनुदान नहीं दिया जाता था. सन 2011 के काँग्रेस शासन में यह नीति बदली गई. चर्च और अंग्रेजी प्रेमी पालकों के दबाव में गोवा की काँग्रेस सरकार ने अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को भी शासकीय अनुदान देने की घोषणा कर दी. इसका नतीजा यह हुआ कि लगभग 130 स्कूल रातोंरात इसका फायदा उठाकर “केवल अंग्रेजी माध्यम” के स्कूल बन गए, ताकि अंग्रेजी के दीवानों को आकर्षित भी कर सकें और सरकारी अनुदान भी ले सकें. ये सभी स्कूल चर्च संचालित थे, जो उस समय तक मजबूरी में कोंकणी और मराठी भाषा के माध्यम से पढ़ाते थे, लेकिन चूँकि पढ़ने वाले बच्चों की संख्या काफी मात्रा में थी, इसलिए फीस का लालच तो था ही, इसलिए बन्द करने का सवाल ही नहीं उठता था, परन्तु जैसे ही “अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को भी” शासकीय अनुदान मिलेगा, यह घोषित हुआ, इन्होंने कोंकणी और मराठी भाषा को तिलांजली दे दी. 2012 में मनोहर पर्रीकर के नेतृत्त्व में गोवा विधानसभा का चुनाव लड़ा गया. इसमें पर्रीकर ने चर्च के साथ रणनीतिक गठबंधन किया लेकिन साथ ही संघ (यानी वेलिंगकर) को यह आश्वासन भी दिया कि अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को जो अनुदान दिया जा रहा है, वह बन्द कर देंगे. छः जून 2012 को पर्रीकर सरकार ने अधिसूचना जारी करके कहा कि सरकार अब पुनः कोंकणी और मराठी भाषा के स्कूलों को अनुदान देगी, लेकिन जो स्कूल 2011 में “केवल अंग्रेजी माध्यम” स्कूल में परिवर्तित हो गए हैं, उनकी सरकारी सहायता भी जारी रहेगी. यहाँ तक कि उस अधिसूचना में यह भी लिख दिया गया कि केवल वही अंग्रेजी माध्यम स्कूल, जो अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जाते हैं, उन्हीं को सरकारी पैसा मिलेगा. यह सरासर वेलिंगकर के “भारतीय भाषा बचाओ आंदोलन” और उनसे किए गए वादे के साथ धोखाधड़ी थी. इस निर्णय ने वेलिंगकर को बुरी तरह नाराज कर दिया, लेकिन चर्च के दबाव में पर्रीकर सरकार ने अपना निर्णय नहीं बदला. पर्रीकर के केन्द्र में जाने के बाद लक्ष्मीकांत पार्सेकर मुख्यमंत्री बने, और दस अगस्त को ही उन्होंने भी घोषणा कर दी कि अल्पसंख्यकों (यानी ईसाई) द्वारा संचालित अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को अनुदान जारी रहेगा. प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर के क्रोध की मूल वजह यह भी है कि गोवा की भाजपा सरकार ने शासकीय अनुदान की यह मिठाई “केवल” अल्पसंख्यक संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों को ही दी है. यानी यदि कोई हिन्दू व्यक्ति अंग्रेजी माध्यम का स्कूल चलाए तो उसे शासकीय अनुदान नहीं मिलेगा. भारत में शिक्षा को लेकर भेदभाव निजी अथवा सरकारी से ज्यादा “बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक” का है. इसीलिए मध्यान्ह भोजन से लेकर शिक्षा का अधिकार तक जब भी कोई क़ानून अथवा नियम बनाया जाता है, तो वह केवल बहुसंख्यकों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों पर सख्ती से लागू होता है, जबकि अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित स्कूलों को इसमें छूट मिलती है. वेलिंगकर के नाराज होने की असल वजह यही थी कि 1990 से लेकर 2011 तक जो नीति थी, उसी को भाजपा ने पुनः लागू क्यों नहीं किया? जबकि भाजपा खुद भी “भारतीय भाषाओं” और हिन्दी-मराठी-कोंकणी के प्रति अपना प्रेम जताती रही है, फिर सत्ता में आने के बाद चर्च के सामने घुटने टेकने की क्या जरूरत है? लेकिन चूँकि पर्रीकर को गोवा में जीत इसीलिए मिली थी कि चर्च ने उनका साथ दिया था, इसलिए वे चर्च के अहसानों तले दबे हुए थे. उधर केन्द्र में प्रकाश जावड़ेकर ने संसद में यह बयान देकर कि, “अल्पसंख्यक संस्थानों के शिक्षा व अनुदान नियमों के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी...” वेलिंगकर को और भी भड़का दिया. प्रोफ़ेसर वेलिंगकर पिछले दस वर्ष से कोंकणी और मराठी भाषा को बचाने के लिए “भारतीय भाषा बचाओ आंदोलन” (BBSM) के नाम से आंदोलन चलाए हुए हैं. संघ के तपे-तपाए नेता होने के कारण जनता को समझाने व एकत्रित करने में वे माहिर हैं, इसीलिए सैकड़ों जमीनी संघ कार्यकर्ता भी उनके साथ हैं. इस समस्या का एकमात्र हल यही है कि केन्द्र सरकार संविधान के 93वें संशोधन पर पुनर्विचार करे और शिक्षा का अधिकार क़ानून की पुनः समीक्षा करके उसमें समुचित बदलाव लाए. अन्यथा यह समस्या पूरे देश में चलती ही रहेगी और अल्पसंख्यक संस्थानों को हमेशा “रक्षा कवच” मिला रहेगा, और वे अपनी मनमानी करते रहेंगे. ईसाई संस्थाएँ अपने अनुसार अंग्रेजी को प्राथमिकताएँ देंगी जबकि मदरसा संचालित स्कूल उर्दू को. इस बीच बहुसंख्यक संचालित संस्थाओं का हिन्दी (एवं क्षेत्रीय भाषाओं) के माध्यमों से चलने वाले स्कूल दुर्दशा का शिकार बनेंगे और अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ता ही जाएगा. जापान, रूस, कोरिया व चीन जैसे कई देशों में यह सिद्ध हुआ है कि “प्राथमिक शिक्षा” केवल और केवल मातृभाषा में ही होना चाहिए, अन्यथा बच्चे के मानसिक विकास में बाधा आती है. अंग्रेजी को कक्षा आठ या दस के बाद लागू किया जा सकता है. बहरहाल, पिछले दो वर्ष से इस मुद्दे को लेकर वेलिंगकर लगातार पर्रीकर और पार्सेकर पर शाब्दिक हमले करते रहे हैं. चूँकि वेलिंगकर भाजपा में किसी पद पर नहीं थे, इसलिए उन्हें कोई गंभीरता से नहीं सुन रहा था, परन्तु इस मुद्दे को लेकर वेलिंगकर के सैकड़ों समर्थकों ने जिस तरह गोवा दौरे के समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को काले झण्डे दिखाए थे, उसने मामला और बिगाड़ दिया है. संघ मुख्यालय ने इसे गंभीरता से लेते हुए अंततः प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर को बाहर का रास्ता दिखा ही दिया, और ऐसा लगता है कि आगे भी गोवा सरकार पर चर्च का दबाव एवं अंग्रेजी का प्रभुत्व बरकरार ही रहेगा.इस घटनाक्रम की राजनैतिक परिणति कैसे होती है यह तो जल्दी ही होने वाले विधानसभा चुनावों में पता चल ही जाएगी, लेकिन जिस तरह से वेलिंगकर के समर्थन में शिवसेना, भाजपा, संघ और खासकर महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के सदस्य खुल्लमखुल्ला रूप में जुड़ रहे हैं, उसे देखते हुए भाजपा की राह आसान नहीं होगी. उल्लेखनीय है कि गोमांतक पार्टी का भी मुख्य मुद्दा “भाषा बचाओ, गोवा की मूल संस्कृति बचाओ” ही रहा है. जिस तरह वेलिंगकर खुलेआम मनोहर पर्रीकर और पार्सेकर पर विभिन्न आरोप लगा रहे हैं, इससे लगता है कि मामला बेहद गंभीर है, क्योंकि प्रोफ़ेसर वेलिंगकर ने कभी भी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं दिखाई है. बताया जाता है कि वेलिंगकर के मुख्य मुद्दे के समर्थन में संघ के लगभग दस हजार कार्यकर्ता भी हैं जो फिलहाल खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं. देखना होगा कि भाषा बचाओ आंदोलन और शिक्षा में चर्च के दखल का यह मुद्दा गोवा के निवासियों के दिल को कितना छूता है, लेकिन संघ और भाजपा ने जिस तरह से वेलिंगकर के मुद्दों को लटकाए रखा, उनसे वादाखिलाफी की और प्रकरण का बड़े ही भद्दे तरीके से समापन किया, वह पार्टी और खासकर विचारधारा के लिए निश्चित ही चिंताजनक बात है... जैसा कि पहले कहा गया, पिछले दो-ढाई वर्ष में ऐसे कुछ मुद्दे सामने आए हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि भाजपा के सामने अब केवल “सत्ता पाना” और “सत्ता बचाए रखना” ये दो ही उद्देश्य रह गए हैं, जबकि पार्टी की मूल पहचान अर्थात “विचारधारा” से पिण्ड छुडाया जा रहा है. अब बात चर्च की चली ही है तो हाल ही में एक और मुद्दा सामने आया, जिसमें स्पष्ट रूप से दिखाई दिया कि केन्द्र की मोदी सरकार न सिर्फ संघ की विचारधारा को दरकिनार करने में लगी हुई है, बल्कि अपने “मूलभूत मतदाताओं” को भी नाराज करने की हद तक जाने को तैयार है. जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ कोलकाता की मदर टेरेसा को “संत” घोषित करने वाले कार्यक्रम की. संघ अथवा भाजपा से जुड़े हुए सभी सामान्य लोग जानते हैं, कि कोलकाता में “मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी” नामक संस्था, जिसकी कर्ता-धर्ता मदर टेरेसा थीं, वह पिछले कई वर्षों से भारत के विभिन्न राज्यों में ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में “सेवा” के नाम पर धर्मांतरण के काम में लगी हुई है. संघ से संबद्ध कई संस्थाओं जैसे वनवासी परिषद्, विश्व हिन्दू परिषद् अथवा सेवा भारती इत्यादि लगातार मदर टेरेसा के तथाकथित सेवा कार्यों की तीखी आलोचना करते रहे हैं. संघ से जुडी इन संस्थाओं की जमीनी रिपोर्ट बताती है कि वेटिकन ने मदर टेरेसा रूपी अपने इस “मोहरे” का चन्दा उगाहने तथा धर्मांतरण करने में बड़ा ही शानदार उपयोग किया है. पिछले कई वर्षों से संघ-भाजपा के सभी बड़े-छोटे नेता मदर टेरेसा के “तथाकथित चमत्कार” पर सवाल उठाते आए हैं, खिल्ली उड़ाते आए हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मोदी सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि “संत” की उपाधि दिए जाने वाले भव्य कार्यक्रम में भारत सरकार सुषमा स्वराज जैसी कद्दावर नेता (और विदेश मंत्री) को आधिकारिक रूप से वहाँ भेजे? यदि मोदी सरकार “विचारधारा” पर ही अटल होती, तो वह संघ की चिर-परिचित लाईन पर ही टिकी रहती और विदेश सेवा के किसी कनिष्ठ अधिकारी को भी वहाँ भेज सकती थी. ऐसा करने से विदेशों में “मिशनरी” को कड़ा सन्देश भी मिल जाता और निमंत्रण मिलने पर प्रतिनिधिमंडल भेजे जाने की औपचारिकता भी पूरी हो जाती. लेकिन ऐसा नहीं किया गया, और मदर टेरेसा को “संत” बनाकर धर्मांतरण का जो नया “ब्राण्ड एम्बेसडर” गढा गया है, उस पर मोदी सरकार की “आधिकारिक” मुहर भी लग गई. इस बीच “संतत्व” के इस महिमामंडन और अंधविश्वास फैलाने के इस दुष्कृत्य के खिलाफ लिखने वाले राष्ट्रवादी विचारकों को, मीडिया और सोशल मीडिया पर कई तथाकथित “कूटनीतिज्ञ” और “रणनीतिज्ञ” बार-बार यह बताते रहे कि मदर टेरेसा के इस कार्यक्रम में जाना कितना जरूरी था. जबकि वास्तविकता यह है कि वेटिकन में आयोजित इस फूहड़ता का कई देशों ने बहिष्कार किया, भारत सरकार भी टाल सकती थी. परन्तु भारत की नई-नवेली “राष्ट्रवादी सरकार” इतनी हिम्मत भी न जुटा सकी, कि कार्यक्रम का पूर्ण बहिष्कार न सही, लेकिन कम से कम अपनी विचारधारा पर अटल रहते हुए मिशनरी की तथाकथित सेवा, उनके NGOs के धंधे, वेटिकन के कारनामों एवं धर्मांतरण के खिलाफ कोई कड़ा सन्देश दे पाती. क्योंकि गोवा, मिजोरम, नगालैंड और तमिलनाडु-आंध्र के ईसाई वोटों पर इनकी “गिद्ध-दृष्टि” लगी हुई है, जो भाजपा को मिलेंगे ही ऐसा कहना मुश्किल है. ऊपर जो दोनों मुद्दे (गोवा का भारतीय भाषा बचाओ और मदर टेरेसा के कथित चमत्कार का महिमामंडन), यह दोनों ही मुद्दे ऐसे थे जिन पर कोई “राष्ट्रवादी सरकार” चाहती तो आराम से अपनी मूल विचारधारा पर टिके रहकर निर्णय कर सकती थी. इसके लिए ना तो संसद के दोनों सदनों में पूर्ण बहुमत की आवश्यकता थी और ना ही कोई मजबूरी थी. परन्तु शायद हिम्मत नहीं जुट रही. ऐसा ही एक और मुद्दा है, जहाँ केन्द्र और राज्यों की भाजपा सरकारें बड़े आराम से अपने बहुमत के बल पर निर्णय कर सकती हैं... यह मुद्दा है “मंदिरों की संपत्ति” का मुद्दा. जैसा कि सभी जानते हैं, भारत में हिन्दू मंदिरों की संपत्ति पर शासकीय नियंत्रण होता है. मंदिरों का प्रबंधन, रखरखाव, इसके ट्रस्ट और धन-संपत्ति पर राज्य शासन का कब्ज़ा रहता है. मंदिरों को सरकारी अधिग्रहण से बाहर निकालने और मंदिरों की संपत्ति और जमीन के दुरुपयोग को रोकने के लिए पिछले कई वर्षों में तमाम धार्मिक संस्थाएँ कानूनी और जमीनी लड़ाई लड़ रही हैं. “कोढ़ में खाज” की स्थिति यह है कि सरकारी नियंत्रण केवल मंदिरों पर ही है, चर्च अथवा मस्जिदों पर नहीं है. जब आठ-नौ राज्यों और केन्द्र में भाजपा की बहुमत से सरकार बन गई, तो भगवान के भोलेभाले भक्तों तथा हिंदूवादी कार्यकर्ताओं को आशा बँधी थी कि शायद मोदी सरकार इस समस्या के हल की दिशा में तत्काल कुछ कदम उठाएगी, संसद में क़ानून पास करवाते हुए मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त करने की पहल करेगी. अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है. इसके उलट महाराष्ट्र के चिकित्सा मंत्री गिरीश महाजन ने राज्य सरकार को एक प्रस्ताव बनाकर भेजा है, जिसमें उन्होंने माँग की है कि सिद्धिविनायक, तुलजापुर, महालक्ष्मी, साईबाबा इत्यादि सभी धनवान मंदिरों के ट्रस्ट राज्य शासन को प्रतिमाह एक निश्चित शुल्क दें ताकि इस धन को शासकीय अस्पतालों में खर्च किया जा सके. गिरीश महाजन ने “नैतिकता के उच्च प्रतिमान” स्थापित करते हुए यह भी कहा कि हम चाहते हैं कि मंदिरों में जो पैसा दानस्वरूप आता है व गरीबों की भलाई के लिए खर्च हो. हालाँकि विरोध शुरू होने पर उन्होंने “बैलेंस” बनाने की फूहड़ कोशिश करते हुए “चर्च और मस्जिदों” से भी अपील की, कि वे भी अपने धन का कुछ हिस्सा अस्पतालों में दें (यानी हिन्दू मंदिरों के लिए बाकायदा “लिखित प्रस्ताव”, जबकि चर्च-मस्जिदों से केवल मौखिक अपील...). सिद्धिविनायक ट्रस्ट के अधिकारी नरेंद्र राणे ने तत्काल इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए आँकड़े पेश करते हुए लिखित में बताया कि सिद्धिविनायक मंदिर प्रतिवर्ष चालीस करोड़ रूपए स्वास्थ्य, सेवा एवं अन्य सामाजिक कार्यों के लिए खर्च करता ही है. इसके अलावा सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए इस वर्ष बारह करोड़ रूपए अलग से खर्च किए गए हैं. सरकार को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए. उल्लेखनीय है कि 1980 के दशक में केरल के मुख्यमंत्री के करुणाकरण ने गुरुवायूर मंदिर ट्रस्ट पर दबाव बनाकर राज्य कोषालय में दस करोड़ रूपए जमा करवाए थे, ताकि सरकारी राजकोषीय घाटा पूरा किया जा सके. इसी के साथ उन्होंने “भूमि सुधार क़ानून” लागू करके गुरुवायूर मंदिर की 13,000 एकड़ भूमि को केवल 230 एकड़ तक सीमित कर दिया, लेकिन चर्च (जो कि रेलवे के बाद सबसे बड़ा रियल एस्टेट मालिक है) की जमीन को हाथ तक नहीं लगाया. इसी प्रकार पूर्ववर्ती महाराष्ट्र सरकार ने मुम्बई हाईकोर्ट में 2004 में लिखित में स्वीकार किया है कि समाज कल्याण एवं कपड़ा मंत्री विलासराव पाटिल उन्दालकर ने मुम्बई के सिद्धिविनायक मंदिर से एक लाख नब्बे हजार डॉलर निकालकर, किसी ऐसी चैरिटी ट्रस्ट में डाल दिया जो कि नेताओं के परिजनों द्वारा संचालित है. ये तो केवल दो ही उदाहरण हैं, मंदिरों के धन की ऐसी लूट के दर्जनों किस्से हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि यदि भाजपा सरकार की नीयत वाकई में साफ़ है तो उसे गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की तर्ज पर अखिल भारतीय स्तर का “मंदिर प्रबंधन बोर्ड” अथवा “देवस्वम ट्रस्ट” बनाना चाहिए, उसे कानूनी रूप देना चाहिए एवं भारत के सभी मंदिरों की संपत्ति, जमीन, पशु, गहने, शेयर्स इत्यादि इस संस्था के हवाले करना चाहिए. देश के सभी मंदिरों का प्रबंधन, रखरखाव, मंदिर के स्टाफ की नियुक्तियाँ इत्यादि भी यही संस्था देखे, क्योंकि जब सरकार चर्च और मस्जिद के कामकाज में दखल नहीं देती तो फिर मंदिरों को भी उसे मुक्त्त करना ही चाहिए, ताकि मंदिरों के धन का सही सदुपयोग किया जा सके और यह पैसा भ्रष्ट नेताओं और ट्रस्टों में जमे बैठे उनके रिश्तेदारों की कमाई में न चला जाए. केन्द्र की भाजपा सरकार चाहे तो बड़े आराम से इसके लिए क़ानून बनवा सकती है, जिसे पास करवाना मुश्किल नहीं होगा... परन्तु इच्छाशक्ति की कमी साफ़ दिखाई दे रही है. भाजपा सरकार को केवल यह करना है कि संविधान की धारा 26 (जिसके अनुसार “सभी” धर्मों के लोग अपनी-अपनी धार्मिक संस्थाओं को चलाने व प्रबंधन के लिए स्वतन्त्र होंगे) को सही तरीके से लागू करवाना है. इसके अलावा विभिन्न राज्यों ने “हिन्दू धार्मिक एवं पारमार्थिक क़ानून” बना रखे हैं, उन्हें खारिज करते हुए, अखिल भारतीय स्तर का क़ानून बनाते हुए एक संस्था का गठन करना है. परन्तु वे इतना भी नहीं कर पा रहे हैं. इस बीच पिछले कई दशकों से मंदिरों के धन की अबाध लूट जारी है, और कोई सुध लेने वाला भी नहीं, क्योंकि इस खेल में काँग्रेस-भाजपा की मिलीभगत भी है. सवाल उठता है कि मंदिरों में दान करने वाले लोग कौन हैं? और इस पैसे पर किसका अधिकार होना चाहिए यह कैसे खर्च होगा? और “गिद्ध दृष्टि” केवल मंदिरों की आय पर ही क्यों? वह भी भाजपा सरकार के मंत्री द्वारा?? ये कैसी वैचारिक गिरावट है? क्या पाठकों को “स्वदेशी जागरण मंच” की याद है? जरूर याद होगा... संघ पोषित यह संगठन लगातार कई वर्षों तक “स्वदेशी वस्तुओं” के समर्थन में आन्दोलन चलाए हुए था. आज यह संगठन कहाँ है, किसी को नहीं पता. यदि बाबा रामदेव ने अपने पुरुषार्थ और ब्राण्ड मार्केटिंग से “पतंजलि” को नई ऊंचाईयों तक नहीं पहुंचाया होता, तो भारत में “स्वदेशी” का कोई नामलेवा तक नहीं बचता. बाबा रामदेव ने जो किया वह उनकी निजी हैसियत और रूचि के अनुसार किया, लेकिन संघ की राजनैतिक बाँह अर्थात भाजपा की राज्य सरकारों और केंद्र सरकार ने स्वदेशी बचाने के लिए अभी तक क्या और कितना किया, जनता को इसकी जानकारी केवल “मेक इन इण्डिया”” और “स्किल इण्डिया”” के नारों से ही पता चल रही है. वास्तविकता यह है की भाजपा के प्रत्येक राज्य का मुख्यमंत्री कम से कम दो बार अमेरिका अथवा चीन का दौरा करके उन देशों से आग्रह कर चूका है कि “हमारे यहाँ आईये, निवेश कीजिए, मुनाफ़ा कमाईये (और स्वदेशी उद्योगों को बर्बाद कर दीजिए...)”. कहाँ है विचारधारा?? या सत्ता मिलते ही गायब हो गई? या फिर विपक्ष में रहकर बतोले देने तथा सत्ता में रहकर शासन चलाने का फर्क समझ में आ गया? आज बाबा रामदेव ने जिस तरह से विदेशी कंपनियों की ईंट से ईंट बजा रखी है, वैसे आठ-दस प्रयास भाजपा की राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में क्यों नहीं आरम्भ किए? “स्मार्ट सिटी” बनाना क्या इतना जरूरी है की हम पश्चिम की नक़ल करते हुए कांक्रीट के जंगल खड़े करते चले जाएँ? गाँवों में जो “असली स्किल” पड़ा हुआ है, उसे बढ़ावा देने की बजाय उन्हें शहरों में लाकर “स्मार्ट मजदूर” बना दें? जब तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परम्परागत कारीगरी को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा, तब तक वास्तविक “स्वदेशी” कहीं दिखाई नहीं देगा, परन्तु क्या ऐसा हो रहा है? नहीं.. मूल विचारधारा से भटकाव का ऐसा ही और उदाहरण है, “इस्लामिक बैंकिंग”. जैसा कि पाठक जानते ही हैं, पिछले काफी समय से इस्लामिक बैंकिंग भारत में अपने पैर पसारने के लिए प्रयासरत है. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे मुस्लिम बहुलता वाले राज्यों में “बिना ब्याज” वाली गैर-बैंकिंग आर्थिक संस्थाएँ काम कर ही रही हैं, परन्तु एक आधिकारिक बैंक के रूप में इस्लामिक बैंक की अवधारणा भारतीय संविधान के तहत संभव ही नहीं है. इस योजना के बारे में डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी पहले ही हाईकोर्ट में मुकदमा जीत चुके हैं कि भारत में इस्लामिक बैंकिंग नहीं की जा सकती. परन्तु सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी के विश्वस्त सलाहकार ज़फर सरेशवाला (जो कि उर्दू विश्वविद्यालय के चांसलर भी हैं) ने पिछले ढाई वर्ष में अपने प्रयासों से सऊदी अरब के “इस्लामिक डेवेलपमेंट बैंक” की शाखाएँ भारत में खोलने के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं. हाल ही में मोदी जी की सऊदी अरब यात्रा के दौरान भारत के EXIM बैंक और IDM के बीच 100 मिलियन डॉलर के ऋण लेनदेन संबंधी समझौता किया गया है. साथ ही इस्लामिक डेवेलपमेंट बैंक द्वारा भारत की राष्ट्रीय स्किल एंड एजुकेशन इंस्टीट्यूट (RISE) के साथ भी समझौता किया है, जिसके तहत बैंक गरीबों की मदद के लिए 350 एम्बुलेंस चलाएगी. इस सारी कवायद में पेंच यह है कि इस्लामिक बैंकिंग भारत में शुरू करने के लिए संसद में बिल लाना होगा, क़ानून पास करवाना होगा, संविधान संशोधन की भी जरूरत पड़ेगी. समाचार पत्रों में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार यदि काँग्रेस इस पर राजी हो गई, तो निकट भविष्य में भारत में इस्लामिक बैंकिंग के कदम पड़ सकते हैं. कहा जाता है कि यदि ऐसा करना संभव नहीं हुआ, तो सऊदी अरब के इस बैंक को “पिछले दरवाजे” (NBFC, सहकारी समिति, इत्यादि) से प्रवेश करवाया जाएगा. अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि केन्द्र सरकार की “जन-धन योजना” वैसे तो काफी सफल मानी जा रही है, परन्तु सरकार इस बात से चिंतित है कि इसमें मुस्लिमों के खाते नहीं के बराबर खुले हैं. अतः मुस्लिमों के बैंक खाते अधिकाधिक खुलवाने के लिए, उन्हें बैंकिंग की तरफ रिझाने के लिए सरकार ने “इस्लामिक बैंकिंग” का चारा डालने की योजना बनाई है. परन्तु यहाँ मूल सवाल तो वही है कि यदि यह सब करना ही है, तो फिर संघ-भाजपा की उस “मूल विचारधारा” का क्या हुआ, जो इसी प्रस्ताव को लेकर मनमोहन-सोनिया की कड़ी आलोचना के समय दिखाई देती थी. क्या इस कदम से यह सन्देश नहीं जाता कि मोदी सरकार मुस्लिमों के सामने झुक गई है, उन्हें बैंकिंग की छतरी तले लाने की खातिर विचारधारा से “यू-टर्न” लेने लगी है. मदर टेरेसा वाले उदाहरण में भी ठीक यही हुआ है कि जब विपक्ष में थे, तब टेरेसा को कोसते थे, धर्मांतरण के खिलाफ आग उगलते थे, लेकिन सत्ता मिलने के बाद उन्हें “संत” मिलने की आधिकारिक खुशियाँ मनाई जा रही हैं. यह विचारधारा का भटकाव है, या “सत्ता का नशा”? क्या सत्ता से बाहर होने के बाद भाजपा अपने “मूल मतदाताओं” से आँखें मिलकर बात कर पाएगी? अभी तक आपने “भारतीय भाषा बचाओ”, “मदर टेरेसा के संतत्व”, “मंदिरों की संपत्ति”, “स्वदेशी जागरण” तथा “इस्लामिक बैंकिंग” जैसे कई विषयों पर भाजपा के “वैचारिक यू-टर्न” के बारे में पढ़ लिया... अब अंत में आप खुद से एक सवाल कीजिए, कि पिछले ढाई साल में लगभग पूरी दुनिया घूम चुके, हमारे प्रिय प्रधानमंत्री, वाराणसी से कुछ ही दूरी पर स्थित अयोध्या में फटे हुए तम्बू में बैठे रामलला के “अस्थायी” मंदिर में दर्शन करने क्यों नहीं गए? यह कदम उठाने से हिंदुओं में कम से कम एक “ठोस सन्देश” तो जाता. भाजपा के “स्थायी मतदाता” इतने समझदार तो हैं, कि वे भी जानते हैं राम मंदिर का मुद्दा केवल अदालत में अथवा संसद में ही सुलझ सकता है, परन्तु एक आम आदमी की हैसियत से उस अस्थायी “राम मंदिर” में दर्शन करने जाने से प्रधानमंत्री को कौन रोक रहा है? मुस्लिमों को खुश करने वाली काँग्रेसी स्टाईल वाली चुनावी राजनीति या “विचारधारा से भटकाव”?? उपरोक्त सभी मुद्दों सहित यह सवाल आज भाजपा के “कोर वोटर” तथा संघ के सभी स्वयंसेवकों के मन को मथ रहा है... अंदरखाने सवाल उठने लगे हैं, कि जब पूर्ण बहुमत की सत्ता है तब विचारधारा से समझौता क्यों किया जा रहा है?  

Posted on: 3 October 2016 | 12:18 am

Language Distortion due to Mobile and PC

मोबाईल, इंटरनेट के कारण भाषा और व्याकरण विकृत हो रहे हैं... आजकल तकनीक का ज़माना है. हर व्यक्ति के हाथ में मोबाईल है, स्मार्टफोन है, लैपटॉप है, इंटरनेट है. इन आधुनिक उपकरणों के कारण संवाद और सम्प्रेषण की गति बहुत तेज हो गई है. पलक झपकते कोई भी सन्देश दुनिया के दुसरे छोर पर पहुँच जाता है. लेकिन यह स्पष्ट रूप से देखने में आ रहा है कि मोबाईल अथवा स्मार्टफोन के जरिये भेजे जाने वाले संदेशों में भाषा और व्याकरण की गंभीर त्रुटियाँ हो रही हैं. इस कारण न सिर्फ हिन्दी, बल्कि अंगरेजी भाषा भी भ्रष्ट और विकृत हो रही है. इस बीमारी का प्रमुख कारण है “जल्दबाजी और अधूरा ज्ञान”. आधुनिक नई पीढ़ी हर बात जल्दी और त्वरित गति से चाहती है. उसे हर बात की जल्दी है, इसीलिए मोबाईल पर सन्देश टाईप करते समय भी उसे जल्दबाजी लगी रहती है. उसे यह ध्यान नहीं रहता की वह क्या टाईप कर रहा है, कैसे टाईप कर रहा है, किस भाषा में टाईप कर रहा है, कौन से शब्द उपयोग कर रहा है. सन्देश भेजने की जल्दी में वह How Are You? को भी h r u? टाईप कर रहा है. क्या ऐसा करने से वाकई में समय बच रहा है? नहीं. दस सेकण्ड का समय बचाकर अपनी भाषा भ्रष्ट करना उचित नहीं कहा जा सकता. Why को “Y”, Happy Birthday को HBD, यहाँ तक की Girls को भी Gals बना दिया गया है. यह हालत तो तब है, जबकि प्रत्येक स्मार्टफोन में टाईप करते समय Auto-Correction का विकल्प भी होता है. मोबाईल का एप्प ही आपको सुझाता है की Wat की बजाय What लिखना चाहिए, या goin की बजाय Going लिखें, परन्तु “तेज गति वाली पीढ़ी” के बच्चे उसकी ओर भी ध्यान नहीं देते और अपनी मनमर्जी से कुछ भी ऊटपटांग टाईप करती चली जाती है.... ऐसा करने से भले ही आधे या एक मिनट का समय बच रहा हो, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बहुत खतरनाक होते हैं, क्योंकि धीरे-धीरे एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति को ऐसा विकृत और गलत लिखने की आदत पड़ जाती है. दिमाग में उन शब्दों का एक निश्चित चित्र बन जाता है और व्यक्ति हमेशा वैसा ही गलत टाईप करने लगता है. यह तो हुई अंगरेजी की बात. यही हालत हिन्दी की भी है. वैसे तो नई पीढ़ी में से अधिकांश बच्चे मोबाईल या पीसी पर हिन्दी में टाईप नहीं कर पाते, लेकिन जो भी कर पाते हैं वे अपने आधे-अधूरे हिन्दी ज्ञान के कारण सही शब्दों का चयन नहीं कर पाते और अर्थ का अनर्थ कर डालते हैं. कुछ ऐसे भी होते हैं जो हिन्दी शब्दों को रोमन में (अर्थात “मेरे को”, “तेरे को” शब्द Meko, Teko, तथा पड़ा को pada) लिखते हैं, जिससे पढने वाले के सामने उसकी स्थिति और भी हास्यास्पद हो जाती है. यह अधूरे ज्ञान की वजह से होता है. आजकल स्कूल के समय एवं पढ़ाई की गतिविधियों के कारण घरों में बच्चों द्वारा अंगरेजी/हिन्दी समाचार पत्र पढ़ना लगभग बंद ही हो गया है. इस कारण भाषा एवं व्याकरण के सही शब्द उन्हें पता ही नहीं चलते. स्कूल में भाषा और व्याकरण की जो पढ़ाई होती है, वह “मेकेनिकल” किस्म की होती है, बच्चा पढता है, रटता है और परीक्षा में जाकर उतार देता है. इसके अलावा भाषा और व्याकरण का सत्यानाश गूगल सर्च ने भी किया है. बच्चे अपने कोर्स के बाहर के किसी विषय पर अपने मन से अंगरेजी या हिन्दी में चार पेज भी नहीं लिख सकते. वे तुरंत गूगल बाबा की शरण में दौड़ लगाते हैं. इससे भाषा और व्याकरण कभी नहीं सुधरेगा. सबसे पहले घर में रोज सुबह कम से कम बीस मिनट कोई अंगरेजी या हिन्दी अखबार पढने की आदत डालें, सुबह पढ़े हुए अखबार में से उसी दिन रात को किसी भी विषय पर कम से कम एक पृष्ठ (जिसमें दस-पंद्रह मिनट लगेंगे) अपने दिमाग से लिखने की आदत डालें. सिर्फ इतना भर करने से मोबाईल और इंटरनेट के कारण जो भाषा विकृति आ रही है, उसे दूर किया जा सकता है. 

Posted on: 21 September 2016 | 9:32 pm

Velingkar, Goa Assembly and Sangh-BJP Dilemma

गोवा में “वेलिंगकर वैचारिक घमासान” :– संघ भाजपा की मुश्किलें जैसा कि सभी जानते हैं हाल ही में, गोवा प्रांत के संघ प्रमुख प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर को RSS ने सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया है. सुभाष वेलिंगकर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, फिर भी जो लोग नहीं जानते उनके लिए संक्षेप में यह जानना जरूरी है कि वेलिंगकर गोवा में संघ की ओर से नींव का पत्थर माने जाते हैं. जिस समय पूरे गोवा में संघ की केवल एक शाखा लगा करती थी, यानी लगभग पचास साल पहले, उसमें भी वेलिंगकर सहभागी हुआ करते थे. इन पचास-पचपन वर्षों में प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर ने मनोहर पर्रीकर से लेकर पार्सेकर जैसे कई भाजपा नेताओं को सिखाया-पढ़ाया और परदे के पीछे रहकर उन्हें राजनैतिक रूप से खड़ा करने में मदद की. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि सुभाष वेलिंगकर जैसे खाँटी संघी और जमीनी व्यक्ति को पदमुक्त करने की नौबत आ गई? इसकी जड़ में भाजपा को लगी सत्ता की लत और उनकी वादाखिलाफी. आईये देखते हैं कि आखिर हुआ क्या है... “वेटिकन पोषित” मीडिया ने हमें यह बताया है कि प्रोफ़ेसर वेलिंगकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का विरोध कर रहे थे, इसलिए उन्हें हटा दिया गया... लेकिन यह अर्धसत्य” है. असल में सन 1990 से गोवा सरकार की यह नीति रही है कि सरकार केवल कोंकणी और मराठी भाषा में पढ़ाने वाले प्राथमिक विद्यालयों को अनुदान देगी. इसका मतलब यह नहीं था कि गोवा में अंग्रेजी स्कूल नहीं चलेंगे, वे भी चलते रहे, लेकिन उन्हें शासकीय अनुदान नहीं मिलता था, वे चर्च के अपने निजी स्रोतों से पैसा लाते और स्कूल चलाते थे. अर्थात 2011 तक स्थिति यह थी कि कोंकणी भाषा में पढ़ाने वाले 135 स्कूल, मराठी भाषा में पढ़ाने वाले 40 स्कूल शासकीय अनुदान प्राप्त करते थे, और अंग्रेजी माध्यम के किसी भी स्कूल को अनुदान नहीं दिया जाता था. सन 2011 के काँग्रेस शासन में यह नीति बदली गई. चर्च और अंग्रेजी प्रेमी पालकों के दबाव में गोवा की काँग्रेस सरकार ने अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को भी शासकीय अनुदान देने की घोषणा कर दी. इसका नतीजा यह हुआ कि लगभग 130 स्कूल रातोंरात इसका फायदा उठाकर “केवल अंग्रेजी माध्यम” के स्कूल बन गए, ताकि अंग्रेजी के दीवानों को आकर्षित भी कर सकें और सरकारी अनुदान भी ले सकें. ये सभी स्कूल चर्च संचालित थे, जो उस समय तक मजबूरी में कोंकणी और मराठी भाषा के माध्यम से पढ़ाते थे, लेकिन चूँकि पढ़ने वाले बच्चों की संख्या काफी मात्रा में थी, इसलिए फीस का लालच तो था ही, इसलिए बन्द करने का सवाल ही नहीं उठता था, परन्तु जैसे ही “अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को भी” शासकीय अनुदान मिलेगा, यह घोषित हुआ, इन्होंने कोंकणी और मराठी भाषा को तिलांजली दे दी. 2012 में मनोहर पर्रीकर के नेतृत्त्व में गोवा विधानसभा का चुनाव लड़ा गया. इसमें पर्रीकर ने चर्च के साथ रणनीतिक गठबंधन किया लेकिन साथ ही संघ (यानी वेलिंगकर) को यह आश्वासन भी दिया कि अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को जो अनुदान दिया जा रहा है, वह बन्द कर देंगे. छः जून 2012 को पर्रीकर सरकार ने अधिसूचना जारी करके कहा कि सरकार अब पुनः कोंकणी और मराठी भाषा के स्कूलों को अनुदान देगी, लेकिन जो स्कूल 2011 में “केवल अंग्रेजी माध्यम” स्कूल में परिवर्तित हो गए हैं, उनकी सरकारी सहायता भी जारी रहेगी. यहाँ तक कि उस अधिसूचना में यह भी लिख दिया गया कि केवल वही अंग्रेजी माध्यम स्कूल, जो अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जाते हैं, उन्हीं को सरकारी पैसा मिलेगा. यह सरासर वेलिंगकर के “भारतीय भाषा बचाओ आंदोलन” और उनसे किए गए वादे के साथ धोखाधड़ी थी. इस निर्णय ने वेलिंगकर को बुरी तरह नाराज कर दिया, लेकिन चर्च के दबाव में पर्रीकर सरकार ने अपना निर्णय नहीं बदला. पर्रीकर के केन्द्र में जाने के बाद लक्ष्मीकांत पार्सेकर मुख्यमंत्री बने, और दस अगस्त को ही उन्होंने भी घोषणा कर दी कि अल्पसंख्यकों (यानी ईसाई) द्वारा संचालित अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को अनुदान जारी रहेगा. प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर के क्रोध की मूल वजह यह भी है कि गोवा की भाजपा सरकार ने शासकीय अनुदान की यह मिठाई “केवल” अल्पसंख्यक संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों को ही दी है. यानी यदि कोई हिन्दू व्यक्ति अंग्रेजी माध्यम का स्कूल चलाए तो उसे शासकीय अनुदान नहीं मिलेगा. भारत में शिक्षा को लेकर भेदभाव निजी अथवा सरकारी से ज्यादा “बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक” का है. इसीलिए मध्यान्ह भोजन से लेकर शिक्षा का अधिकार तक जब भी कोई क़ानून अथवा नियम बनाया जाता है, तो वह केवल बहुसंख्यकों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों पर सख्ती से लागू होता है, जबकि अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित स्कूलों को इसमें छूट मिलती है. वेलिंगकर के नाराज होने की असल वजह यही थी कि 1990 से लेकर 2011 तक जो नीति थी, उसी को भाजपा ने पुनः लागू क्यों नहीं किया? जबकि भाजपा खुद भी “भारतीय भाषाओं” और हिन्दी-मराठी-कोंकणी के प्रति अपना प्रेम जताती रही है, फिर सत्ता में आने के बाद चर्च के सामने घुटने टेकने की क्या जरूरत है? लेकिन चूँकि पर्रीकर को गोवा में जीत इसीलिए मिली थी कि चर्च ने उनका साथ दिया था, इसलिए वे चर्च के अहसानों तले दबे हुए थे. उधर केन्द्र में प्रकाश जावड़ेकर ने संसद में यह बयान देकर कि, “अल्पसंख्यक संस्थानों के शिक्षा व अनुदान नियमों के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी...” वेलिंगकर को और भी भड़का दिया. प्रोफ़ेसर वेलिंगकर पिछले कुछ वर्ष से कोंकणी और मराठी भाषा को बचाने के लिए “भारतीय भाषा बचाओ आंदोलन” (BBSM) के नाम से आंदोलन चलाए हुए हैं. संघ के तपे-तपाए नेता होने के कारण जनता को समझाने व एकत्रित करने में वे माहिर हैं, इसीलिए सैकड़ों जमीनी संघ कार्यकर्ता भी उनके साथ हैं. इस समस्या का एकमात्र हल यही है कि केन्द्र सरकार संविधान के 93वें संशोधन पर पुनर्विचार करे और शिक्षा का अधिकार क़ानून की पुनः समीक्षा करके उसमें समुचित बदलाव लाए. अन्यथा यह समस्या पूरे देश में चलती ही रहेगी और अल्पसंख्यक संस्थानों को हमेशा “रक्षा कवच” मिला रहेगा, और वे अपनी मनमानी करते रहेंगे. ईसाई संस्थाएँ अपने अनुसार अंग्रेजी को प्राथमिकताएँ देंगी जबकि मदरसा संचालित स्कूल उर्दू को. इस बीच बहुसंख्यक संचालित संस्थाओं का हिन्दी (एवं क्षेत्रीय भाषाओं) के माध्यमों से चलने वाले स्कूल दुर्दशा का शिकार बनेंगे और अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ता ही जाएगा. जापान, रूस, कोरिया व चीन जैसे कई देशों में यह सिद्ध हुआ है कि “प्राथमिक शिक्षा” केवल और केवल मातृभाषा में ही होना चाहिए, अन्यथा बच्चे के मानसिक विकास में बाधा आती है. अंग्रेजी को कक्षा आठ या दस के बाद लागू किया जा सकता है. वेलिंगकर का मूल सवाल यह है कि यदि पूरे देश में कई वर्षों से अंग्रेजी की शिक्षा प्राथमिक स्तर से दी जा रही है, फिर भी देश के युवाओं की अंग्रेजी का स्तर ऊँचा क्यों नहीं उठ रहा है? क्यों अमेरिका जाते समय उन्हें अंग्रेजी की विभिन्न परीक्षाओं में बैठना पड़ता है? बहरहाल, पिछले दो वर्ष से वेलिंगकर लगातार पर्रीकर और पार्सेकर पर शाब्दिक हमले करते रहे हैं. चूँकि वेलिंगकर भाजपा में किसी पद पर नहीं थे, इसलिए उन्हें कोई गंभीरता से नहीं सुन रहा था, परन्तु इस मुद्दे को लेकर वेलिंगकर के सैकड़ों समर्थकों ने जिस तरह गोवा दौरे के समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को काले झण्डे दिखाए थे, उसने मामला और बिगाड़ दिया है. संघ मुख्यालय ने इसे गंभीरता से लेते हुए अंततः प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर को बाहर का रास्ता दिखा ही दिया, और ऐसा लगता है कि आगे भी गोवा सरकार पर चर्च का दबाव एवं अंग्रेजी का प्रभुत्व बरकरार ही रहेगा. इस घटनाक्रम की राजनैतिक परिणति कैसे होती है यह तो जल्दी ही होने वाले विधानसभा चुनावों में पता चल ही जाएगी, लेकिन जिस तरह से वेलिंगकर के समर्थन में शिवसेना, भाजपा, संघ और खासकर महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के सदस्य खुल्लमखुल्ला रूप में जुड़ रहे हैं, उसे देखते हुए भाजपा की राह आसान नहीं होगी. स्वयं वेलिंगकर ने भी कहा है कि वे अपने संगठन BBSM के तहत गोवा की चालीस में से कम से कम 35 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करेंगे, और वे खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे. यदि गोमांतक पार्टी सरकार छोड़कर उनके साथ आती है तो वे उसका स्वागत करेंगे. उल्लेखनीय है कि गोमांतक पार्टी का भी मुख्य मुद्दा भाषा बचाओ, गोवा की मूल संस्कृति बचाओ ही रहा है. जिस तरह वेलिंगकर खुलेआम मनोहर पर्रीकर और पार्सेकर पर विभिन्न आरोप लगा रहे हैं, इससे लगता है कि मामला बेहद गंभीर है, क्योंकि प्रोफ़ेसर वेलिंगकर ने कभी भी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं दिखाई है. इस बीच पाँच सितम्बर की ताज़ा खबर यह है कि संघ से हटाए जाने के बावजूद वेलिंगकर ने कहा है कि वे पहले की तरह शाखा लगाते रहेंगे, अपनी रिपोर्ट नागपुर भेजते रहेंगे. बताया जाता है कि वेलिंगकर के मुख्य मुद्दे के समर्थन में संघ के लगभग दस हजार कार्यकर्ता भी हैं जो फिलहाल खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं. देखना होगा कि भाषा बचाओ आंदोलन और शिक्षा में चर्च के दखल का यह मुद्दा गोवा के निवासियों के दिल को कितना छूता है, लेकिन संघ और भाजपा ने जिस तरह से वेलिंगकर के मुद्दों को लटकाए रखा, उनसे वादाखिलाफी की और प्रकरण का बड़े ही भद्दे तरीके से समापन किया, वह पार्टी और खासकर विचारधारा के लिए निश्चित ही चिंताजनक बात है...

Posted on: 5 September 2016 | 8:33 am

DRDO Gift for Indian Soldiers - A Meat Technology

सैनिकों के लिए DRDO का तोहफा...सामान्यतः जब मटन को काट लिया जाता है, तब वह सामान्य परिस्थितियों में केवल छः घंटे ही बिना रेफ्रिजेरेशन के शुद्ध रह सकता है और यदि फ्रिज या बर्फ में रखा जाए तो दो दिनों तक सुरक्षित रह सकता है. मटन विक्रेताओं और कोल्ड स्टोरेज मालिकों/मैनेजरों के अनुसार कटे हुए मटन को दो दिनों के बाद फेंकना ही पड़ता है. लेकिन भारत के रक्षा अनुसन्धान की प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने इसका इलाज खोज निकाला है और एक ऐसे बैक्टीरिया का पता लगाया है जो मटन को एक सप्ताह से लेकर पन्द्रह दिनों तक एकदम ताजा रखेगा. मैसूर स्थित डिफेन्स रिसर्च लेबोरेटरी (DFRL) ने अनार के छिलकों से एक विशेष द्रव्य तैयार किया है, जिसे कटे हुए माँस पर छिडकने अथवा उसका इंजेक्शन लगाने पर उस मटन में उत्पन्न होने वाले हानिकारक बैक्टीरिया का नाश होगा और उसे सड़ने से बचाया जा सकेगा ताकि मटन का प्राकृतिक स्वाद और सुगंध बरकरार रहेगी. DFRL के वैज्ञानिकों ने आगे बताया कि उनका रिसर्च मुख्यतः मटन को लेकर ही था, लेकिन अनार के छिलकों से तैयार होने वाले इस उपयोगी द्रव्य को चिकन एवं पोर्क (सूअर के माँस) को भी सुरक्षित रखने में उपयोग किया जा सकेगा. वर्तमान में मटन को सुरक्षित रखने के लिए रासायनिक परिरक्षकों का उपयोग किया जाता है, यह रसायन इस मटन को अधिकतम बीस से चौबीस घंटे ही शुद्ध रख पाते थे, उसके बाद उसमें सड़ने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. भारत के सुदूर पहाड़ी, बर्फीले और समुद्री इलाकों में तैनात भारतीय सैनिकों को मैदानी इलाकों से भोजन के लिए मटन भेजा जाता है, लेकिन अक्सर वह उन्हें तुरंत ही खत्म करना होता है. कई बार लद्दाख, लेह, कारगिल, अंडमान जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भोजन सामग्री पहुँचाने वाले विमानों की उड़ान में देरी अथवा किसी अन्य कारण से सैनिकों को दिए जाने वाले मटन के खराब होने की नौबत आ जाती थी. अब DRDO के इस शोध के बाद यह स्थिति नहीं नहीं आएगी. DFRL के प्रमुख वैज्ञानिक पीई पत्की ने बताया कि अनार का छिलका एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है, और इससे उत्पन्न होने वाले “मित्र बैक्टीरिया” भोजन को सुरक्षित रखने में सहायक होते हैं. ऐसे में यदि मटन पर इसका छिड़काव किया जाए तो न सिर्फ सैनिकों को रासायनिक अपशिष्ट से बचाया जा सकेगा, बल्कि भोज्य पदार्थ प्राकृतिक रूप से लंबे समय तक सुरक्षित रखे जा सकेंगे. बर्फ अथवा कोल्ड स्टोरेज से बाहर रखने पर मटन में Escherichia coli, salmonella, campylobacter jenuni, Clostri-dium botulinum, Clostridium perfringens, जैसे कई हानिकारक बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं, जो कि खाने वाले के लिए घातक होते हैं. इन बैक्टीरिया से सिरदर्द, पेटदर्द, डायरिया जैसी बीमारियाँ आम होती हैं. पत्की के अनुसार इनसे बचाव के लिए जो रसायन छिड़के जाते हैं, वे भी एक-दो दिन बाद घातक रूप ग्रहण कर लेते हैं. इसलिए ऐसे किसी खाद्य रक्षक की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही थी, जो कि भोजन को लंबे समय तक शुद्ध और स्वादिष्ट बनाए रख सके. अंततः DRDO के वैज्ञानिकों की मेहनत सफल हुई और अनार के छिलकों से एक विशेष द्रव्य बना लिया गया, जो गीले-सूखे सभी पदार्थों, विशेषकर मटन-चिकन को आराम से पूरा सप्ताह भर सुरक्षित रख सकता है.

Posted on: 24 August 2016 | 10:00 am

Islamic Terror : History, Reason and Solution

इस्लामिक आतंकवाद : इतिहास, कारण और निवारण  जब रेतीले क्षेत्र में तूफ़ान आते हैं, उस समय शतुरमुर्ग अपना सिर रेत में धँसा लेता है और पृष्ठभाग को तूफ़ान की ओर कर लेता है. ऐसा करके शतुरमुर्ग सोचता है की शायद तूफ़ान टल जाएगा और वह बच जाएगा. इसी प्रकार जब बिल्ली दूध पी रही होती है, उस समय आँखें बंद कर लेती है, तात्कालिक रूप से उसे ऐसा महसूस होता है कि कोई उसे नहीं देख रहा. जबकि ऐसा होता नहीं है. तूफ़ान तो आता ही है और वह शतुरमुर्ग को उड़ा ले जाता है, उसके पंखों के तिनके-तिनके बिखेर देता है, जबकि आँख बंद करके दूध पीती हुई बिल्ली को लाठी पड़ जाती है. समूचे विश्व में पिछले दस-पंद्रह वर्षों से इस्लामिक आतंकवाद ने जिस तेजी से अपने पैर पसारे हैं, उसकी जड़ में गैर-इस्लामिक देशों और समुदायों का यही शतुरमुर्ग वाला रवैया रहा है. फ्रांस पर हुए हालिया “ट्रक बम” हमले के बाद विश्व में पहली बार किसी प्रमुख नेता ने ““इस्लामिक आतंकवाद”” शब्द का उपयोग किया है, वर्ना अमेरिका में जब मोहम्मद अत्ता ने हवाई जहाज लेकर ट्विन टावर गिराए थे, उस समय भी जॉर्ज बुश ने “इस्लामिक” शब्द को छोड़ दिया था, केवल “आतंकवाद” शब्द का उपयोग किया था. अर्थात “आतंकवाद” शब्द से “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द तक आते-आते शतुरमुर्गों को इतने वर्ष लग गए. खैर, देर आयद दुरुस्त आयद... फ्रांस के राष्ट्रपति ने “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द उपयोग करके संकेत दिया है कि कम से कम यूरोप और पश्चिमी देशों में ही सही, अब यह “बौद्धिक शतुरमुर्ग” अपना सिर रेत से निकालकर तूफ़ान की तरफ देखने और उसके खतरों को सही तरीके से समझने लगा है. आज चारों ओर “इस्लामिक स्टेट” नामक क्रूर और खूँखार आतंकी संगठन के चर्चे हैं. कुछ वर्ष पहले जब तक ओसामा जीवित था, तब “अल-कायदा” का डंका बजता था... और उससे भी पहले जब अफगानिस्तान में बुद्ध की प्रतिमा को उड़ाया गया था, तब “तालिबान” का नाम चलता था. लेकिन इस्लामिक आतंक के इन विभिन्न नामधारी चेहरों का मूल बीज कहाँ है, इसकी शुरुआत कहाँ से हुई?? अतः इस वैश्विक समस्या को समझने के लिए हमें थोडा और पीछे जाना होगा. पहले हम समस्या के बारे में समझते हैं, फिर इसका निदान क्या हो, इस पर चर्चा होगी... रणनीतिज्ञ सैयद अता हसनैन लिखते हैं कि आजकल किसी भी वैश्विक समस्या को हल करने के लिए नेताओं अथवा कूटनीतिज्ञों या बुद्धिजीवियों के पास इतिहास पढ़ने का समय कम ही होता है, और आम जनता तो बिलकुल हालिया इतिहास तक भूल जाती है, जिस कारण समस्या की गहराई को समझने में सभी गच्चा खा जाते हैं. कट्टर इस्लाम की अवधारणा के बारे में यदि बहस करनी है, अथवा वैश्विक आतंकवाद को समझना है तो सबसे पहले हमें इतिहास में पीछे-पीछे चलते जाना होगा. चौदह सौ वर्ष पीछे न भी जाएँ तो भी सन 1979 को हम एक मील का पत्थर मान सकते हैं. अयातुल्लाह खोमैनी की याद तो सभी पाठकों को होगी?? जी हाँ, इस्लामी आतंक को “वैश्विक” आयाम देने की शुरुआत करने वाले खुमैनी ही थे. आज हम सीरिया, ईराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जो खूनी खेल देख रहे हैं, इसके मूल में 1979 में घटी तीन प्रमुख घटनाएँ ही हैं. पहली घटना है खुमैनी द्वारा प्रवर्तित “ईरानी क्रान्ति”, जिसमें अयातुल्लाह खोमैनी ने ईरान के शाह रजा पहलवी को अपदस्थ करके सत्ता हथिया ली थी. इस दौर में तेहरान में अमेरिकी दूतावास के बावन राजनयिकों को 04 नवंबर 1979 से 20 जनवरी 1981 तक खोमैनी समर्थकों ने बंधक बनाकर रखा था. दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना भी 1979 में ही घटित हुई, जिसमें तत्कालीन सोवियत युनियन ने अफगानिस्तान में तख्तापलट करके अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका समर्थित और प्रशिक्षित “मुजाहिदीनों” एवं पाकिस्तान की मदद से लगातार नौ वर्ष तक रूस से युद्ध लड़ा. तीसरी घटना के बारे में अधिक लोग नहीं जानते हैं और ना ही इतिहास में यह अधिक प्रचारित हुई, वह थी सऊदी वहाबी सैनिकों के एक समूह “इख्वान” के एक सदस्य जुहामान-अल-तैयबी ने अपने समर्थकों के साथ मक्का में अल-मस्जिद-अल-हरम पर कब्ज़ा कर लिया. जुहामान ने यह कदम सऊदी राजवंश के कथित गैर-इस्लामी बर्ताव के विरोध में उठाया था, और इस घटना में उसके समर्थकों ने मक्का में आए हुए श्रध्दालुओं को चौदह दिनों तक बंधक बनाकर रखा. अंततः नवंबर 1979 में सऊदी राजवंश द्वारा फ्रांसीसी विशेष सुरक्षा बलों को बुलाया गया, जिन्होंने इस पवित्र मस्जिद में घुसकर इन आतंकियों का खात्मा किया था. केवल तीस दिनों के अंतराल में घटी इन तीनों घटनाओं ने दुनिया का चेहरा ही बदलकर रख दिया. जैसा कि सभी जानते हैं, ईरान के शाह एक अमेरिकी मोहरे के रूप में काम करने वाले एक तानाशाह भर थे और अयातुल्लाह खोमैनी नामक मौलवी ने इस्लाम के नाम पर ईरान के युवाओं को अमेरिका और पश्चिमी संस्कृति के खिलाफ भड़काकर सत्ता हासिल कर ली. सऊदी राजवंश के लिए हैरानी की बात यह थी इस्लाम के इस कट्टर रूप को उनके वहाबी आंदोलन से नहीं, बल्कि ईरान के शिया आंदोलन ने बढ़ाया. सऊदी अरब जो चतुराई के साथ कट्टर इस्लाम को बढ़ावा देने में लगा हुआ था, उसे यह देखकर झटका लगा कि “शिया” समुदाय उसके खेल में उससे आगे निकला जा रहा है. दूसरी बात यह थी कि काबा की उस पवित्र मस्जिद में “इख्वान” के आतंकियों ने जिस प्रकार नागरिकों और सुरक्षा बलों को दो सप्ताह तक बंधक बनाया और हत्याएँ कीं, और इसके जवाब में सऊदी राजशाही ने फ्रांसीसी सैनिकों को मस्जिद में घुसने की अनुमति दी, उसके कारण सऊदी राजपरिवार पर मस्जिद को अपवित्र करने के गंभीर आरोप लगने लगे थे. यानी उधर ईरान में शियाओं के नेता खुमैनी द्वारा कट्टरता को बढ़ावा देने और इधर सऊदी में मस्जिद को अपवित्र करने के आरोपों के चलते सऊदी अरब के राजपरिवार और इस्लामी मौलवियों ने अपने “वहाबी कट्टरता” को और तीखा स्वरूप देने का फैसला कर लिया. यही वह मोड़ था जहाँ से पेट्रो-डॉलर के बूते दुनिया में “इस्लामिक वहाबी” को क्रूर, तीखा और सर्वव्यापी बनाने की योजनाएँ शुरू हुईं. “कट्टर वहाबियत” को और हवा मिली अफगानिस्तान की घटनाओं से. रूस ने अफगानिस्तान के काबुल में अतिक्रमण करते हुए अपने कठपुतली बबरक करमाल की सरकार बनवा दी और जमकर शक्ति प्रदर्शन किया. इस कारण अफगानिस्तान से लगभग पचास लाख मुस्लिम शरणार्थी पड़ोसी पाकिस्तान और ईरान में भाग निकले. इस क्षेत्र में कच्चे तेल की प्रचुर मात्रा को देखते हुए सऊदी अरब में अड्डा जमाए बैठे अमेरिका को अपनी बादशाहत पर खतरा महसूस होने लगा और वह भी तालिबानों को प्रशिक्षण देकर रूस को कमज़ोर करने के इस हिंसक खेल में एक खिलाड़ी बन गया. “तेल के इस निराले खेल” के बारे में हम बाद में देखेंगे, पहले हम वहाबियत और सुन्नी आतंक के प्रसार पर आगे बढ़ते हैं. अफगानिस्तान में हुए इस घटनाक्रम ने सऊदी राजशाही को वहाबी विचारधारा फैलाने में खासी मदद की. उसने अमेरिका की मदद से पाकिस्तान की अफगान सीमा पर हजारों शरणार्थी कैम्प बनाए और उन कैम्पों को “तालिबान” का मानसिक प्रशिक्षण केन्द्र बना डाला. सऊदी ब्राण्ड मौलवियों ने इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में लाखों लोगों का जमकर “ब्रेनवॉश” किया, जो कि सऊदी राजशाही को पसंद आया, क्योंकि ऐसा करने से उसकी “कट्टर इस्लामी” छवि बरकरार रही और मुसलमान काबा की मस्जिद का अपवित्रीकरण वाला मामला भूल गए. इस खेल में सऊदी अरब को केवल पैसा लगाना था, बाकी का काम वहाबी काम मुल्ला-मौलवियों को और सैनिक कार्य अमेरिका को करना था. सोवियत संघ के अफगानिस्तान से चले जाने के बाद भी यह खेल जारी रहा और अन्य इस्लामिक देशों में पहुँचा. कहने का तात्पर्य यह है कि 1979 में घटित होने वाली इन्हीं प्रमुख घटनाओं ने मध्य एशिया में वहाबी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया और साथ ही मुसाब-अल-ज़रकावी (ISIS का जनक), ओसामा बिन लादेन और आयमान-अल-जवाहिरी जैसे कुख्यात आतंकियों को फलने-फूलने का मौका दिया. इन लोगों ने सऊदी पैसों का जमकर उपयोग करते हुए न सिर्फ अपना जलवा कायम किया, बल्कि “वहाबी इस्लाम की कट्टर विचारधारा को विश्वव्यापी बनाया, जिसका जहरीला व्यापक रूप हम इक्कीसवीं शताब्दी में देख रहे हैं. आतंक के इस वहाबी खेल में एक और खिलाड़ी सारे घटनाक्रम को चुपचाप देख रहा था और इसमें उसका और उसके देश का फायदा कैसे हो यह सोच रहा था... वह “खिलाड़ी”(?) था पाकिस्तान का जनरल जिया-उल-हक. विश्व में घट रहे इस घटनाक्रम ने जनरल ज़िया को यह मौका दिया कि वह खुद को जिन्ना के बाद पाकिस्तान के सबसे वफादार इस्लामिक रहनुमा के रूप में खुद को पेश कर सके. 1977 में जुल्फिकार अली भुट्टो को अपदस्थ करके सैनिक विद्रोह से तानाशाह बने जनरल जिया-उल-हक ने 1979 में भुट्टो को सूली पर लटका दिया था. जिया-उल-हक यह बात अच्छी तरह से समझ चुका था कि भारत से सीधे युद्ध में नहीं जीता जा सकता, क्योंकि पिछले दोनों युद्ध जिया ने करीब से देखे थे. भारत को नुक्सान पहुँचाने के लिए जनरल जिया ने “Thousand Cuts” नामक नई रणनीति बनाई, जिसमें भारत के अंदर ही अंदर विवादित मुद्दों को हवा देना, आतंकियों से हमले करवाना, सेना और नागरिकों पर छोटे-छोटे हमले करवाना प्रमुख था (जनरल ज़िया की यह रणनीति पाकिस्तान और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI आज भी जारी रखे हुए है). जनरल ज़िया ने समय रहते ताड़ लिया था कि अमेरिका-रूस-सऊदी अरब के इस “युद्ध त्रिकोण” में यदि अधिकतम फायदा उठाना है तो “वहाबी विचारधारा” को बढ़ावा देते हुए सऊदी अरब और अमेरिका से पैसा झटकते रहना है. जनरल ज़िया जानता था कि यदि सुरक्षित रहना है और अनंतकाल तक विश्व को ब्लैकमेल करना हो तो “परमाणु ताकत” बनना जरूरी है, और इस काम के लिए बहुत सा धन चाहिए, जो केवल सऊदी अरब और जेहाद के नाम पर ही हासिल किया जा सकता है. उसने ठीक ऐसा ही किया, एक तरफ लगातार भारत के खिलाफ छद्म युद्ध जारी रखा और दूसरी तरफ सऊदी अरब को खुश करने के लिए उनका प्रिय बना रहा. सऊदी अरब का अकूत धन, वहाबी विचारधारा और परमाणु ताकत बनने के लिए सारे इस्लामिक जगत का राजनैतिक समर्थन, ज़िया-उल-हक को और क्या चाहिए था. बड़ी चतुराई से जनरल ज़िया ने पाकिस्तान को वहाबी आतंक की मुख्य धुरी बना लिया. और चीन एवं उत्तर कोरिया की मदद से परमाणु ताकत हासिल करके अमेरिका को ब्लैकमेल करने की स्थिति में ला दिया. ज़िया-उल-हक ने सऊदी राजपरिवार और प्रशासन की सुरक्षा हेतु 1989 में पाकिस्तान से एक पूरी ब्रिगेड बनाकर दी. इसके अलावा उसने अफगान सीमा पर स्थित शरणार्थी कैम्प में मदरसों की खासी संख्या खड़ी कर दी, जहाँ कट्टर मौलवियों ने सोवियत संघ के खिलाफ मुजाहिदीन तालिबानों को तैयार कर दिया. इन्हीं मुजाहिदीनों ने इस्लाम के नाम पर लगातार अपना युद्ध जारी रखा और अंततः नब्बे के दशक में अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा कर ही लिया. इसके बाद तालिबान कश्मीर, बोस्निया, चेचन्या सहित बाकी विश्व में फैलना शुरू हो गए. अस्सी के दशक के अंत तक वहाबी विचारधारा और आतंक को मजबूत करने का यह खेल लगातार जारी रहा, क्योंकि वहाबियों को किसी भी कीमत पर ईरान के “शियाओं” के साथ शक्ति संतुलन में अपना वर्चस्व बनाए रखना था. इसीलिए जब से ईरान ने भी अपनी परमाणु शक्ति बढ़ाने का खुल्लमखुल्ला ऐलान कर दिया तो वहाबी पाकिस्तान अपने इस्लामिक परमाणु एकाधिकार को लेकर चिंतित हो गया. शिया ईरान को रोकने के लिए वहाबी विचारक अमेरिका की चमचागिरी से लेकर अन्य किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे. अमेरिका ने इन दोनों का बड़े ही शातिराना ढंग से उपयोग किया और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने तथा उपभोगवादी जनता के लिए इन देशों से जमकर तेल चूसा. अमेरिका के इस खेल को सबसे पहली चुनौती मिली इराक के सद्दाम हुसैन से. सद्दाम हुसैन ने अमेरिका का खेल समझ लिया था और उसने सोचा कि क्यों न वह खुद ही इस खेल को खेले और ईराक को ईरान के मुकाबले मजबूत बना ले. इसी मुगालते में सद्दाम ने कुवैत पर हमला कर दिया और दर्जनों हत्याओं के साथ कुवैत के सैकड़ों तेल कुंए जला डाले. लेकिन सद्दाम का यह दुस्साहस उसे भारी पड़ा. अमेरिका से सीधी दुश्मनी और तेल पर कब्जे की लड़ाई में खुद तनकर खड़े होने अमेरिका को रास नहीं आया और उसने सद्दाम को ठिकाने लगाने के लिए नए जाल बुनने शुरू कर दिए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस्लामी अर्थात वहाबी विचारधारा से पोषित आतंकवाद को समझने के लिए इस इतिहास को खंगालना बेहद जरूरी है. खुमैनी, सऊदी अरब और ज़िया-उल-हक की तिकड़ी तथा अमेरिका-रूस के बीच वैश्विक वर्चस्व की इस लड़ाई ने आतंकवाद को पोसने में बड़ी भूमिका निभाई... आज फ्रांस, फ्लोरिडा, बेल्जियम, ढाका आदि में जो लगातार हमले हम देख रहे हैं, वह इसी ऐतिहासिक “रक्तबीज” के अंश ही हैं. किसी समस्या को जड़-मूल से ख़त्म करने के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक सबसे पहले उस बीमारी का इतिहास जानते हैं, फिर कारण जानते हैं और उसी के अनुसार निवारण भी करते हैं. अभी जो हमने देखा वह इस्लामिक आतंकवाद की जड़ को, उसके इतिहास को समझने का प्रयास था. अब हम आते हैं कारण की ओर. आतंकवाद वर्तमान समय में इस विश्व की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है, ऐसी समस्या जो कम होने की बजाय लगातार बढती ही जा रही है. यह समस्या ऐसा गंभीर रोग बन गयी है जिसका आज तक समाधान नहीं निकल पाया है. इस्लामिक आतंकवाद की इस समस्या को समझने के लिए सबसे पहले तो विश्व के तमाम नेताओं, लेखकों, बुद्धिजीवियों को यह समझना और मान्य करना होगा कि इसका सीधा सम्बन्ध मज़हबी व्याख्याओं से है. इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने के लिए सैनिक, गोला-बारूद और टैंक कतई पर्याप्त नहीं हैं. जब तक हम शार्ली हेब्दो के कार्टून पर फ्रांस में मचाए गए कत्लेआम, अथवा डेनमार्क के कार्टूनिस्ट की हत्या अथवा सलमान रश्दी के खिलाफ फतवे अथवा यजीदी महिलाओं के साथ बलात्कार और उन्हें गुलामों की तरह खरीदे-बेचे जाने के पीछे की मानसिकता को नहीं समझते, और स्वीकार करते तब तक सभी लोग केवल अँधेरे में तीर चला रहे होंगे और अनंतकाल तक चलने वाले इस युद्ध में खुद को झोंके रखेंगे. जिस तरह फ्रांस के राष्ट्रपति अथवा अमेरिका के राष्ट्रपति उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम कहा, उसी तरह स्वीकार कीजिए कि इस्लाम की शिक्षाओं एवं कुरआन की व्याख्याओं के गलत-सलत अनुवादों एवं मुल्ला-मौलवियों द्वारा मनमाने तरीके से हदीस और शरीयत को लागू करने के कारण ही यह समस्या नासूर बनी है. यह एक तरह से मलेरिया के खिलाफ युद्ध है. केवल मच्छर मारने अथवा कुनैन की गोली खिलाने से मरीज की बात नहीं बनेगी, बल्कि जिस गंदे पानी में मलेरिया के लार्वा पनप रहे हैं, जहां से प्रेरणा ले रहे हैं, उस पानी में दवा का छिड़काव जरूरी है. अर्थात मूल समस्या यह है की इस्लामिक धर्मगुरुओं द्वारा मनमाने तरीके से कुरआन-हदीस की व्याख्या की गई है, सबसे पहले बौद्धिक रूप से युद्ध करके उसे दुरुस्त करना पड़ेगा. भारत के इस्लामिक बुद्धिजीवी मौलाना वहीदुद्दीन खान ने समस्या की जड़ को बिलकुल सही पकड़ा है. वहीदुद्दीन लिखते हैं कि चूंकि विभिन्न देशों में कार्यरत मौलवियों, उलेमाओं और काज़ियों की उनके इलाके की जनता पर खासी पकड़ होती है, इसलिए वे चाहते हैं कि उनका यह वर्चस्व बना रहे, इसलिए तात्कालिक परिस्थितियों के मुताबिक़ वे कुरआन-हदीस और शरीयत के मनमाने मतलब निकालकर मुस्लिम समुदाय को दबाए रखते हैं. कुछ मौलवी तो इस हद तक चले जाते हैं, कि उनके अलावा कोई दूसरा मुसलमान कुरआन की व्याख्या कर ही नहीं सकता. मौलाना वहीदुद्दीन खान के अनुसार कुरआन के नाज़िल होने के पश्चात कई वर्षों तक इस्लामिक समाज के नियमों एवं मान्यताओं पर कई विद्वानों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या की जिसे तत्कालीन शासकों का समर्थन भी मिलता रहा, और धीरे-धीरे यह मान लिया गया कि यह सब कुरआन में ही है और मौलवी कह रहे हैं तो सही ही होगा. एक और इस्लामिक विद्वान तारेक फतह कहते हैं कि पैगम्बर मोहम्मद द्वारा पूरी कुरआन लगभग तेईस वर्ष में नाज़िल की गई. ईस्वी सन 632 में पैगम्बर मोहम्मद की मृत्यु के पश्चात ही विवाद शुरू हो गए थे. अपनी पुस्तक में तारिक लिखते हैं की पैगम्बर मोहम्मद की जीवनी जिसे सूरा कहते हैं, लगभग सौ वर्ष बाद लिखी गई, इसी प्रकार हदीस को भी लगभग दो सौ से चार सौ वर्षों के बीच लगातार लिखा जाता रहा. जबकि शरीयत क़ानून पैगम्बर की मौत के चार सौ से छः सौ वर्ष बाद तक लिखे जाते रहे, उसमें बदलाव होते रहे, उसकी मनमानी व्याख्याएँ की जाती रहीं. इस्लाम की सबसे कट्टर व्याख्याएँ अब्दुल वहाब (1703-1792) द्वारा की गईं. सन 1803 से 1813 तक मक्का पर सऊदी नियंत्रण था, उसके बाद ओटोमान ने इसे वापस हासिल किया. हालांकि अंत में 1925 में यह पुनः सऊदी कब्जे में आया और सऊदी साम्राज्य ने मक्का-मदीना की लगभग 90% इमारतें गिरा दीं, यहाँ तक की जिसमें खुद पैगम्बर मोहम्मद रहते थे उस इमारत को भी नहीं छोड़ा. अब ये कट्टर वहाबी रूप इस कदर फ़ैल गया है की ISIS ने भी विभिन्न मज़ारों और इस्लाम की ऐतिहासिक धरोहरों को ही नष्ट करना शुरू कर दिया है. ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस्लाम की धार्मिक व्याख्याओं में कितना घालमेल है, और इसी वजह से भारत में जाकिर नाईक, पाकिस्तान में अल-जवाहिरी अथवा ब्रिटेन में अंजेम चौधरी जैसे तथाकथित इस्लामिक विद्वान बड़ी आसानी से युवाओं को बरगला लेते हैं. इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद निश्चित रूप से एक चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति थे, उन्होंने अपनी प्रत्येक रणनीति को सीधे “अल्लाह” से जोड़ दिया और अपने प्रत्येक विरोधी को काफ़िर घोषित कर दिया. तत्कालीन परिस्थितियों में उनकी वह रणनीति कामयाब भी रही, लेकिन उनकी मृत्यु के पश्चात इसी विचार को आगे बढाते हुए ढेरों मौलवियों ने सैकड़ों वर्ष तक कुरआन की मनमानी व्याख्या की. ऐसे में इस विचारधारा का मुकाबला केवल गोलियों-बम-बन्दूकों से संभव नहीं है, इसे तो बौद्धिक स्तर पर लड़ना होगा. वहाबी इस्लाम तो शियाओं के साथ सहा-अस्तित्त्व को भी राजी नहीं है. वहाबी मूवमेंट में निशाने पर सबसे पहले शिया ही रहे हैं, जिनका अस्तित्व खत्म करने के लिए सऊदी अरब पोषित इस्लाम ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. अतः कोई यह कैसे कह सकता है कि, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता? परन्तु आतंकी तो मौलवियों द्वारा इस्लाम की गलत व्याख्या के कारण इसे अल्लाह और कुरान का आदेश मानते हैं. मुस्लिम समुदाय के अन्दर से आवाज़ उठनी चाहिए कि वे ऐसे आरोपों से बचना चाहते हैं. ये लोग खुलकर आतंकवाद के खिलाफ आगे आएँ और कहें कि आतंकवादी अपने साथ इस्लाम शब्द को जोड़ना बंद करें. अपने कुकर्मों को अल्लाह या कुरान का आदेश बताना बंद करें. तमाम आतंकी संगठनों के नाम में इस्लाम के पवित्र शब्दों को रखना बंद करें. क्योंकि जब तक मुस्लिम समुदाय खुद को नहीं बदलता, और अपनी मजहबी संकीर्ण सोच खत्म करके आतंकियों, मुल्ला-मौलवियों के खिलाफ उठ खड़ा नहीं होता, तब तक उसे ऐसे आरोप झेलने ही पड़ेंगे. ज़ाहिर है कि यह काम इस्लाम के भीतर से ही होगा, बाहर से कोई गैर-इस्लामी व्यक्ति इस बहस में घुसेगा तो न सिर्फ मुंह की खाएगा, बल्कि उसकी मंशा पर भी शक किया जाएगा. इसलिए तारिक फतह, तसलीमा नसरीन, सलमान रश्दी, मौलाना वहीदुद्दीन खान, जूडी जेसर, अली सिना, इमरान फिरासत जैसे लोगों को आगे आना होगा, विमर्श आरम्भ करने होंगे, विभिन्न देशों में स्थित मुसलमानों को इस्लाम की सही व्याख्या करके दिखानी होगी, सेमिनार-पुस्तकें इत्यादि आयोजित करने होंगे. लेकिन साथ ही साथ आतंकियों के सामने घुटने नहीं टेकने की ठोस नीति बनानी होगी. इसीलिए विभिन्न सरकारों, गुप्तचर सेवाओं को साथ लेना होगा, तथा विशेषकर पाकिस्तान (जो इस आतंक का वैचारिक पोषक है) पर नकेल कसनी होगी. ये तो हुआ पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम यानी कट्टर इस्लाम का उदार इस्लाम से बौद्धिक युद्ध. इसी के साथ जुडी हुई वैचारिक भ्रान्तियों को भी दूर करने की जरूरत है. यह वैचारिक भ्रान्तियाँ वामपंथियों तथा सेकुलर बुद्धिजीवियों ने फैला रखी हैं. जिसमें से सबसे पहली भ्रान्ति है कि – “ये आतंकी गरीब और अनपढ़ हैं, इसलिए मौलवियों के जाल में फँस जाते हैं”. यह सबसे बड़ा झूठ है जो चरणबद्ध तरीके से फैलाया गया है, क्योंकि खुद ओसामा बिन लादेन अरबपति था, अच्छा-ख़ासा पढ़ा लिखा था. ट्विन टावर से हवाई जहाज भिड़ाने वाला मोहम्मद अत्ता पायलट था, बंगलौर से ISIS का ट्विटर हैंडल चलाने वाला प्रमुख स्लीपर सेल सॉफ्टवेयर इंजीनियर है. यानी कि पेट्रो-डॉलर में अरबों रूपए कमाने वाले देशों द्वारा बाकायदा जिन मुस्लिम लड़कों का ब्रेनवॉश किया जाता है, उनमें से अधिकाँश पढ़े-लिखे इंजीनियर, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर कर्मी तथा मैनेजमेंट स्तर की पढ़ाई कर चुके लोग हैं. ज़ाहिर है कि शिक्षा की कमी वाला तर्क एकदम बेकार है... इसी प्रकार यह कहना भी एकदम बकवास है कि मुस्लिम आतंक के पीछे शोषण या गरीबी है. जब “तथाकथित” बुद्धिजीवी यह बहानेबाजी बन्द कर देंगे कि इस्लामिक आतंक की समस्या शोषण, गरीबी, अथवा अशिक्षा है, तभी इस समस्या का हल निकाला जा सकता है, क्योंकि यह सिद्ध हो चुका है कि यह समस्या केवल और केवल मौलवियों तथा निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा कुरआन-हदीस-शरीयत की गलत व्याख्या और जेहाद तथा बहत्तर हूरों जैसी कहानियाँ सुनाकर मज़हबी वैचारिक ज़हर फैलाने के कारण है. इसका मुकाबला करने के लिए वैचारिक पाखण्ड छोड़ना पड़ेगा, और मिलकर काम करना होगा. जहाँ-जहाँ सैनिक शक्ति जरूरी है, वह तो सरकारें कर ही रही हैं, परन्तु बौद्धिक युद्ध ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. इस्लामी जगत में बच्चों को वैचारिक रूप से जागरूक बनाना होगा, उनके सामने इस्लाम की सही तस्वीर पेश करनी होगी और जवाहिरी-लादेन-ज़ाकिर-अंजुम जैसे इस्लाम को विकृत करने वाले प्रचारकों पर लगाम कसनी होगी. इस्लामिक आतंकवाद की समस्या का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है, जो कि अर्थव्यवस्था और धन से जुड़ा हुआ है और इस पहलू पर भी केवल इस्लामिक देशों द्वारा ही काबू पाया जा सकता है. यह पहलू है कच्चे तेल से जुडी राजनीति का. विश्व की महाशक्तियाँ इस्लामी देशों से निकलने वाले तेल पर शुरू से निगाह बनाए हुए हैं. कच्चे तेल के बैरलों की भूख ने दुनिया में लाखों मासूमों का खून बहाया है. उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने सऊदी अरब के राजपरिवार पर लगभग कब्ज़ा किया हुआ है. अमेरिका ने सऊदी अरब में अपना स्थायी अड्डा जमा रखा है. सभी जानते हैं कि अमेरिका महा-उपभोगवादी देश है और पेट्रोल का प्यासा है. सबसे पहले अमेरिका ने ही “तेल का खेल” शुरू किया और सऊदी अरब को अपने जाल में फँसाया. सद्दाम हुसैन पर नकली आरोप मढ़कर ईराक को बर्बाद करने और वहाँ के तेल कुओं से कच्चा तेल हथियाने का खेल भी अमेरिका ने ही खेला. अमेरिका की देखादेखी रूस भी इस खेल में कूदा और दस साल तक अफगानिस्तान में जमा रहा. चाहे नाईजीरिया हो, अथवा वेनेजुएला हो.. जिस-जिस देश में अकूत तेल की सम्पदा है, वहाँ-वहाँ अमेरिका की टेढ़ी निगाह जरूर पड़ती है. हाल ही में तुर्की में हुए जी20 शिखर सम्मेलन के मौके पर दुनिया के सभी देशों ने पेरिस में हुए आंतकी हमले की भरसक निंदा की. परन्तु सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने हैरतअंगेज खुलासा किया कि दुनिया के चालीस से अधिक देश आंतकवाद को फाइनेंस कर रहे हैं, और इसमें से कई देश जी20 समूह में शामिल हैं. पुतिन ने इन देशों के नाम तो नहीं लिया लेकिन यह जरूर साफ किया कि इनमें से कुछ ऐसे देश हैं, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हैं. चूँकि जी20 समूह दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है. इनमें अमेरिका, चीन, फ्रांस, सउदी अरब, ब्राजील और भारत या खुद रूस भी हो सकता है. पिछले एक साल में जिस तरह से इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने काला झंडा उठा रखा है और सीरिया तथा ईराक के तेल के भंडारों पर कब्जा किया है, उससे साफ है कि यह आतंकवाद का नया दौर है, जहां एक इस्लामिक कट्टर संगठन एक स्वयंभू “राज्य” बनने की कोशिश कर रहा है. पश्चिमी मीडिया और कच्चे तेल के कारोबार से जुड़े संगठन दावा कर चुके हैं, कि ISIS अपने कब्जे वाले तेल के भंडारों से तेल निकाल कर बहुत कम दामों पर बेच रहा है. जिस कारण तेल की कीमतों के अन्तर्राष्ट्रीय भावों में अस्थिरता बनी हुई है और कई देश इस उतार-चढ़ाव की चपेट में हैं. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पिछले एक साल से कच्चा तेल 110 डॉलर के स्तर से गिरकर 40 डॉलर के आसपास बिक रहा है. उधर ओपेक देशों (जिनमें सभी इस्लामिक देश हैं) की आपसी खींचतान में ईराक सरकार के तेल भंडारों से जमकर तेल निकाला जा रहा है. तेल के बाजार में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए ईराक सरकार को 30 डॉलर प्रति बैरल की दर पर कच्चा तेल बेचना पड़ रहा है. जबकि उधर ISIS अपने कब्जे वाले भंडारों से तेल निकाल कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में 20 डॉलर प्रति बैरल की दर से बेच रहा है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन के अनुसार रूस ने अपने सैटेलाइट के द्वारा देखा है कि ISIS के कब्जे वाले इलाकों में हजारों की संख्या में कच्चा तेल लेने के लिए टैंकरों के भीड़ लगी हुई है.  अब यहाँ सवाल उठता है कि जब ISIS बीस डॉलर की दर से तेल बेच रहा है और करोड़ों रूपए कमा रहा है तो यह पैसा कहाँ जा रहा है? ज़ाहिर है कि हथियार और अन्य सैन्य उपकरण खरीदने में. विश्व में हथियारों का सबसे बड़ा विक्रेता कौन है, अमेरिका. अर्थात घूम-फिरकर पैसा पुनः अमेरिका के पास ही पहुँच रहा है. तमाम इस्लामिक आतंकी संगठन दावा करते हैं कि अमेरिका और इजरायल उनके दुश्मन नंबर वन हैं, लेकिन वास्तव में देखा जाए तो “कच्चे तेल के इस आर्थिक गेम” में सबसे बड़ा खिलाड़ी, अम्पायर और विपक्ष खुद अमेरिका ही है. इस्लामिक देशों के शासक या तो बेवकूफ हैं, या लालची हैं. अमेरिका ने सऊदी अरब में अपनी मनमर्जी चला रखी है, इसी तरह “ओपेक” देशों में से कई देशों में उसकी कठपुतली सरकारें काम कर रही हैं. परन्तु गलती अकेले अमेरिका की ही क्यों मानी जाए? मुस्लिम बुद्धिजीवी और इस्लामिक जगत के प्रभावशाली लोग इन इस्लामी शासकों को यह बात क्यों नहीं समझाते कि जब तक पश्चिमी देशों का दखल इस इलाके में बना रहेगा, तब तक आपस में युद्ध भी चलते रहेंगे, मारकाट और आतंक भी पाला-पोसा जाता रहेगा. हमेशा से अमेरिका के दोनों हाथों में लड्डू रहते हैं. ईरान-ईराक के दस वर्ष लंबे युद्ध में दोनों देशों को हथियार बेचकर सबसे अधिक कमाई अमेरिका ने ही की. जब युद्ध समाप्त हो गया, तब भी विभिन्न बहाने बनाकर वह क्षेत्र में पैर जमाए बैठा रहा. रूस और चीन, अमेरिका का यह खेल समझते हैं परन्तु खुलकर उससे दुश्मनी लेने से बचते रहे हैं. यदि अमेरिका और पश्चिमी देश चाहें तो कभी भी ISIS का खात्मा कर सकते हैं, लेकिन फिर बीस डॉलर के भाव से मिलने वाला कच्चा तेल भी मिलना बन्द हो जाएगा और हथियारों की बिक्री भी बन्द हो जाएगी. अंत में संक्षेप में इतना ही कहना है कि “इस्लामिक आतंकवाद” की समस्या केवल जलेबी ही नहीं बल्कि इमरती और नूडल्स की तरह टेढ़ी-मेढ़ी और उलझी हुई है. इसमें कई पक्ष आपस में एक-दूसरे से टकरा रहे हैं. फिर भी जैसा कि लेख में सुझाया गया है, यदि इस्लामिक विद्वान और बुद्धिजीवी कुरआन-हदीस की सही और सटीक व्याख्याएँ करके आने वाली पीढ़ी को जेहादी मानसिकता से दूर ले जाने में सफल हों तथा इस्लामिक देश अपने यहाँ अमेरिका व पश्चिमी देशों का दखल बन्द करके अपने लालच (और मूर्खता) में कमी लाएँ, तो काफी हद तक इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है. ज़ाहिर है कि ये उपाय अपनाना इतना सरल भी नहीं है, तो लड़ाई लंबी है. कल फ्रांस था, आज इस्ताम्बुल है, तो कल बाली या परसों कोलकाता भी हो सकता है और मानवता के पैरोकार व शांति की चाहत रखने वाले सामान्य मनुष्य के लिए फिलहाल तो कोई राहत नहीं है... 

Posted on: 31 July 2016 | 11:09 am

Communist, Atheists - A Fraud

वामपंथी नास्तिकता : झूठ और धूर्तता (आशीष छारी जी की फेसबुक पोस्ट से साभार) कुछ दिन पहले जावेद अख्तर बड़े फकर से कह रहे थे कि वे एथीस्ट हैं, एथीस्ट मने नास्तिक....... बतला रहे थे कि जवान होते होते वे एथीस्ट हो गए थे, वे किसी अल्लाह को नहीं मानते, कभी रोज़ा नहीं रखा, मस्जिद नहीं गए नमाज़ नहीं पढ़े...... टोटल एथीस्ट....,,., लेकिन जब भी मैं इनकी दीवार फ़िल्म देखता हूँ तो चक्कर खा जाता हूँ, शक होता है कि ये एथीस्ट झूठ तो नहीं बोल रहा कहीं....... फ़िल्म देखिये, फ़िल्म में क्या दिखाया है कि वर्मा जी का लौंडा विजय (अमिताभ बच्चन) बचपन से ही भगवान से रूठ जाता है, मंदिर नहीं जाता, अपनी माँ सुमित्रा (निरुपमा रॉय) के कहने पर भी मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता...... जोर जबरदस्ती करने पर मंदिर का पुजारी टोक देता है, नहीं बहन भगवान् की पूजा जोर जबरदस्ती से नहीं होती श्रद्धा से होती जब इसके दिल में श्रद्धा जागेगी तब ये खुद ही मंदिर आ जाएगा....... वाह कितनी प्यारी बात कहीं पुजारी ने, खैर अच्छा था कि जगह मंदिर थी और सामने पुजारी था, कहीं मस्जिद होती और सामने मौलवी साहब होते तो पक्का फतवा जारी हो जाता...... ला हॉल विला कूवत इल्ला बिल्ला अल्लाह की तौहीन की है इस लौंडे ने, दीन को मानने से मना किया है इसने, ये काफ़िर हो चुका है, काफिरों के लिए मुताबिक ए दीन बस एक ही सजा है..... मुरतीद मुरतीद..... मने सर कलम कर फुटबॉल खेली जाए........ हुक्म की तालीम हो...... हेहेहे..... खैर छोड़िये, पिछली बात पे वापस आते हैं, तो मामला ये है कि पूरी फ़िल्म में विजय भगवान से छत्तीस का आंकड़ा बना कर चलता है, जताया कुछ यूँ गया है कि फ़िल्म का नायक भगवान् को नहीं मानता और मंदिर नहीं जाता......... मने एथीस्ट हो चुका है पर जब डॉकयार्ड पर काम करने वाले रहीम चच्चा विजय को उसकी बांह पर बंधे 786 नंबर के लॉकेट के बारे में इल्म देते हैं, कि बेटा 786 का मतलब होता है बिस्मिल्लाह, इसे हम लोगों में बड़ा मुबारक समझा जाता है......... सामन्त के आदमी की चलाई गोली जब विजय को लगती है, और बिल्ले की वजह से विजय बच जाता है तब विजय को इल्हाम होता है कि 786 नंबर तो बड़ा पावरफुल है तब वो बिल्ले को बार बार चूमता है और हमेशा अपने पास सीने से लगा कर रखता है और चूमता रहता है मने एक एथीस्ट को बिस्मिल्लाह में तो विश्वास है लेकिन भगवान में नहीं............. सियापे की हद तो देखिये जब विजय की माँ बीमार होती है, जिंदगी और मौत से जूझ रही होती है तब विजय को मंदिर की याद आती है अल्लाह मियाँ फ्रेम से ग़ायब हो जाते हैं...... मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ विजय भगवान् के सामने खड़ा है और कहता है- मैं आज तक तेरी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा...... अब कोई पूछे कि bc अब क्यों चढ़ा बे........ मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा....... तो अब क्यों मांग रहा है भो%* के............ बताओ भला अब ये क्या बात हुयी यार, वैसे एथीस्ट हैं, मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ेंगे पर बिस्मिल्लाह (786) को चूमेंगे दिन में दस बार, छाती से चिपका कर रखेंगे और कहीं कुछ गलत हो जाए तो भगवान् की ऐसी-तैसी करेंगे, शुरू हो जाएंगे भगवन को हूल-पट्टी देने....... जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि वे शुरू से एथीस्ट रहे हैं लेकिन फ़िल्म की कहानी लिखते समय इस्लाम की ओर झुक जाते हैं, उनका नायक एथीस्ट है, भगवान को नहीं मानता लेकिन अल्लाह और 786 को पूरी शिद्दत से मानता है, ये कैसा एथिस्टपना हुआ........ ये तो बिलकुल वैसा ही हुआ जैसे उमर खालिद की बहन कहती है कि उसका भाई किसी इस्लाम को नहीं मानता लेकिन नारे वो JNU में इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह के लगवाता है और पूरी शिद्दत से अपनी कौम के प्रति पूरी निष्ठा निभाते हुए हर मुस्लिम की तरह दूसरे मुस्लिम (अफज़ल गुरु) के प्रति पूरी वफादारी रखता है............ पिताजी जब ज़िंदा थे तो वे बताते थे कि जब ये फ़िल्म दीवार आई थी तब बहुत से लौंडे खुद को अमिताभ बच्चन समझकर मंदिर की सीढ़ियों पर मुंह फुलाये बैठे देखे जाते थे, मेले ठेलों से 786 के लॉकेट और बिल्ले खरीदकर अपनी चौड़े कॉलर की नीली शर्ट की ऊपरी जेब जो दिल के पास होती है उसमें खूब रखते देखे जाते थे......... खैर मैं फ़िल्में बहुत देखता हूँ और फिल्मों में अक्सर देखता है कि फ़िल्म का हिन्दू नायक भगवान में विश्वास नहीं रखता, मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता, प्रसाद नहीं खाता वगैरह वगैरह लेकिन आज तक किसी मुस्लिम या ईसाई नायक को अल्लाह या गॉड की खिलाफत करते नहीं देखा......... मस्जिद या गिरजे की सीढ़ियों पर बैठे नहीं देखा...... अल्लाह या गॉड से मुंह फुलाये नहीं बल्कि अपने मजहब के प्रति पूरी निष्ठा रखते जरूर देखा है....... दिखाया जाता है कि फ़िल्म के मुस्लिम या ईसाई नायक का अपने रिलिजन में पूरा पूरा फेथ रखता है बस असली गड़बड़ तो हीरो को भगवान् से है........ ये फिल्मों का ही असर है कि जब मैंने कई सुतियों को खुद को किसी फ़िल्मी नायक की तरह आज भी भगवान से मुंह फुलाये मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे देखा है....... एथीस्ट होना तो जैसे आजकल फैशन हो गया है वैसे ही जैसे JNU में हो गया है..... मैं फ़िल्मी एथीस्ट और JNU छाप एथीस्ट में बहुत समानता पाता हूँ........ फ़िल्मी एथीस्ट की लड़ाई सिर्फ भगवान से है बाकी अल्लाह और गॉड से उसे कोई दिक्कत नहीं, ठीक ऐसे ही JNU छाप एथीस्ट भी भगवान् के पीछे लठ्ठ लिए फिरते हैं....... देवी दुर्गा एक हिन्दू मिथक है लेकिन महिषासुर वास्तविकता है, माँ दुर्गा की पूजा करना अन्धविश्वास है लेकिन महिषासुर को पूजना आधुनिकता है......... राम राम बोलना कट्टरता है लेकिन इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह बोलना धार्मिकता है, दिवाली होली मनाना बुजुरुआ बोडमता का प्रतीक है लेकिन ईद और क्रिसमस मनाना साम्यवादिता का लोगो है, JNU कम्युनिस्ट कहते हैं कि वे एथीस्ट हैं धर्म उनके लिए अफीम है लेकिन उनका एथीसिस्म इस्लाम और ईसाईयत को रसगुल्ला समझता है और हिंदुत्व को अफीम, गांजा, चरस, कोकीन, हेरोइन......... सारी हूल-पट्टी भगवान् के लिए रख जोड़ी हैं बाकी अल्लाह या गॉड के लिए चूमा चाटी का इल्हाम है, बड़ा अजीब एथीसिस्म है यार इनका....... मैंने दुनिया में कई एथीस्ट ऐसे देखे हैं जिनका एथीस्टपना सभी मजहब के लिए बराबर होता है, वे जिनती ईमानदारी से दूसरे धर्म की कमियां निकालते हैं उससे अधिक ईमानदारी दिखाते हुए वे अपने धर्म की बखिया उधेड़ देते हैं लेकिन JNU में एथीस्ट होने के मायने थोड़ा अलग है बिकुल दीवार फ़िल्म के नायक के जैसे........... भगवान् से रूठकर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाइए लेकिन जैसे ही 786 का बिल्ला मिले तो उसको चुमिये, माथे से लगाइये........ दरअसल JNU ही नहीं पूरे देश में एथीस्ट होने का मतलब है सिर्फ और सिर्फ हिन्दुज्म का आलोचक होना है गोया हिन्दुज्म न हुआ एथीस्टों की प्रेक्टिस के लिए पंचिंग बेग हो गया.........(मूल लेखक - आशीष छारी)

Posted on: 18 July 2016 | 2:55 am

Demand for Seprarate Namaz Room in School : Secularism Flourished in Bengal

स्कूल में नमाज के लिए अलग कमरे की माँग... :- पश्चिम बंगाल में फलता-फूलता सेकुलरिज़्म...  बंगाल में हावड़ा से पच्चीस मिनट की दूरी पर स्थित कटवा पहुँचने के लिए बस एवं रेलसेवा दोनों उपलब्ध हैं. कटवा के पास ही स्थित है बांकापासी, जो कि बर्दवान जिले के मंगलकोट विकासखंड में आता है. इस बांकापासी कस्बे में एक स्कूल है जिसका नाम है बांकापासी शारदा स्मृति हाईस्कूल. इस स्कूल में प्रायमरी, सेकंडरी और हायर सेकंडरी की कक्षाएँ लगती हैं. यह स्कूल हिन्दू बहुल बस्ती में पड़ता है. स्कूल के 70% छात्र हिन्दू और 30% छात्र मुस्लिम हैं जो कि पास के गाँवों दुरमुट, मुरुलिया इत्यादि से आते हैं. स्कूल का मुख्य द्वार दो शेरों एवं हंस पर विराजमान वीणावादिनी सरस्वती की मूर्ति से सजा हुआ है. पिछले पखवाड़े के रविवार को स्कूल में पूर्ण शान्ति थी, परन्तु स्कूल के प्रिंसिपल डॉक्टर पीयूषकान्ति दान अपना पेंडिंग कार्य निपटाने के लिए स्कूल आए हुए थे. अचानक उन्हें भान हुआ कि स्कूल की दीवार के अंदर कोई हलचल हुई है, तो वे तत्काल अपने कमरे से बाहर निकलकर स्कूल के हरे-भरे लॉन में पहुँचे, परन्तु वहाँ कोई नहीं था. असल में प्रिंसिपल पीयूषकांत दान नहीं चाहते थे कि शुक्रवार के दिन स्कूल में हो हुआ, उसकी पुनरावृत्ति हो. असल में स्कूल में पढ़ने वाले 30% मुस्लिम लड़कों ने स्कूल में नमाज पढ़ने के लिए एक अलग विशेष कमरे की माँग करते हुए जमकर हंगामा किया था. २४ जून २०१६ को कुछ मुसलमान छात्रों ने अचानक दोपहर को अपनी कक्षाएँ छोड़कर स्कूल के लॉन में एकत्रित होकर नमाज पढ़ना शुरू कर दिया था, जबकि उधर हिन्दू छात्रों की कक्षाएँ चल रही थीं. चूँकि उस समय यह अचानक हुआ और नमाजियों की संख्या कम थी इसलिए स्कूल प्रशासन ने इसे यह सोचकर नज़रंदाज़ कर दिया कि रमजान माह चल रहा है तो अपवाद स्वरूप ऐसा हुआ होगा. लेकिन नहीं... २५ जून यानी शनिवार को पुनः मुस्लिम छात्रों का हुजूम उमड़ पड़ा, प्रिंसिपल के दफ्तर के सामने एकत्रित होकर “नारा-ए-तकबीर, अल्ला-हो-अकबर” के नारे लगाए जाने लगे. कुछ छात्र प्रिंसिपल के कमरे में घुसे और उन्होंने माँग की, कि उन्हें जल्दी से जल्दी स्कूल परिसर के अंदर पूरे वर्ष भर नमाज पढ़ने के लिए एक विशेष कमरा आवंटित किया जाए. इन्हीं में से कुछ छात्रों के माँग थी कि प्रातःकालीन सरस्वती पूजा पर भी रोक लगाई जाए. इन जेहादी मानसिकता वाले “कथित छात्रों” ने प्रिंसिपल को एक घंटे तक उनके कमरे में बंधक बनाकर रखा. प्रिंसिपल ने स्कूल की प्रबंध कमेटी के सदस्यों से संपर्क किया, जिसने मामले को सुलझाने के लिए आगे पुलिस से संपर्क किया. पुलिस ने आकर माहौल को ठण्डा किया, परन्तु यह सिर्फ तात्कालिक उपाय था. जब पूरे घटनाक्रम की खबर हिन्दू लड़कों को लगी, तो सभी शाम को बाज़ार हिन्दू मिलन मंदिर और कैचार हिन्दू मिलन मंदिर में मिले और एक बैठक की. इस बैठक में निर्णय लिया गया कि मुसलमान छात्रों की इस गुंडागर्दी और नाजायज़ माँग का पुरज़ोर विरोध किया जाएगा. अगले दिन सुबह हिन्दू छात्रों ने एकत्रित होकर प्रिंसिपल से यह माँग की, कि यदि मुस्लिम छात्रों को नमाज़ के लिए अलग कमरा दिया गया तो उन्हें भी “हरिनाम संकीर्तन” करने के लिए एक अलग कमरा दिया जाए. हिन्दू-मुस्लिम छात्रों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए कैछार पुलिस चौकी से पुलिस आई और दोनों गुटों को अलग-अलग किया. जब हिन्दू छात्रों की ऐसी एकता की खबर फ़ैली तो प्रबंध कमेटी के ही एक मुस्लिम सदस्य उज्जल शेख ने घोषणा की, कि ना तो मुसलमानों को नमाज के लिए कोई अलग कमरा मिलेगा और ना ही हिंदुओं को संकीर्तन के लिए. प्रतिदिन स्कूल आरम्भ होने से पहले जो सरस्वती पूजा आयोजित होती है वह नियमित रहेगी. मामले की गहराई से जाँच-पड़ताल करने पर बांकापासी, पिंदिरा, लक्ष्मीपुर, बेलग्राम, कुल्सुना, दुर्मुट सहित आसपास के गाँवों में रह रहे हिंदुओं ने बताया कि जब से कट्टर मुस्लिम नेता TMC के सिद्दीकुल्लाह चौधरी इस विधानसभा सीट से जीते हैं, तभी से मुस्लिम धार्मिक और अतिवादी गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है. ममता बनर्जी की मुस्लिम-परस्त नीतियों और तुष्टिकरण से इलाके के मुसलमानों के हौसले बुलंद हो चले हैं, इसीलिए स्कूल में 30% होने के बावजूद उन्होंने इतना हंगामा कर डाला. ज्ञात हो कि सिद्दीकुल्लाह चौधरी अभी भी जमात-ए-उलेमा-हिन्द के कई समूहों का गुप्त रूप से संचालन करता है ताकि उसकी राजनैतिक शक्ति बनी रहे. सिद्दीकुल्लाह तृणमूल काँग्रेस में इसीलिए गया, ताकि वह अपनी सत्ता बरकरार रख सके. चौधरी द्वारा संचालित समूह “एक घंटे में कुरआन” नामक छोटे-छोटे समूह चलाता है, जिसमें इलाके के मुस्लिम छात्रों का ब्रेनवॉश किया जाता है. इस कार्य के लिए सिद्दीकुल्लाह को तबलीगी जमातों से चंदा भी मिलता है. चौधरी के निकट संबंधी हैं, बदरुद्दीन अजमल, जो कि असम में अपने ज़हरीले भाषणों के लिए जाने जाते हैं. हालाँकि फिलहाल बांकापासी हाईस्कूल में स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में बनी हुई है, परन्तु इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मुस्लिम छात्रों का कोई और उग्र समूह, किसी और स्कूल में घुसकर सरस्वती पूजा पर प्रतिबन्ध एवं नमाज के लिए अलग विशेष कमरे की माँग न करने लगे. क्योंकि बंगाल के कुछ इलाकों के स्कूलों में यह माँग उठने लगी है कि मुस्लिम बच्चों को मध्यान्ह भोजन में गौमांस अथवा हलाल मीट दिया जाए, भले ही वहाँ हिन्दू बच्चे भी साथ में पढ़ रहे हों. मुमताज़ बानो, उर्फ ममता बनर्जी के शासन में बंगाल के प्रशासन का जिस तेजी से साम्प्रदायिकीकरण हो रहा है, उसे देखते हुए “मिशन मुस्लिम बांग्ला” का दिन दूर भी नहीं लगता. तो फिर इलाज क्या है??? इलाज है ये... जो दिल्ली के सुन्दर नगरी में हनुमान मंदिर में हिंदुओं ने किया... इसे पढ़िए और सोचिये कि क्या किया जाना चाहिए... 

Posted on: 8 July 2016 | 12:35 am

Love for Outsiders and Ideological Distance : New Avatar of BJP

गैरों पे करम और विचारधारा से भटकाव – भाजपा का नया अवतार हाल ही में जब उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं धुर काँग्रेसी सांसद गिरधर गमांग को भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्त्व ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया तो सुदूर कहीं जमीन पर बैठे भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं के दिल के ज़ख्मों से घाव पुनः रिसने लगा. यह ज़ख्म था 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के एक वोट से गिरने का कभी ना भूलने वाला घाव. कड़े जमीनी संघर्षों और कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत से अटल जी की वह सरकार सत्ता में आई थी, जिसे संसद में इन्हीं गिरधर गमांग महोदय ने बड़ी दादागिरी से अपने एक “अवैध वोट” द्वारा गिरा दिया था. जब पिछले माह गिरधर गमांग भाजपा नेताओं के साथ मुस्कुरा रहे थे, उस समय इन कार्यकर्ताओं की आँखों के सामने अटल जी का मायूस चेहरा घूम गया. दुर्भाग्य की बात यह है कि गिरधर गमांग ठीक एक वर्ष पहले ही भाजपा में शामिल हुए थे, और उन्होंने भाजपा की विचारधारा अथवा उड़ीसा में पार्टी की उन्नति के लिए ऐसा कोई तीर नहीं मारा था, कि उन्हें सीधे कार्यसमिति सदस्य के रूप में पुरस्कृत कर दिया जाए, परन्तु ऐसा हुआ.... राजस्थान के मारवाड़ में एक कहावत है -- "मरण में मेड़तिया और राजकरण में जोधा". इसका अर्थ होता है :- मरने के लिए तो मेड़तिया और राजतिलक के लिए जोधा राठौड़, अर्थात जब युद्ध होता है, तब लड़ने और बलिदान के लिए मेड़तिया आगे किये जाते हैं, लेकिन जब राजतिलक का समय आता है तो जोधा राठौड़ों को अवसर मिलता है. यह कहावत और इसका अर्थ देने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि आजकल भारतीय जनता पार्टी एक नए “अवतार” में नज़र आ रही है. यह अवतार है “गैरों पे करम” वाला. पुरानी फिल्म “आँखें” पाठकों ने देखी ही होगी, उसमें माला सिन्हा पर यह प्रसिद्ध गीत फिल्माया गया था, “गैरों पे करम, अपनों पे सितम... ऐ जाने वफा ये ज़ुल्म न कर”. एक धुर संघी यानी अटलजी की सरकार को अपने वोट रूपी तमाचे से गिराने वाले धुर काँग्रेसी गिरधर गमांग का ऐसा सम्मान इसी का उदाहरण है. शायद आधुनिक भाजपा, डाकू “वाल्मीकि” के ह्रदय परिवर्तन वाली कहानी पर ज्यादा ही भरोसा करती है, हो सकता है कि भाजपा के उच्च रणनीतिकारों का यह विचार हो, कि गिरधर गमांग को इतना सम्मान देने देने से वे ऐसे बदल जाएँगे, कि शायद एक दिन रामायण लिखने लग पड़ें, परन्तु हकीकत में ना कभी ऐसा हुआ है, और न कभी होगा. क्योंकि राजनीति स्वार्थ और लोभ का दूसरा नाम है. मूल सवाल है कि जमीनी कार्यकर्ता की भावना का क्या??  केदारनाथ त्रासदी आज भी प्रत्येक भारतीय के दिलों में गहन पीड़ा के रूप में मौजूद है. सभी को याद होगा कि उस समय उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हुआ करते थे बहुगुणा साहब, यानी उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा के सुपुत्र और पूर्व काँग्रेसी प्रवक्ता रीता बहुगुणा के भाई. अर्थात पूरा का पूरा परिवार वर्षों से धुरंधर काँग्रेसी. जब केदारनाथ त्रासदी हुई थी, उस समय विजय बहुगुणा के निकम्मेपन एवं हिन्दू विरोधी रुख के कारण भाजपा एवं संघ के सभी पदाधिकारियों ने उन्हें जमकर कोसा-गरियाया था. बहुगुणा के कुशासन एवं भूमाफिया के लालची जाल में फँसे केदारनाथ की इस भीषण त्रासदी को गंभीरता से नहीं लेने की वजह से हजारों हिन्दू काल-कवलित हो गए, और कई माह तक हजारों लाशें या तो गायब रहीं अथवा बर्फ व पहाड़ों में दबी रहीं. उत्तराखण्ड के सभी भाजपा नेताओं ने विजय बहुगुणा को “हिन्दू-द्रोही” ठहराया था. हाल ही में उत्तराखण्ड की हरीश रावत सरकार को अस्थिर करने के चक्कर में भाजपा के रणनीतिकारों ने वहाँ विधायकों को लेकर एक गैरजरूरी “स्टंट” किया, और उसमें वे औंधे मुँह गिरे. विधायकों की खरीद-फरोख्त एवं दलबदलुओं के इस स्टंट में काँग्रेस एक माहिर खिलाड़ी रही है. भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में यह स्टंट सफलतापूर्वक कर लिया था, इसलिए उन्होंने सोचा कि उत्तराखंड पर भी हाथ आजमा लिया जाए, परन्तु यहाँ भाजपा की दाल नहीं गली और हरीश रावत सरकार सभी बाधाओं को पार करते हुए पुनः जस-की-तस सत्तारूढ़ है और जिस लंगड़े घोड़े पर भाजपा ने भरोसे के साथ दाँव लगाया था, वह रेस में खड़ा भी न हो सका. ध्यान देने वाली बात यह है कि हरीश रावत सरकार का अब सिर्फ एक वर्ष का कार्यकाल बचा था, और जनता में सरकार की छवि गिरती जा रही थी. परन्तु विजय बहुगुणा और भाजपा की इस जुगलबंदी के कारण रावत सरकार के प्रति जनता में सहानुभूति की लहर चल पड़ी, और इस कहानी का असली मजेदार पेंच तो यह है कि वर्षों से खाँटी काँग्रेसी रहे एवं खुद भाजपा द्वारा “हिन्दू-द्रोही” घोषित किए जा चुके विजय बहुगुणा साहब भी “स-सम्मान” भाजपा की केन्द्रीय कार्यसमिति में शामिल कर लिए गए... तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ. सवाल यह उठता है कि क्या इस कदम को भगतसिंह कोश्यारी एवं भुवनचंद्र खंडूरी के मुँह पर तमाचा माना जा सकता है?? आज तक किसी को समझ में नहीं आया कि आखिर विजय बहुगुणा को किस योग्यता के तहत यह सम्मान दिया गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा के रणनीतिकार यह सोचे बैठे हों कि बहुगुणा साहब उत्तराखण्ड में भाजपा को फायदा पहुँचाएंगे, भाजपा के वोटों में बढ़ोतरी करेंगे?? क्या भाजपाई आने वाले उत्तराखण्ड चुनावों में बहुगुणा को आगे रखकर चुनाव लड़ेंगे? यदि ऐसा हुआ तो इससे अधिक हास्यास्पद कुछ और नहीं होगा, परन्तु चूँकि “गैरों पे करम” करने की नीति चल पड़ी है तो जमीनी कार्यकर्ता भी क्या करे, मन मसोसकर घर बैठा है. भाजपा में गैरों पे करम वाला यह “ट्रेंड” लोकसभा के आम चुनावों से पहले तेजी से शुरू हुआ था. उस समय मौका देखकर काँग्रेस का जहाज छोड़कर भागने वाले कई चूहों को संसद का टिकट मिला और मोदी लहर के बलबूते वे फिर से सांसद बनने में कामयाब रहे. इनमें से कुछ काँग्रेसी तो मंत्रीपद हथियाने में भी कामयाब रहे. इसके बाद तो मानो लाईन ही लग गई. वर्षों से भाजपा के लिए मेहनत करने वाले कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को दरकिनार करते हुए “बाहरियों” को न सिर्फ सम्मानित किया गया, पुरस्कृत किया गया, बल्कि उन्हीं नेताओं के सिर पर बैठा दिया गया, जिनसे वे कल तक वैचारिक और राजनैतिक लड़ाई लड़ते थे. भाजपा के कार्यकर्ताओं को बताया जा रहा है कि एमजे अकबर साहब बहुत बड़े बुद्धिजीवी हैं और पार्टी को एक अच्छा मुस्लिम चेहरा चाहिए था इसलिए उन्हें राज्यसभा सीट देकर उपकृत किया जा रहा है, परन्तु पार्टी में से किसी ने भी यह सवाल नहीं उठाया कि क्या एमजे अकबर पार्टी की विचारधारा के लिए समर्पित हैं? एक पूर्व पत्रकार के नाते गुजरात दंगों के समय अकबर साहब के लेखों को किसी ने पढ़ा होता, तो वह कभी उन्हें भाजपा में घुसने नहीं देता. लेकिन काँग्रेस मुक्त भारत करने के चक्कर में “काँग्रेस युक्त भाजपा” पर ही काम चल रहा है. एमजे अकबर का मध्यप्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, इसी प्रकार नजमा हेपतुल्ला का भी मध्यप्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, राज्यसभा में पहुँचने के बाद वे कभी मध्यप्रदेश की तरफ झाँकने भी नहीं आईं, लेकिन चूँकि भाजपा को कुछ “कॉस्मेटिक” टाईप के मुस्लिम चेहरे चाहिए इसलिए खामख्वाह किसी को भी भरे जा रहे हैं... जबकि उधर मोदी लहर के बावजूद शाहनवाज़ हुसैन बिहार में चुनाव हार गए थे. यह है भाजपा के मतदाताओं का मूड... लेकिन पार्टी इसे समझ नहीं रही और पैराशूट से कूदे हुए लोग सीधे शीर्ष पर विराजमान हुए जा रहे हैं. भाजपा जमीनी हकीकत से कितनी कट चुकी है और अपने संघर्षशील कार्यकर्ताओं की उपेक्षा में कितनी मगन है, इसका एक और ज्वलंत उदाहरण है महाराष्ट्र के कोल्हापुर से शिवाजी महाराज के “कथित” वंशज संभाजी राजे को भाजपा ने राज्यसभा में मनोनीत किया है. स्वयं को “छत्रपति” एवं कोल्हापुर के महान समाजसेवी कहलवाने का शौक रखने वाले ये सज्जन पहले राकांपा के टिकट पर कोल्हापुर से ही दो बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं. परन्तु इनकी “खासियत”(?) सिर्फ इतनी ही नहीं है. संभाजी राजे नामक ये सज्जन महाराष्ट्र की कुख्यात “संभाजी ब्रिगेड” के एक प्रमुख कर्ताधर्ता भी हैं. राजनैतिक गलियारों में सभी जानते हैं कि संभाजी ब्रिगेड नामक यह जहरीली संस्था वास्तव में शरद पवार का जेबी संगठन है. पवार ने अपनी मराठा राजनीति चमकाने के लिए ही इस संगठन को पाला-पोसा और बड़ा किया. सोशल मीडिया पर संभाजी ब्रिगेड जो ब्राह्मण विरोधी ज़हर उगलता है वह तो अलग है ही, इसके अलावा इस संगठन के हिंसक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा कारनामा वह था, जब इन्होंने “शिवाजी महाराज की अस्मिता” के नाम पर पुणे के भंडारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट में तोड़फोड़ और आगज़नी की थी. कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक पुस्तकें एवं दुर्लभ पांडुलिपियाँ इस हमले में नष्ट हो गई थीं, पवार साहब के वरदहस्त के चलते किसी का बाल भी बाँका न हुआ. कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे धुर ब्राह्मण विरोधी एवं चुनाव हारे हुए व्यक्ति को भाजपा अपने पाले में लाकर सीधे राज्यसभा सीट का तोहफा देकर क्या हासिल करना चाहती है? क्या पश्चिम महाराष्ट्र में उत्तम मराठा नेताओं की कमी हो गई थी? क्या भाजपा में और कोई मराठा नेता नहीं हैं जो राज्यसभा के लिए उचित उम्मीदवार होते? संभाजी राजे ने हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद के समर्थन में ऐसा क्या कर दिया था कि उन्हें गायत्री परिवार के श्री प्रणव पंड्या द्वारा ठुकराई हुई राज्यसभा सीट पर ताबड़तोड़ मनोनीत करवा दिया गया? क्या पश्चिम महाराष्ट्र में भाजपा की कंगाली इतनी बढ़ गई है कि दो चुनाव हारने वाले व्यक्ति को वह इस क्षेत्र का तारणहार समझ बैठी है? जो संभाजी राजे शरद पवार के इशारे के बिना एक कदम भी नहीं चल पाते हैं, क्या वे “शकर बेल्ट” में भाजपा का जनाधार बढ़ाएँगे? यह तो वैसा ही हुआ जैसे उड़ीसा में वर्षों से संघर्ष कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं-नेताओं को दरकिनार कर, अब गिरधर गमांग साहब भाजपा को उड़ीसा में विजय दिलवाएँगे? खुशफहमी एवं अति-उत्साह की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा इसे, और यह निष्ठावान कार्यकर्ताओं की मानसिक बलि लेकर पैदा हुई है. सत्ता के गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि यदि आप पार्टी के समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ता का ध्यान रखेंगे तो आपकी पार्टी चाहे जितने चुनाव हार जाए, वह या तो पुनः उठ खड़ी होगी अथवा उसके ये “पुरस्कृत” कार्यकर्ता-समर्थकों का झुण्ड सत्ताधारी दल को आसानी से काम नहीं करने देगा. इस सिद्धांत पर काम करने में काँग्रेस और वामपंथी पार्टियाँ सबसे आगे रही हैं. पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस जहाँ-जहाँ और जब-जब सत्ता में रही है, उसने अपने कार्यकर्ताओं, नेताओं यहाँ तक कि अपने समर्थक अफसरों-बाबुओं को भी बाकायदा चुन-चुनकर और जमकर उपकृत किया. काँग्रेस और वामपंथ द्वारा उपकृत एवं पुरस्कृत लेखक, अभिनेता, स्तंभकार, पत्रकार, अफसर, न्यायाधीश ही उसकी असली ताकत हैं, उदाहरण “अवार्ड वापसी गिरोह का हंगामा”. जबकि भाजपा का व्यवहार इसके ठीक उलट है. जब भी और जिन राज्यों में भी भाजपा की सरकारें आती हैं अचानक उन्हें नैतिकता और ईमानदारी का बुखार चढ़ने लगता है. समस्या यह है कि यह बुखार वास्तविक नहीं होता है. नैतिकता, ईमानदारी के बौद्धिक लेक्चर सिर्फ निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को ही पिलाए जाते हैं, जबकि सत्ता की ऊपरी मलाईदार परत पर बिचौलियों, पूर्व कांग्रेसियों एवं नौसिखिए परन्तु “भूखे” भाजपाईयों तथा उनके प्यारे ठेकेदारों का कब्ज़ा हो जाता है. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि भाजपा के थिंक टैंक या उच्च स्तरीय नेता इस बात का जवाब कभी नहीं दे पाएँगे कि जगदम्बिका पाल जैसे व्यक्ति को भाजपा द्वारा पुरस्कृत करने से भाजपा के उत्तरप्रदेश में कितने प्रतिशत वोट बढ़े... या बिहार में ऐन चुनावों से पहले साबिर अली को भाजपा में शामिल करके कितने प्रतिशत मुस्लिम प्रभावित हुए?? क्या साबिर अली अथवा जगदम्बिका पाल जैसे लोग भाजपा को उनके राज्यों में आगे बढ़ाने में मदद करेंगे? क्या ये भाजपा की विचारधारा के करीब हैं? यदि नहीं, तो फिर जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते हुए ऐसे पैराशूट छाप नेताओं को भाजपा मान-सम्मान क्यों दे रही है, यह समझ से परे है. कांग्रेस द्वारा तिरस्कृत व्यक्तियों को भाजपा अपने साथ मिलाकर खुद अपनी फजीहत किस तरह से करवा रही है इस का जीता-जागता उदाहरण बड़ोदरा की पारुल यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर जयेश पटेल हैं. जयेश पटेल पूरी जिंदगी कांग्रेस मे रहे. कांग्रेस के टिकट पर तीन बार चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 6 महीने पहले यह भाजपा में आ गए और फिर इसने अपने ही यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एक लड़की का बलात्कार किया. अब स्वाभाविक रूप से मीडिया में बैठे कांग्रेसी बार बार इसे भाजपा नेता कहकर प्रचारित कर रहे है. तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह भाजपा के ही नेता माने जाएँगे, लेकिन इस बदनामी के लिए जिम्मेदार भी बीजेपी है, जो कांग्रेस से आए हुए किसी भी ऐरे-गैरे को शामिल कर रही है. इसी प्रकार 2000 करोड़ के ड्रग स्मगलर विक्की राठोड़ के केस में यही हुआ, इसके पिता पूरी जिंदगी कांग्रेस में रहे. कांग्रेस के टिकट पर विधायक भी बने, कांग्रेस की सरकार में मंत्री भी रहे. इन्होंने कांग्रेस के टिकट पर 2014 लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन सिर्फ 3 महीने पहले वह भाजपा में आए और जब उसका बेटा 2000 करोड़ की ड्रग्स रैकेट में पकड़ा गया तो मीडिया और कांग्रेस ने उसे एक भाजपा नेता का बेटा कहकर प्रचारित किया. समझ नहीं आता कि जब भाजपा में इतने अच्छे अच्छे लोग हैं तो फिर इन बाहरियों को शामिल करके खुद की फजीहत करवा रही है ? कहने का तात्पर्य यह है कि गमांग, जगदम्बिका पाल, विजय बहुगुणा, संभाजी ब्रिगेडी अथवा साबिर अली को शामिल करने (बल्कि उन्हें राज्यसभा सीट आदि से सम्मानित करने) में पता नहीं कौन सी रणनीति है, जो पार्टी की मूल विचारधारा को खाए जा रही है और उधर लाठी खाने वाला कार्यकर्ता हताश हो रहा है. जो लोग जीवन भर संघ-भाजपा की खिल्ली उड़ाते आए, जिन्होंने अपना राजनैतिक जीवन हिंदुत्व के विरोध एवं काँग्रेस की चाटुकारिता में गुज़ार दी हो, वह कार्यकर्ता से सामंजस्य कैसे बिठाएगा?? यह हताशा सिर्फ इसी स्तर पर ही नहीं है, बल्कि नियुक्तियों और प्रशासनिक स्तर पर भी देखा जाए तो यह सरकार विफल होती दिखाई दे रही है. मोदी सरकार के दो वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, और इस सरकार से कामकाज के अलावा विचारधारा के स्तर पर जिस काम की अपेक्षा थी, अब जमीनी कार्यकर्ताओं द्वारा उसकी समीक्षा आरम्भ हो चुकी है. यदि कामकाज के स्तर पर देखा जाए तो मनोहर पर्रीकर, सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी, पीयूष गोयल और सुरेश प्रभु का कार्य संतोषजनक कहा जा सकता है. परन्तु बाकी के मंत्रालयों की हालत अच्छी नहीं कही जा सकती. केन्द्र सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालय होता है मानव संसाधन मंत्रालय. पिछले पचास वर्षों में इस मंत्रालय पर अधिकांशतः वाम अथवा समाजवाद समर्थक काँग्रेसी की नियुक्ति होती आई है. देश के तमाम विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थाओं, शोध संस्थाओं सहित अकादमिक गतिविधियों को यह मंत्रालय अरबों रूपए की धनराशि मुहैया करवाता है. काँग्रेस और वाम मोर्चे द्वारा इसी मंत्रालय के जरिये पूरी तीन पीढ़ियों का “ब्रेनवॉश” किया गया है और उन्हें नकली सेकुलरिज़्म एवं कथित प्रगतिशीलता के बहाने भारतीय संस्कृति से तोड़ने का कार्य किया गया है. JNU हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय का रोहित वेमुला मामला हो अथवा IIT चेन्नै का आंबेडकर पीठ वाला मामला हो या फिर पुणे की FTII संस्था ही क्यों ना हो... काँग्रेस-वामपंथ द्वारा पालित-पोषित एवं संरक्षित बौद्धिक गिरोह ने मोदी सरकार के प्रत्येक कदम में अड़ंगे लगाए हैं, हंगामे किए और विदेशों में बदनामी करवाई. ऐसा क्यों हुआ? जो काम काँग्रेस की सरकारें सत्ता में आते ही किया करती थीं, वह भाजपा पिछले दो साल में भी नहीं कर पाई है. 2004 को याद करें, जैसे ही वाजपेयी सरकार की विदाई हुई, और सोनिया-मनमोहन की जुगलबंदी वाली यूपीए-१ सरकार ने कार्यभार संभाला, उसके एक माह के भीतर ही काँग्रेस ने तमाम बड़े-बड़े संस्थानों से भाजपा द्वारा नियुक्त किए गए सभी प्रमुख पदों को खाली करवा लिया. जिसने खुशी-खुशी इस्तीफ़ा दिया, उसे सम्मानजनक तरीके से जाने दिया गया और जिसने इनकार किया, उसे बर्खास्त करने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी गई. इसके पश्चात तत्काल काँग्रेसी अथवा वामपंथी विचारधारा को समर्पित व्यक्तियों की नियुक्ति कर दी गई, जो दुर्भाग्य से आज भी कई संस्थानों में कब्ज़ा जमाए बैठे हैं. सरकार के प्रति धारणाएँ बनाने अथवा अवधारणाएँ बिगाड़ने में बौद्धिक जगत का बहुत बड़ा हाथ होता है. स्मृति ईरानी ने जब कार्यभार संभाला, तब उन्होंने शुरुआत तो बड़े धमाकेदार तरीके से की थी परन्तु इस महत्त्वपूर्ण मंत्रालय को लेकर उनसे जो अपेक्षाएँ थीं इन दो वर्षों में वह कोरी बातें, फालतू के विवाद और उनके बड़बोलेपन में ही खत्म होती दिखाई दे रही हैं. मानव संसाधन मंत्री ने जेएनयू तथा हैदराबाद विवि के रोहित वेमुला का मामला जिस तरह से हैंडल किया है, उससे यह बात स्पष्ट हो गई है कि स्मृति ईरानी में वामपंथियों जैसी धूर्तता एवं प्रोपोगंडा तकनीक का सर्वथा अभाव है. बौद्धिक क्षेत्र में चारों तरफ घुसे बैठे वामपंथियों एवं कांग्रेसियों से निपटना अनुभवहीन स्मृति ईरानी के बस की बात नहीं है. पिछले दो वर्ष में देश की प्रमुख शिक्षा एवं अकादमिक संस्थाओं में आज भी वही लोग बैठे हैं जो यूपीए-२ कार्यकाल में थे. ऐसा नहीं है कि भाजपा समर्थित विचारधारा में प्रतिभावान लोगों की कमी है, परन्तु भाजपा में नैतिकता बघारने का ऐसा उन्माद है कि स्मृति ईरानी बड़े गर्व से घोषणा करती हैं कि उन्होंने बदले की भावना से काम नहीं किया है और एक-एक करके कई नाम गिना देती हैं कि हमने इन्हें नहीं हटाया. तो सवाल बनता है कि क्यों नहीं हटाया? किस बात का इंतज़ार है? क्या पिछले साठ वर्ष से काँग्रेस-वामपंथ के हाथों मलाई चाटते इन लोगों के ह्रदय परिवर्तन का? या स्मृति ईरानी को विश्वास है कि ये तमाम बुद्धिजीवी इनकी यह नैतिकता देखकर पसीज जाएँगे और अपना संघ-भाजपा-मोदी विरोध वाला रवैया त्याग देंगे? इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वालों, तीन-तीन पीढ़ियों को अपनी सेकुलर विचारधारा और झूठी कहानियों के माध्यम से बरगलाने वालों तथा बाकायदा अपना गिरोह बनाकर सभी विश्वविद्यालयों से भगवा बुद्धिजीवियों को षड्यंत्रपूर्वक बाहर करते हुए फेलोशिप्स, अवार्ड, ग्रांट्स इत्यादि पर काबिज रहने वालों से निपटना स्मृति ईरानी के बस की बात नहीं लग रही. जेएनयू के उस कुख्यात हंगामे के पश्चात ऐसी कोई गतिविधि नज़र नहीं आई, जिसमें मानव संसाधन मंत्रालय ने वहाँ की कार्यकारी परिषद् अथवा अकादमिक कौंसिल को भंग करने या उसमें व्यापक बदलाव करने की कोई इच्छाशक्ति दिखाई हो. जबकि यही काम काँग्रेस जब सत्ता में आती थी तो आवश्यकता पड़ने पर पहले दो माह में ही निपटा डालती थी. यदि कोई पार्टी अपनी सत्ता के दो वर्ष बाद भी अपनी समर्थित विचारधारा के लोगों को सही स्थान पर फिट नहीं कर पाती या ऐसा कोई उद्यम दिखाई भी नहीं देता तो तय मानिए कि कहीं न कहीं बड़ी गडबड़ी है.  यहाँ पर एक उदाहरण देना ही पर्याप्त है... ICSSR (भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद्) के अध्यक्ष हैं प्रोफ़ेसर सुखदेव थोरात. इन सज्जन ने दलितों के नाम पर NGO खड़े करके यूरोप एवं फोर्ड फाउन्डेशन से चन्दे लिए हैं. हिन्दू द्वेष एवं दलितों को भड़काने का काम ये साहब बखूबी करते रहे हैं, आज भी कर रहे हैं. इनके स्थान पर समावेशी विचारधारा वाले प्रोफ़ेसर के.वारिकू अथवा प्रोफ़ेसर जितेन्द्र बजाज को लाया जाना चाहिए था, ताकि इस महत्त्वपूर्ण संस्थान में यह हिन्दू द्वेष का ज़हर फैलने से रोका जा सके, लेकिन स्मृति ईरानी इनका कुछ नहीं कर पाईं. इसी प्रकार एक महत्त्वपूर्ण संस्थान है साउथ एशियन यूनिवर्सिटी, जिसके निदेशक प्रोफ़ेसर जीके चढ्ढा साहब पाकिस्तानी छात्रों को अधिक प्राधान्य देते थे और उनके अधिक प्यारे थे. चढ्ढा साहब के स्वर्गवास के पश्चात यह पद अभी खाली पड़ा है, क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय उस वामपंथी बौद्धिक गिरोह के हंगामों से सहमा हुआ रहता है. उधर बच्चों के दिमाग पर प्रभाव डालने वाले एवं पुस्तकों द्वारा बुद्धि दूषित करने वाले प्रमुख संस्थान NCERT में शंकर शरण जैसे विद्वान को होना चाहिए, जो वामपंथियों की नस-नस से वाकिफ हैं, परन्तु यह भी नहीं हो पा रहा. फिर भाजपा के मतदाता कैसे विश्वास करें कि यह सरकार पिछले साठ वर्ष की गन्दगी को साफ़ करने के प्रति गंभीर है तथा वैचारिक लड़ाई के लिए कटिबद्ध है? अब बात विचारधारा की निकली ही है तो यह जानना उचित होगा कि राज्यों में भाजपा की सरकारें सत्ता प्राप्त करने के बाद अचानक सेकुलरिज़्म का राग क्यों अलापने लगती हैं. जब तक भाजपा विपक्ष में रहती है वह भावनाओं को भड़काकर अपने समर्थकों को एक टांग पर खड़ा रखती है, परन्तु जैसा कि ऊपर केन्द्र का उदाहरण दिया कि सत्ता मिलते ही इनका “वैचारिक स्खलन” शुरू हो जाता है. ठीक वही स्थिति राज्यों में भी है. जिसमें सबसे (कु)ख्यात मामला है मध्यप्रदेश की भोजशाला का विवाद है. पिछले कई वर्षों से मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला में वसंत पंचमी के दिन हिन्दू संगठन माँ सरस्वती की पूजा करते आए हैं, वहीं अतिक्रमण करके मुस्लिमों ने बाहर एक मस्जिद खड़ी कर ली है. मप्र में भाजपा की सरकार बने लगभग तेरह-चौदह वर्ष होने को आए, आज भी प्रतिवर्ष हिन्दू संगठनों को भोजशाला में पूजा-अर्चना करने के लिए या तो प्रशासन के आगे गिडगिडाना पड़ता है अथवा संघर्ष करना पड़ता है. हर बार हिन्दू संगठनों को लॉलीपाप देकर चलता कर दिया जाता है, जबकि मुस्लिम संगठन ठप्पे के साथ बाकायदा प्रशासन के संरक्षण में नमाज पढ़ते हैं. “मामाजी” की भाजपा सरकार को सेकुलरिज्म का ऐसा बुखार चढ़ा हुआ है कि वह इस मामले में अपने मातृ संगठन को भी अँधेरे में रखने से बाज नहीं आती. सत्ता की खातिर यह विचारधारा से भटकाव नहीं तो और क्या है? यदि हिन्दू भाजपा वोट देकर जितवाता है तो वह अपनी सरकार से उम्मीद भी तो रखता है कि वर्षों से लंबित पड़े विवादित मामलों में भाजपा सरकार या तो न्यायालयीन अथवा प्रशासनिक तरीके से उन्हें ख़त्म करे, परन्तु तेरह वर्ष की सत्ता के बावजूद हर साल क़ानून-व्यवस्था के नाम पर सरस्वती भक्त हिन्दुओं पर लाठियाँ बरसें यह उचित नहीं है. यही हाल राजस्थान में भी है. रानी साहिबा वसुंधरा राजे को भी केवल “सबका साथ, सबका विकास” का चस्का लगा हुआ है. विकास की दौड़ में रानी साहिबा ने जयपुर के वर्षों पुराने कई मंदिरों को सडक, पुल या मेट्रो की चाह में ध्वस्त कर दिया. कई मंदिर ऐसे भी थे जो आराम से विस्थापित किए जा सकते थे, जबकि कुछ मंदिरों को बचाते हुए सड़क का मार्ग बदला भी जा सकता था, कुछ मज़ारों और मस्जिदों को बचाने के लिए ऐसा किया भी गया. तमाम हिन्दू संगठनों ने इन मंदिरों को तोड़ने से बचाने के लिए अथवा वैकल्पिक मार्ग सुझाने के लिए कई आन्दोलन किए, परन्तु नतीजा शून्य. महारानी के बुलडोज़रों ने “अपने ही कार्यकर्ताओं और अपने ही मतदाताओं” की एक न सुनी. जोधपुर, अजमेर, जैसलमेर तथा बाड़मेर के कई इलाके तेजी से मुस्लिम बहुल बनते जा रहे हैं. इन क्षेत्रों में कई प्रकार की संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही हैं. सीमा सुरक्षा बल लगातार चेतावनी जारी कर रहे हैं, परन्तु वसुंधरा राजे पर राजस्थान को औद्योगिक राज्य बनाने का भूत सवार है. राजस्थान में “मार्बल माफिया” के कई किस्से बच्चे-बच्चे की ज़बान पर मशहूर हैं, परन्तु शायद राजस्थान सरकार के कानों तक यह आवाज़ नहीं पहुँचती या शायद सेकुलरिज्म के बुखार से तप्त वह सुनना ही नहीं चाहतीं. राजस्थान में भाजपा का शासन आए तकरीबन तीन साल हो रहे हैं. हमेशा की तरह भाजपा कुछ ज्यादा ही नैतिक हो रही है. वे कर्मचारी जो संघी या भाजपा के मतदाता होने के कारण गहलोत सरकार द्वारा जानबूझकर रिमोट एरिया में फेंके गए थे, वे आज तक वहीँ पड़े सड़ रहे हैं, भाजपा को ऐसे समर्थक कर्मचारियों की सुध बुध लेने की कोई फ़िक्र नहीं और उधर काँग्रेस के लालित-पालित कर्मचारी अपनी पट्टाशुदा जगहों पर आज भी ठाठ से जमे हैं. यदि कांग्रेस अथवा वामपंथ का शासन होता तो पहले छः माह में ही उन्होंने अपने समर्थित कर्मचारियों को अपनी मनपसंद जगह पर पोस्ट कर दिया होता. लेकिन भाजपा निराली है, यहाँ दरी -पट्टी उठाने, सडकों पर उतरने, नारे लगा लगा कर गला फाड़ने, पुलिस के डंडे खाने अथवा मीडिया एवं सोशल मीडिया में विचारधारा का पक्ष रखने वालों को प्रतिबद्ध कार्यकर्ता अथवा 'त्यागी-बलिदानी' के रूप में आगे खड़ा कर दिया जाता है, और जब भाजपा को सत्ता मिलती है तो लाभ लेने के लिए गमांग-बहुगुणा टाइप नेता और जिन्दगी भर संघ की खिल्ली उड़ाने वाले नवप्रविष्ट 'भाई साहब' आगे आ जाते हैं. बालासाहब ठाकरे और अटलबिहारी वाजपेयी के ज़माने से महाराष्ट्र में शिवसेना, भाजपा की सबसे पुरानी और सबसे विश्वस्त साथी रही है. जब गुजरात दंगों के बाद अटल जी मोदी को गुजरात से लगभग हटाने ही वाले थे, तब बालासाहब चट्टान की तरह मोदी के पीछे खड़े रहे और अटल जी से स्पष्ट शब्दों में मोदी को बनाए रखने की बात कही थी. यदि बालासाहब ने उस समय अटल जी को उस समय वह धमकी ना दी होती, तो अटल जी की नैतिकता(??) और सरलता(?) तथा “कथित राजधर्म” के चक्कर में मोदी पता नहीं कहाँ ट्रांसफर कर दिए जाते. तब न तो मोदी गुजरात में बारह साल शासन कर पाते, और ना ही वाइब्रेंट गुजरात के जरिये अपनी छवि चमकाकर आज प्रधानमंत्री पद तक पहुँच पाते. यह संक्षिप्त भूमिका इसलिए बताई जा रही है कि महाराष्ट्र के गत विधानसभा चुनावों के पहले से ही भाजपा की “विस्तारवादी” नीतियों के कारण जिस तरह से केन्द्रीय नेतृत्त्व ने शिवसेना के साथ अपमानजनक एवं नीचा दिखाने जैसा व्यवहार किया है, यह हिंदुत्व के लिए ठीक नहीं है. यदि भाजपा को अपना विस्तार करना ही है तो महाराष्ट्र पर गिद्ध दृष्टि क्यों? वहां तो पहले से ही भाजपा का विश्वस्त सहयोगी मौजूद है, जो इक्का-दुक्का बार छोड़कर सदैव भाजपा के साथ खड़ा रहा है. महाराष्ट्र विधानसभा में “अकेले” बहुमत हासिल करने की होड़ में शिवसेना को तोड़ने का प्रयास करना अथवा शरद पवार जैसे भीषण भ्रष्ट व्यक्ति के साथ गलबहियाँ करना भाजपा को शोभा नहीं देता. परन्तु जब विचारधारा पर सत्ता प्राप्ति हावी हो जाती है, तब ऐसा ही होता है. ये बात और है कि शिवसेना टूटी नहीं, लेकिन फिर भी भाजपा ने संयुक्त मंत्रिमंडल में लगातार शिवसेना को दबाए रखा है और गाहे-बगाहे दोनों पार्टियों में चिंगारियाँ फूटती रहती हैं. जैसा कि लेख में पहले बताया जा चूका है, “संभाजी ब्रिगेड” नामक जहरीला संगठन शरद पवार का जेबी संगठन है और यह लगातार हिन्दुओं में फूट डालने तथा ब्राह्मणों को गाली देने का काम करता है, ऐसे संगठन के प्रति भाजपा में अचानक प्रेम की कोंपलें फूट पडी हैं. संघ की विचारधारा एवं हिंदुत्व के लिए यह अच्छे संकेत नहीं हैं. अपनी जड़ों को छोड़कर कोई भी वृक्ष अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता. पश्चिम भारत के गोवा में एक छोटा सा संगठन है “सनातन संस्था” जो कि हिन्दू जनजागृति समिति के बैनर तले हिंदुत्व जागरण के अपने कई कार्यक्रम आयोजित करता है. यहाँ मैंने “छोटा संगठन” इसलिए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे विराट संगठन तथा भाजपा जैसे विशाल पार्टी के सामने तुलनात्मक रूप से यह छोटा संगठन ही है. इस संगठन का विस्तार फिलहाल केवल महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में ही थोडा बहुत प्रभावशाली है, परन्तु बाकी राज्यों में भी अब यह धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा है. यह संगठन राजनैतिक नहीं है, इसलिए यह “सत्ता प्राप्ति की लालसा” अथवा सेकुलरिज्म का भूत चढ़ने जैसी बीमारियों से बचा हुआ है. यह संगठन सिर्फ और सिर्फ हिन्दू जागरण, हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की परम्पराओं एवं विधियों तथा विभिन्न प्रकार के हिन्दू-समाजसेवी कार्यक्रमों में भाग लेता रहता है. इस संगठन के मुखिया डॉक्टर आठवले जी अधिकाँश समय एकांतवास में ही रहते हैं. कांग्रेस और वामपंथियों तथा हाल ही में अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाओं के तहत आपियों ने लगातार सनातन संस्था पर कई वैचारिक हमले किए हैं. महाराष्ट्र की पिछली कांग्रेस सरकार ने सनातन संस्था के खिलाफ कई मामले दर्ज कर रखे हैं. दाभोलकर एवं कलबुर्गी की हत्या के आरोप में खोजबीन और पूछताछ के बहाने महाराष्ट्र पुलिस सनातन संस्था के आश्रमों एवं गोवा के प्रमुख केंद्र पर जब-तब धावा बोलती रहती है. पिछले पांच वर्ष से यह संस्था अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन का आयोजन करती है, जिसमें देश-विदेश से दर्जनों ऐसे कार्याकार्य एवं संगठन भाग लेते हैं जो जमीनी स्तर पर हिंदुत्व के कार्य में जुटे हैं. इनमें बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों से भी प्रतिनिधि आते हैं जहां हिन्दुओं पर विभिन्न प्रकार के अत्याचार हो रहे हैं. बांग्लादेश के एक मानवाधिकार वकील हैं रवीन्द्र घोष, जो वहां के अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के खिलाफ होने वाले अपराधों एवं उत्पीड़न के खिलाफ आए दिन लड़ते रहते हैं. बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं की हालत बेहद दयनीय है यह बात सभी जानते हैं. पिछले चार वर्ष से रवीन्द्र घोष गोवा के इस हिन्दू अधिवेशन में भाग लेने आते रहे हैं, परन्तु इस वर्ष केंद्र सरकार ने रवीन्द्र घोष को वीसा नहीं दिया. इस अनुमति को नकारने के लिए क़ानून-व्यवस्था एवं बांग्लादेश से संबंधों का कारण दिया गया. गत वर्ष हुए चौथे हिन्दू अधिवेशन में भी कर्नाटक से प्रमोद मुथालिक इस सम्मेलन में आने वाले थे, परन्तु गोवा में भाजपा की “हिन्दुत्ववादी” सरकार ने प्रमोद मुतालिक के गोवा में घुसने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. अब सोचने वाली बात यह है कि प्रमोद मुतालिक पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने कुछ मामले दर्ज कर रखे हैं, परन्तु गोवा में उनके खिलाफ एक भी मामला नहीं है. ऐसे में भारत के एक नागरिक को जो कि शांतिपूर्ण तरीके से एक अधिवेशन में भाग लेने जा रहा हो, किसी अंग्रेजी क़ानून के तहत, तानाशाहीपूर्ण पद्धति से राज्य में घुसने से रोकना और वो भी खुद को संघ की राजनैतिक बाँह कहलाने वाली भाजपा सरकार के शासन में?? इतना अन्याय तो कांग्रेस की सरकारों ने भी नहीं किया. परन्तु जैसा कि मैंने कहा, जब विचारधारा पर सत्ता हावी हो जाती है तब “अपने” लोग भी दुश्मन नज़र आने लगते हैं. सनातन संस्था एक पूर्णतः धार्मिक एवं हिंदुत्वनिष्ठ गैर-राजनैतिक संस्था है, जिसकी कोई राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा अभी तक सामने नहीं आई है, और मजे की बात यह है कि इस संस्था का संघ एवं उसकी कार्यशैली से तिनका भर भी सम्बन्ध नहीं है. संक्षेप में कहा जाए तो ऐसी कई संस्थाएं या संगठन हैं जो सिर्फ हिन्दू धर्म एवं हिंदुत्व तथा राष्ट्रवाद की “मूल विचारधारा” के लिए काम कर रहे हैं, परन्तु उनका सीधा सम्बन्ध संघ-भाजपा से नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसी संस्थाओं एवं संगठनों को “राजनैतिक संरक्षण” देना हिन्दू हित का दम भरने वाली सत्ताधारी पार्टी का काम नहीं है?? क्या भाजपा-संघ की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ऐसे संगठनों को जो कि उसके प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि पूरक हैं, उन्हें हर प्रकार की मदद करे? जब ऐसे संगठन अथवा समाज में बैठे हजारों-लाखों लोग जो कि भाजपा के सदस्य नहीं हैं परन्तु हिंदुत्व की विचारधारा के लिए काम करते हैं, वोट देते हैं और जिस कारण भाजपा को सत्ता की मलाई खाने मिलती है, क्या ऐसे लोगों का ख़याल रखना भाजपा की राज्य एवं केंद्र सरकार का काम नहीं है?? ऐसे हिन्दू संगठन किसी मदद के लिए किसकी तरफ आशा की निगाह से देखें, वैचारिक पितृ संगठन और पार्टी की तरफ या ओवैसी और चर्च की तरफ?? संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि “काँग्रेस मुक्त भारत” के नशे में भाजपा तेजी से “काँग्रेस युक्त भाजपा” की तरफ बढ़ती जा रही है. विचारधारा के स्खलन संबंधी और समर्थकों की नियुक्तियों को सही स्थान पर फिट नहीं करने संबंधी ऊपर जिन विभिन्न उदाहरणों को उल्लेखित किया है, उस प्रकार की ढीलीढाली कार्यशैली को देखते हुए काँग्रेस मुक्त भारत का सपना “राजनैतिक” रूप से तो संभव है, क्योंकि मूल काँग्रेस इस समय सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है. परन्तु उस काँग्रेस को विस्थापित करने वाली यह जो “डुप्लिकेट काँग्रेस” अर्थात भाजपा है वह प्रशासनिक रूप से कभी भी काँग्रेस मुक्त भारत नहीं कर सकती. पिछले साठ वर्ष में जिस चतुराई और धूर्तता से काँग्रेस और वामपंथ ने अपने मोहरे देश के प्रत्येक क्षेत्र में फिट कर रखे हैं उसका दस प्रतिशत भी प्राप्त करने में भाजपा को पूरे दस वर्ष चाहिए, परन्तु सत्ता में आने के बाद जिस प्रकार भाजपा पर “सेकुलरिज़्म का बुखार” चढ़ता है, एवं त्याग-बलिदान के बौद्धिक डोज़ पिलाते हुए पार्टी में अपनों की उपेक्षा की जाती है, उसे देखते हुए तो यह संभव नहीं लगता. 

Posted on: 5 July 2016 | 11:20 am

A Further Step for Congress Free India

मोदी सरकार के दो वर्ष – "कांग्रेस मुक्त भारत" की तरफ एक और कदम...कहते हैं कि “मुसीबत कभी अकेले नहीं आती, साथ में दो-चार संकट और लेकर आती है”. वर्तमान में कांग्रेस के साथ शायद यही हो रहा है. नेशनल हेराल्ड घोटाले का मामला न्यायालय में है और इटली के अगस्ता हेलीकॉप्टरों संबंधी घूस का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव सिर पर आ धमके. कांग्रेस के राहुल बाबा अभी छुट्टियों के मूड में आने ही वाले थे कि भीषण गर्मी में उन्हें पसीना बहाने के लिए मैदान में उतरना पड़ा. दिल्ली और बिहार के चुनाव नतीजों से उत्साहित कांग्रेस ने सोचा कि अभी ये मौका बढ़िया है, जिसके द्वारा देश में यह हवा फैलाई जा अलावा कांग्रेस की मदद के लिए जेएनयू का “जमूरा” कन्हैया और उसकी वामपंथी बैंड पार्टी देश में नकारात्मक माहौल बनाने में जुटी हुई ही थी. लेकिन जब उन्नीस मई को चुनाव परिणाम घोषित हुए तो उन राज्यों की जनता ने अपना फैसला सुना दिया था कि नरेंद्र मोदी के “कांग्रेस-मुक्त” भारत को उनका समर्थन एक कदम और आगे बढ़ चूका है. कांग्रेस को केरल और असम जैसे राज्यों में सत्ता से बेदखल होना पड़ा, जबकि तमिलनाडु एवं बंगाल में अगले बीस वर्ष में दूर-दूर तक सत्ता में आने के कोई संकेत नहीं मिले. सांत्वना पुरस्कार के रूप में पुदुच्चेरी विधानसभा में कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन को पूर्ण बहुमत हासिल हो गया. कांग्रेस को इस सदमे की हालत में, सबसे तगड़ा वज्राघात लगा असम के नतीजों से. पिछले पंद्रह वर्ष से असम में गोगोई सरकार कायम थी, इसलिए कांग्रेस इस मुगालते में थी कि वहां चाहे जितनी भी बुरी स्थिति हो, वह चुनाव-पश्चात बदरुद्दीन अजमल जैसे घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति की पार्टी से गठबंधन करके येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल कर ही लेगी. लेकिन हाय री किस्मत... आसाम की जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर कांग्रेस के ज़ख्मों पर नमक मल दिया. आईये जरा राज्यवार विश्लेषण करें कि आखिर भारत लगभग कांग्रेस-मुक्त भारत की तरफ कैसे और क्यों बढ़ रहा है... केरल :- विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सोलर घोटाले और सेक्स स्कैंडल में फंसे मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्रियों का भविष्य तो पहले से ही स्पष्ट दिखाई देने लगा था, परन्तु कांग्रेस ने सोचा कि चुनावों से ठीक पहले नेता बदलना पार्टी की एकता के लिए ठीक नहीं है. कांग्रेस की यह सोच उसके लिए बिलकुल उलट सिद्ध हुई. केरल की पढी-लिखी जनता, जो कि हर पांच साल में सत्ताधारी को बदल देती है, उसने ओमान चांदी को सत्ता से बेदखल करने का मूड बना लिया था. रही-सही कसर 93 वर्षीय “नौजवान” वीएस अच्युतानंदन ने धुआंधार प्रचार करके पूरी कर दी. इसके अलावा कांग्रेस का कुछ प्रतिशत सवर्ण हिन्दू वोट भी भाजपा ले उड़ी. कांग्रेस के कई नेता दबी ज़बान में यह स्वीकार करते हैं कि केरल में कांग्रेस के एक बड़े वोट बैंक में भाजपा ने जबरदस्त सेंध लगाई है. वाम मोर्चा को जहां एक तरफ समर्पित और हिंसक कैडर का लाभ मिला, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के भ्रष्टाचार और स्कैंडलों का भी फायदा हुआ. केरल चुनावों में कोई सबसे अधिक फायदे में रहा, तो वह है भाजपा. जिस राज्य में आज तक भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी, 2016 के इन चुनावों में वह बैरियर भी टूट गया और ओ. राजगोपाल के रूप में भाजपा के पहले विधायक ने वहां पार्टी का खाता खोल ही दिया. लगातार कई चुनाव हारने के बाद भी राजगोपाल ने हिम्मत नही हारी और अंततः वामपंथ की हिंसक गतिविधियों तथा RSS के दर्जनों स्वयंसेवकों की हत्याओं का खून रंग लाया और पार्टी ने अपना वोट प्रतिशत 4% से बढ़ाकर 14% कर लिया. हालांकि चुनाव परिणामों के बाद चैनलों को इंटरव्यू देते समय चांडी तथा पिनारेई विजयन ने भले ही यह दावा किया हो कि उन्होंने राज्य में भाजपा को एकदम किनारे कर दिया है, लेकिन वास्तविकता में आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. चांडी और विजयन के खोखले दावों के विपरीत आंकड़े यह बताते हैं कि केरल में 14.4% वोट प्रतिशत के साथ प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और इसके सहयोगी तीसरे क्रमांक पर रहे हैं. 2011 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले लगभग पचास विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ने अपना वोट शेयर कहीं-कहीं दोगुना-तिगुना-चौगुना तक कर लिया है. पलक्कड इलाके की मलमपुझा विधानसभा सीट जिसे संभावित मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने जीता, वहां पर भाजपा उम्मीदवार सी.कृष्णकुमार को 46157 वोट मिले और वह दुसरे स्थान पर रहे, जबकि 2011 के चुनावों में यहाँ भाजपा उम्मीदवार को 2000 वोट ही मिले थे. त्रिवेंद्रम सीट पर भाजपा के उम्मीदवार क्रिकेटर श्रीसंत को 37764 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे जबकि इस सीट पर हार-जीत का अंतर सिर्फ एक हजार वोट का रहा. कोल्लम जिले की चथान्नूर सीट पर भाजपा उम्मीदवार 33199 वोट लेकर वामपंथी उम्मीदवार से हारे और दुसरे नंबर पर रहे, यहाँ भी कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही. 2011 में इस सीट पर भाजपाई उम्मीदवार को सिर्फ 3824 वोट मिले थे, यानी सीधे दस गुना बढ़ोतरी. ये तो सिर्फ दो-चार ही उदाहरण हैं, केरल की लगभग प्रत्येक सीट पर ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहाँ संघ के स्वयंसेवकों ने पिछले दस वर्ष में कड़ी मेहनत करके, और हिंसक वामपंथी कैडर द्वारा की गई हत्याओं के बावजूद हार नहीं मानी तथा कहीं दुसरे स्थान पर तो वोट संख्या में भारी बढ़ोतरी करते हुए कहीं तीसरे स्थान पर भी रहे. नरेंद्र मोदी की लगातार सक्रियता, नारायण गुरु जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति के आशीर्वाद और उनकी वजह से एक समुदाय के थोक में मिले वोटों तथा कांग्रेस-मुस्लिम लीग की सरकार के भ्रष्टाचार एवं हिन्दू विरोधी नीतियों के कारण केरल की जनता को होने वाली परेशानी के कारण अंततः केरल में भाजपा का खाता खुल ही गया और एक सीट पर विजय मिली. विश्लेषको की मानें तो नरेंद्र मोदी के “सोमालिया” वाले बयान को भाजपा विरोधी मीडिया ने जिस तरह बढ़ाचढ़ाकर पेश किया तथा केरल की सुशिक्षित जनता ने इसे हाथोंहाथ लिया तथा इसे लेकर चुनाव के अंतिम चरण में “पो मोने मोदी” (मोदी दूर जाओ), जैसे छिटक गए. यदि यह अप्रिय विवाद नहीं हुआ होता तो भाजपा के वोट प्रतिशत में एकाध प्रतिशत की और बढ़ोतरी होती, तथा जिन सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार बहुत कम वोटों से हारे हैं, वहां शायद जीत मिल सकती थी और संभव है कि भाजपा दो-तीन सीटें और जीत जाती. बहरहाल, केरल में भाजपा की जमीन तैयार हो चुकी है, अब इंतज़ार इस बात का है कि पिछले तीस-चालीस वर्ष से जारी UDF-LDF की राजनैतिक लड़ाई में भाजपा उस स्थिति में पहुँचेगी, जहां वह दस-बारह सीटें जीतकर “किंगमेकर” की भूमिका में आ जाए... और वह दिन अब दूर नहीं. कांग्रेस की चिंताओं की असल वजह यही है कि भाजपा उसका वोट प्रतिशत खा रही है. तमिलनाडु :- पिछले पचास वर्ष में तमिल अस्मिता, द्रविड़ आन्दोलन तथा “मतदाताओं को मुफ्त में बांटो” वाली नीतियों के कारण आज भी तमिलनाडु में भाजपा-कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के लिए कोई स्थान नहीं है. इसीलिए वहां से यदि कोई आश्चर्यजनक समाचार प्राप्त हुआ तो यही हुआ कि चुनाव पूर्व सारे सर्वे को अंगूठा दिखाते हुए “अम्मा” यानी जयललिता ने क्योंकि उसने चुनाव पूर्व ही द्रमुक से गठबंधन कर लिया था. कांग्रेस का द्रमुक प्रेम कोई नई बात नहीं है. यूपीए सरकार के दौरान भी 2G का महाघोटाला रचने वाले ए.राजा, कनिमोझी तथा दयानिधि मारण जैसे सुपर-भ्रष्टों का जमकर बचाव करती हुई कांग्रेस लोगों को आज भी याद है. चूंकि तमिलनाडु में हर पांच वर्ष में सत्ता की अदला-बदली वाला “ट्रेंड” चलता रहा है, इसलिए कांग्रेस ने सोचा कि मौका अच्छा है. साथ ही जयललिता पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में उन्हें जेल होने, जमानत पर छूटने जैसी बातों को लेकर भी कांग्रेस खासी उत्साहित थी, परन्तु तमिलनाडु की जनता कांग्रेस-द्रमुक को कोई मौका देने की इच्छुक नहीं दिखी. एमजी रामचंद्रन के बाद तीस वर्ष के अंतराल से यह पहली बार हुआ कि कोई पार्टी सत्ता में वापस आई हो. आखिर यह जादू कैसे हुआ? असल में तमिलनाडु की जनता ने “कौन कम भ्रष्टाचारी” है, इसमें चुनाव किया. जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि द्रमुक भी भ्रष्ट है और जयललिता तो बाकायदा जेल होकर आई हैं. परन्तु तमिलनाडु की जनता के मन में आज भी जयललिता की छवि “सताई हुई महिला” की है, इसलिए उसने “कम भ्रष्ट” को चुन लिया. इसके अलावा जयललिता द्वारा “मुफ्तखोरी” को प्रवृत्ति को बढ़ावा देने की नीतियाँ भी आम गरीब जनता में खासी लोकप्रिय रहीं (दिल्ली के पिछले चुनावों में हम इसका उदाहरण देख चुके हैं). पिछले पांच वर्ष में जयललिता सरकार द्वारा “अम्मा इडली”, “अम्मा डिस्पेंसरी”, जैसी विभिन्न योजनाएं चलाई गईं, जिसमें सरकारी खजाने से गरीबों को लगभग मुफ्त इडली, मुफ्त दवाओं, सस्ते कपड़ों आदि के कारण भले ही सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता रहा हो, लेकिन गरीब वर्ग जयललिता से दूर नहीं गया. आज की स्थिति यह है कि इस चुनाव में जयललिता ने मिक्सर, स्कूटी और लैपटॉप बांटने का भी वादा किया है और जनता को भरोसा है कि “अम्मा” अपना वादा निभाएगी. अब तमाम अर्थशास्त्री भले अपना माथा कूटते रहें, लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि तमिलनाडु के कई गरीब घरों में भोजन नहीं बनता. जब बीस रूपए में एक व्यक्ति आराम से सरकारी भोजन पर अपना पेट भर रहा हो, तो वहां घर पर खाना बनाने की जरूरत क्या है? जिस तरह दिल्ली के चुनावों में भाजपा इस “मुफ्त बांटो” वाले खेल में पिछड़ गयी थी, उसी प्रकार द्रमुक-कांग्रेस भी जयललिता के इन “मुफ्तखोरी वादों” के खेल में पिछड़ गए और सत्ता में वापस नहीं आ सके.  ऐसा भी नहीं है कि तमिलनाडु की जनता इस खेल को पसंद कर ही रही हो. अम्मा और करूणानिधि के परिवारवाद एवं दोनों के भ्रष्टाचार से जनता बेहद त्रस्त है, परन्तु उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है. कांग्रेस लगभग मृतप्राय है और भाजपा के पास वहां कोई स्थानीय नेता ही नहीं है, कैडर भी नहीं है. परन्तु तमिलनाडु की जनता में असंतोष है, यह इस बात से सिद्ध होता है कि इस बार तमिलनाडु में NOTA (इनमें से कोई नहीं) के बटन दबाने वालों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है. लगभग पच्चीस विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां हार-जीत के अंतर के मुकाबले NOTA को मिले वोटों की संख्या ज्यादा रही. इनमें से 16 विधानसभा सीटों पर जयललिता की पार्टी जीती. अर्थात यदि कोई तीसरा मजबूत ईमानदार राजनैतिक विकल्प होता, तो निश्चित ही कम से कम दस-बीस सीटें तो ले ही जाता. उदाहरण के लिए तिरुनेलवेली में AIDMK के उम्मीदवाद नागेन्द्रन सिर्फ 800 वोटों से जीते, जबकि NOTA को 2218 वोट मिले. इसी प्रकार एक क्षेत्रीय पार्टी तमिलगम के नेता कृष्णासामी सिर्फ 87 वोटों से हारे, जहां NOTA वोटों की संख्या 2612 रही. कहने का तात्पर्य यह है कि तमिलनाडु में “तीसरे विकल्प” के लिए उर्वर जमीन तैयार है. वहां की कुछ प्रतिशत जनता इन दोनों द्रविड़ पार्टियों, उनके भ्रष्टाचार तथा मुफ्तखोर तरीकों से नाराज है... जरूरत सिर्फ इस बात की है कि वहां भाजपा अपना कैडर बढ़ाए, ईमानदार प्रयास करे और इन दोनों पार्टियों के अलावा बची हुई पार्टियों से गठबंधन करे. हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि भारत में ““मुफ्त और सस्ता”” का आकर्षण इतना ज्यादा होता है, कि दिल्ली जैसे राज्य भी इसकी चपेट में आ जाते हैं तो तमिलनाडु की क्या बिसात? अब आते हैं पश्चिम बंगाल पर... वामपंथियों को “उन्हीं की हिंसक भाषा” में जवाब देने के लिए सदैव तत्पर तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने पिछले पाँच वर्ष में गाँव-गाँव में उसी पद्धति का कैडर बनाकर ममता दीदी के लिए यह सुनिश्चित कर दिया था कि बंगाल की जनता उन्हें एक बार पुनः चुने. सारदा घोटाला और अन्य दूसरे चिटफंड कंपनियों की लूट से बंगाल की गरीब जनता बुरी तरह त्रस्त थी, लेकिन ममता ने अपनी राजनैतिक परिपक्वता से जनता के इस क्रोध को तुरंत भाँप लिया और गरीबों की लुटी हुई रकम वापस करने के लिए 500 करोड़ का जो फंड स्थापित किया, उसने इन दोनों घोटालों की आँच से तृणमूल काँग्रेस को बचा लिया. इस राज्य में भी भाजपा की स्थिति केरल जैसी ही है, जहाँ वह कहीं भी रेस में नहीं थी. भाजपा को सिर्फ अपनी इज्जत बचानी थी और वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी करनी थी. ये दोनों ही काम भाजपा ने बखूबी किए. रूपा गांगुली, सिद्धार्थनाथ सिंह और बाबुल सुप्रियो में इतनी ताकत कभी नहीं थी कि वे बंगाल में भाजपा को सम्मानजनक स्थान दिला पाएं, लेकिन इन्होंने लगातार कड़ी मेहनत से भाजपा के वोट प्रतिशत में इजाफा जरूर किया. वैसे भी जिस राज्य में वामपंथ ने तीस साल शासन किया हो, तथा जिस राज्य के सत्रह जिलों में मुस्लिम आबादी तीस प्रतिशत से ऊपर पहुँच चुकी हो, वहाँ भाजपा के उभरते की संभावनाएँ दिनों क्षीण ही होती जाएँगी. तृणमूल के हिंसक कैडर, बांग्लादेशी घुसपैठियों से मुकाबला करने की अक्षमता तथा जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के अभाव ने भाजपा के लिए इस राज्य में करने के लिए कुछ खास छोड़ा ही नहीं था. सबसे अधिक आश्चर्यजनक और दयनीय स्थिति काँग्रेस की रही, जिसकी हालत यह हो गई कि उसे बंगाल में वामपंथी पार्टियों के साथ गठबंधन करना पड़ा. वैचारिक मखौल और विरोधाभास देखिए कि सोनिया गाँधी की पार्टी केरल में इन्हीं वामपंथियों के खिलाफ चुनाव लड़ रही थी. बहरहाल, पूरी तरह से मुस्लिम वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण तथा तृणमूल के कार्यकर्ताओं की जबरदस्त फील्डिंग के कारण काँग्रेस और वामपंथ दोनों मिलकर भी ममता दीदी को रोक नहीं सके और जयललिता की तरह ही ममता बनर्जी भी लगातार दूसरी बार बंगाल की क्वीन बनीं. भाजपा के लिए इस राज्य में खोने को कुछ था नहीं, इसलिए उसने सिर्फ पाया ही पाया. वामपंथ की जमीन और खिसकी तथा काँग्रेस को यह सबक मिला कि बंगाल में उठने के लिए अभी उसे कम से कम दस वर्ष और चाहिए.  असम में भाजपा को “सर्व-आनंद” मिला... देश की सेकुलर बिरादरी और विभिन्न मोदी विरोधी गुटों को सबसे तगड़ा मानसिक सदमा लगा असम के चुनाव परिणामों से. जिस तरह से नरेंद्र मोदी सहित पूरी पार्टी और संगठन ने असम में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी, वह इसीलिए थी कि पिछले पन्द्रह वर्ष के गोगोई कुशासन, भ्रष्टाचार और खासकर बांग्लादेशी घुसपैठ ने असम की जनता को बुरी तरह परेशान कर रखा था. RSS ने पिछले बीस वर्ष में इस राज्य में कड़ी जमीनी मेहनत की थी और बोडो उग्रवादियों तथा मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथों अपने कई स्वयंसेवक भी खोए, परन्तु हार नहीं मानी. इसी तरह आदिवासी समुदाय से आने वाले सर्बानंद सोनोवाल को पहले ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा ने अपना तुरुप का पत्ता खेल दिया था. सोनोवाल की साफ़ छवि, मोहक मुस्कराहट तथा जमीनी मुद्दों पर उनकी पकड़ के कारण भाजपा की यह चाल काँग्रेस को चित करने के लिए पर्याप्त थी. इस रणनीति में काँग्रेस के ताबूत में अंतिम कील ठोकने वाले एक और प्रमुख व्यक्ति रहे हिमंता बिस्वा सरमा, जो एक समय पर तरुण गोगोई के खासमखास हुआ करते थे. परन्तु काँग्रेस पार्टी में अपनी भीषण उपेक्षा और समुचित सम्मान नहीं मिलने के कारण हिमंता ने भाजपा की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और भाजपा ने भी इसे लपकने में देर नहीं की. हिमंता ने काँग्रेस की तमाम रणनीतियों को पहले ही भाँप लिया और समयानुकूल छिन्न-भिन्न भी कर दिया. भाजपा ने असम के चुनावों में बांग्लादेशी घुसपैठ तथा “असमिया अस्मिता” को प्रमुख मुद्दा बनाया और सीधे काँग्रेस को निशाना बनाने की बजाय AIUDF के बदरुद्दीन अजमल को निशाना बनाया. इसका फायदा भाजपा को इस तरह मिला कि वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना से काँग्रेस डर गई और उसने अंतिम मौके पर बदरुद्दीन अजमल की पार्टी से गठबंधन नहीं किया. इसका खामियाज़ा काँग्रेस और अजमल दोनों को भुगतना पड़ा. जहाँ एक तरफ काँग्रेस ऊपरी असम में सिर्फ एक सीट (गोगोई) ही जीत पाई वहीं 2006 में धमाकेदार एंट्री मारने वाले बदरुद्दीन अजमल की पार्टी घटकर सिर्फ तेरह सीटों पर सिमट गई, और वे खुद ही चुनाव हार गए...असम में भाजपा को दो-तिहाई बहुमत मिल जाएगा, यह तो वास्तव में किसी ने भी नहीं सोचा था. हालाँकि असम में भाजपा के लिए जमीन पिछले चुनावों में ही तैयार हो चुकी थी, परन्तु सिर्फ कार्यकर्ता या माहौल होने से चुनाव नहीं जीता जा सकता. चुनाव जीतने के लिए विपक्षी की रणनीति समझना और एक करिश्माई नेता की जरूरत होती है. असम में भाजपा के लिए यह कमी पूरी की AGP से आए सर्बानान्द सोनोवाल ने और काँग्रेस से भाजपा में आए हिमंता सरमा ने. असम में हिन्दू आबादी घटते-घटते 68% तक पहुँच चुकी है, जबकि काँग्रेस की मेहरबानियों से बांग्लादेशी घुसपैठियों और बदरुद्दीन अजमल जैसों के कारण मुस्लिम आबादी 32% तक पहुँच चुकी है. इस बार असम में असली राजनीति 68 बनाम 32 की ही थी, जिसे भाजपा ने बखूबी भुनाया. इसके अलावा काँग्रेस के भीतर उठता असंतोष, गोगोई परिवार का एकाधिकारवाद एवं दिल्ली में बैठे काँग्रेसी नेतृत्त्व द्वारा गोगोई पर अंधविश्वास करते हुए पार्टी की दूसरी पंक्ति को बिलकुल नज़रंदाज़ कर दिया जाना भी एक प्रमुख कारण रहा. असम में भाजपा ने अपना वोट प्रतिशत 12% से बढ़ाकर सीधे तीन गुना यानी 36% कर लिया, और सीटें सीधा दो-तिहाई. चुनाव परिणामों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ काँग्रेस सिकुड़ती जा रही है, भाजपा उन्हीं क्षेत्रों में अपने पैर पसारती जा रही है. भाजपा का वोट प्रतिशत भले ही अभी सीटों में नहीं बदल रहा है, लेकिन आने वाले कुछ ही वर्षों में जब यह वोट प्रतिशत बीस-बाईस प्रतिशत से ऊपर निकल जाएगा, तो सबसे पहले केरल जैसे राज्य में भाजपा “किंगमेकर” की भूमिका में आ जाएगी. तमिलनाडु में फिलहाल दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के लिए कोई स्थान नहीं है. तमिलनाडु में जीके मूपनार ने काँग्रेस को जहाँ छोड़ा था, आज काँग्रेस उससे भी नीचे चली गई है, ना तो मणिशंकर अय्यर उसे बचा सकते हैं और ना ही राहुल गाँधी. जब भी राहुल गाँधी का विषय आता है, कई वरिष्ठ काँग्रेसी भी दबी ज़बान से यह स्वीकार करते हैं कि राहुल गाँधी में ना तो चुनाव जीतने का करिश्मा है और ना ही उनमें राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाई देती है. ऐसा प्रतीत होता है मानो अनिच्छुक होते हुए भी उन्हें जबरदस्ती काँग्रेस उपाध्यक्ष पद पर बैठाए रखा गया है. कई कांग्रेसियों को अब अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है, इसीलिए जैसे रीता बहुगुणा समाजवादी पार्टी में चली गईं अथवा दिग्विजय सिंह सरेआम “पार्टी में सर्जरी” की बातें कहने लगे हैं अथवा जब सलमान खुर्शीद कहते हैं कि मोदी पर आक्रमण को लेकर काँग्रेस को गहन आत्मचिंतन करना चाहिए, तो इन सभी का मतलब एक ही होता है कि अब काँग्रेस पार्टी गंभीर अवस्था में पहुँच चुकी है. इन सभी पुराने कांग्रेसियों की चिंता वाजिब भी है. राहुल गाँधी के उपाध्यक्ष बनने के बाद से पार्टी लोकसभा चुनाव समेत ग्यारह चुनाव हार चुकी है. असम और केरल की सत्ता हाथ से निकल जाने के बाद तो यह स्थिति बनी है कि देश की मात्र 7.3% जनता पर ही काँग्रेस का शासन है, जबकि 43.1% देश की जनता पर भाजपा का अकेले शासन है. बचा हुआ पचास प्रतिशत राजद, जदयू, जयललिता, ममता, बीजद, वामपंथी जैसे क्षेत्रीय दलों का है, जो अपने-अपने इलाके में काँग्रेस से बहुत मजबूत हैं. अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल में काँग्रेस रहेगी या जाएगी, कहा नहीं जा सकता. आखिर काँग्रेस की लगातार यह दुर्गति क्यों होती जा रही है? कारण है मोदी सरकार द्वारा निरंतर शुरू की जारी नई-नई योजनाएँ और उनका सफल क्रियान्वयन. देश की जनता भले ही आज महँगाई से त्रस्त हो, परन्तु उन्होंने काँग्रेस का जो भीषण और नंगा भ्रष्टाचार देखा था, उसके मुकाबले पिछले दो वर्ष में मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा है. मोदी सरकार के कुछ मंत्री तो बेहद उम्दा कार्य कर रहे हैं, चाहे बिजली और कोयला क्षेत्र में पीयूष गोयल हों, सड़क परिवहन और नए राजमार्ग बनाने के मामले में नितिन गड़करी हों, रक्षा मंत्रालय जैसे अकूत धन सम्पदा वाले मंत्रालय को संभालने वाले ईमानदार मनोहर पर्रीकर हों या रेलवे मंत्रालय में नित-नवीन प्रयोग करते हुए जनता के लिए सुविधाएँ जुटाने वाले सुरेश प्रभू हो... अथवा विदेश में फँसे किसी भारतीय के एक ट्वीट पर पूरे दूतावास को दौड़ाने वाली सुषमा स्वराज हों... सभी के सभी बेहतरीन कार्य कर रहे हैं. इन सबके ऊपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने पिछले दो वर्ष में प्रशासन में भ्रष्टाचार के कई छेद बन्द किए हैं, तथा नवीन तकनीक अपनाते हुए राशन कार्ड, गैस, केरोसीन की कालाबाजारी करने वाले तथा बोगस (नकली) उपभोक्ताओं की पहचान की है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद कोयला ब्लॉक आवंटन की नई नीति ने तो कमाल ही कर दिया है, तथा उच्च स्तर पर होने वाले भीषण भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम किया है. यूँ तो दो वर्ष में मोदी सरकार की कई उपलब्धियाँ रही हैं, परन्तु यहाँ हम संक्षेप में कुछ बिंदुओं को देखते हैं, जिनके कारण मोदी सरकार की लोकप्रियता बढ़ी और काँग्रेस की घटी. मोदी सरकार की सबसे सफल योजना “जन-धन योजना” कही जा सकती है, जिसमें पन्द्रह करोड़ बैंक खाते खुलवाए गए. इन खातों में दस करोड़ खाते ऐसे हैं जिन्हें रू-पे डेबिट कार्ड भी दिया गया है, जिसमें जीवन बीमा भी शामिल है. गैस सब्सिडी, मनरेगा का पैसा इत्यादि अब सीधे बैंक खाते में जाता है, जिसके कारण निचले स्तर पर भ्रष्टाचार में भारी कमी आई है. इसके अलावा दवाओं के दामों पर नियंत्रण के लिए जो क़ानून लाया गया और सभी जीवनरक्षक एवं अति-आवश्यक दवाओं के दामों में भारी कमी हुई, उसके कारण जनता में एक अच्छा सन्देश गया है. फ्रांस सरकार से 36 राफेल विमानों की खरीदी में त्वरित निर्णय एवं पिछली सरकार के मुकाबले इन विमानों के दामों में कमी करवाना हो, या फिर “मेक इन इण्डिया” और मुद्रा बैंक कार्यक्रम के तहत छोटे-मझोले उद्योगों को प्राथमिकता देने तथा पचास हजार से दस लाख रूपए के ऋण सरलता से देने जैसी नीतियाँ हों, इन सभी कार्यक्रमों को समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों ने हाथोंहाथ लिया है. देश की जनता यह भी देख रही है कि किस तरह काँग्रेस और विपक्षी दल मोदी सरकार को GST बिल पास नहीं करने दे रहे, किस तरह विभिन्न मुद्दों पर संसद ठप रखे रहते हैं... किस तरह कन्हैया-उमर खालिद जैसे देशद्रोहियों को समर्थन देकर देश में अशांति का माहौल पैदा कर रहे हैं... जातिवादी राजनीति का ज़हर युवाओं के दिमाग में घोल रहे हैं... जनता अब इन सब हथकंडों से ऊब चुकी है, परन्तु काँग्रेस इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है. इसीलिए जब राहुल गाँधी अचानक रात को JNU पहुँच जाते हैं, अथवा जबरिया दलित घोषित किए गए रोहित वेमुला की लाश पर आँसू बहाते नज़र आते हैं या फिर मल्लिकार्जुन खड़गे खामख्वाह किसी बात पर संसद ठप्प करने की कोशिश करते हैं तो जनता मन में ठानती जाती है कि अब काँग्रेस को वोट नहीं देना है. नतीजा वही हो रहा है, जो इन विधानसभा चुनावों में हमें देखने को मिल रहा है... जनता अब क्षेत्रीय दलों को काँग्रेस से बेहतर समझने लगी है, जो कि देश और खासकर काँग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता... देखना तो यही है कि काँग्रेस खुद में “बदलाव” कब लाती है? या फिर लाती भी है कि नहीं?? कहीं ऐसा ना हो कि अगले वर्ष हिमाचल, उत्तराखण्ड या कर्नाटक में से एकाध-दो राज्य भी उसके हाथ से खिसक जाएँ और 125 साल पुरानी काँग्रेस एक “क्षेत्रीय दल” बनकर रह जाए... देखा जाए तो यह स्थिति भाजपा के लिए भी ठीक नहीं है, लेकिन क्या किया जा सकता है, “होईहे वही, जो राम रचि राखा”... क्योंकि नेशनल हेरल्ड और अगस्ता मामले में अब राम ही बचाएँ तो बचाएँ...

Posted on: 4 June 2016 | 10:24 am

New Nationalist Wave in India

राष्ट्रवाद का बढ़ता उफ़ान... जब किसी रबर की बड़ी गेंद को लगातार दबाया जाता है, तो एक सीमा के पश्चात वह दबाने वाले को वापस एक जोरदार धक्का लगाती है. जिसे हम “एक्शन का रिएक्शन” कहते हैं. कुछ सप्ताह पहले जब JNU में उमर खालिद और उसके कुछ जेहादी दोस्तों ने “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह” जैसे नारे लगाए होंगे तो उन्हें अनुमान भी नहीं होगा कि उनकी इस हरकत की प्रतिक्रिया में सोशल मीडिया से पैदा हुआ तूफ़ान न सिर्फ उन्हें उड़ा ले जाएगा, बल्कि भारत में एक नई राष्ट्रवादी लहर का निर्माण भी कर देगा. “पिछले कुछ दिनों से “भारत माता की जय” बोलना या नहीं बोलना तेजी से एक मुद्दा बनता जा रहा है, विपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि संघ और भाजपा ने जानबूझकर इसे मुद्दा बनाया है ताकि मूल मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके... लेकिन यह सच नहीं है. वास्तविकता तो यह है कि “भारत माता की जय” का मुद्दा जनता का अपना मुद्दा है, जिसे जनता ही परवान चढ़ाया और जनता के बीच उपजे क्रोध ने इस मुद्दे को यहाँ तक पहुंचा दिया है. आखिर इस उफनते राष्ट्रवाद और देशप्रेमी नारों की वजह क्या है, इसके लिए हमें इस विमर्श को हालिया घटनाओं में मद्देनज़र देखना होगा. तथ्यों को देखने पर यह पता चल जाएगा कि “भारत माता की जय” संघ-भाजपा का नहीं, बल्कि क्रोधित जनता का स्वयं का मुद्दा है. भारत माता की जय” इससे पहले कभी भी मुद्दा नहीं था, लेकिन JNU के इन वामपंथी सोच वाले छात्रों और उन्हें शह देने वाले प्रोफेसरों के कारण इस ““एक्शन” की “रिएक्शन”” हुई. ऐसा नहीं है कि JNU में ऐसे भारत विरोधी, व्यवस्था विरोधी एवं भारत से घृणा दर्शाते हुए नारे पहली बार लगे हों. JNU पिछले काफी समय से देशद्रोहियों का अड्डा बनता जा रहा था, यह बात यूपीए सरकार के बाशिंदे भी जानते थे, परन्तु अपने हितों एवं वामपंथ के साथ उनके मधुर संबंधों के कारण समस्या को लगातार उपेक्षित करते रहे. नतीजा यह हुआ कि JNU के ये भस्मासुर लगातार अपना आकार बढ़ाते गए. लेकिन इस बार एक बड़ा अंतर आ गया, वह है सोशल मीडिया. JNU में उस काली रात को सबसे पहली बार जब ये नारे लगे, उस समय लगभग रात के नौ बजे थे, नारे लगाने वालों ने अपना मुंह ढंक रखा था. कन्हैया और उमर खालिद के सामने ये नारे लगाए जा रहे थे और ये दोनों छात्र नेता न सिर्फ ऐसी हरकतों पर चुप्पी साधे हुए थे, बल्कि अपनी बॉडी लैंग्वेज द्वारा उसे मूक समर्थन भी दे रहे थे. जबकि छात्रसंघ अध्यक्ष होने के नाते कन्हैया का यह कर्त्तव्य था कि वह न सिर्फ ऐसे देशद्रोही नारे लगाने वालों (तथाकथित अज्ञात) को न सिर्फ रोकता, बल्कि उनकी पहचान करके खुद ही पहल करते हुए बाकायदा पुलिस में FIR दर्ज करता, परन्तु न तो ऐसा होना था और न हुआ, क्योंकि “भारत तेरे टुकड़े होंगे” की लालसा तो इन दोनों छात्र नेताओं के मन में भी थी. नारे लगाने वाले, जो कि ज़ाहिर है किसी पहचान वाले के साथ ही कैम्पस में आए होंगे और उन्हें दर्जनों छात्र पहचानते भी होंगे, चुपचाप कैम्पस में ही विलीन हो गए. ऐसी हरकतें JNU में कई बार दिनदहाड़े भी हो चुकी थीं, परन्तु इस बार मामला उलट गया. उधर रात नौ बजे नारे लगे, और इधर सवा नौ बजे उन नारों का वीडियो देशद्रोही नारों की स्पष्ट आवाज़ के साथ इंटरनेट पर अपलोड हो गया. देखते ही देखते यह वीडियो वायरल हो गया और समूचे देश के “टेक-सेवी” युवाओं को दो घंटे में ही पता चल गया कि JNU में पिछले कुछ वर्षों से क्या चल रहा था. फिर क्या था, बस एक बार पिटारा खुलने की देर थी, आजकल तो हर हाथ में मोबाईल है, देखते ही देखते अगले तीन दिनों में सात और वीडियो सामने आ गए, जिसमें स्पष्ट रूप से देशद्रोही नारे लगाने वाले “कथित छात्र” दिखाई दिए. भारत की तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया, जिसने अभी तक JNU की इन हरकतों पर आँखें मूँद रखी थीं, सोशल मीडिया की इस जोरदार मुहीम के कारण उसे मजबूरी में ये हरकतें दिखानी पड़ीं. जब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने CRPF के छिहत्तर जवान मार दिए थे, उस समय भी JNU में जश्न मनाया गया था, लेकिन हमारी मीडिया जो सिर्फ “धंधा करना” जानती है, उसने कभी भी ऐसे देशद्रोही विचारों और घटनाओं को तरजीह नहीं दी. धंधेबाज मीडिया यहीं नहीं रुका, मीडिया में बैठे वामपंथी पिठ्ठुओं ने कन्हैया और उमर खालिद को “क्रांतिकारी हीरो” के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. उमर खालिद को बेक़सूर तथा कन्हैया को मासूम बताया जाने लगा. इसे देखते हुए देश की जनता का क्रोध धीरे-धीरे बढ़ने लगा. लेकिन मीडिया चाहे जितना प्रयास कर ले, आज के युग में कोई खबर दबाना मुश्किल हो चूका है. “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे और विचार काफी लम्बे समय से JNU में पाले-पोसे जा रहे हैं, लेकिन देश की सामान्य जनता को इसकी खबर नहीं थी, परन्तु जब उमर खालिद और कन्हैया के बहाने सोशल मीडिया पर JNU के सारे कारनामे एक-एक करके सामने आने लगे, तब जाकर जनता को पता चला कि न सिर्फ ऐसी हरकतें इस विश्वविद्यालय में आम हो चली हैं, बल्कि वहां के प्रोफेसरों और छात्रों ने मिलकर एक ऐसा “गिरोह” तैयार कर लिया है जो अरशद आलम और खुर्शीद अनवर जैसे दुष्कर्म के आरोपियों के बचाव में भी सक्रीय हो जाता है. इस देशद्रोही घटना के बाद ही जनता का ध्यान इस बात पर गया कि JNU अथवा फिल्म इंस्टीट्यूट पुणे में भारत के करदाताओं की गाढ़ी कमाई से कैसे-कैसे लोग मस्ती छान रहे हैं, तीस-पैंतीस-चालीस साल की आयु तक के मुफ्तखोर वहां “छात्र”(??) बने बैठे हैं, होस्टलों के कमरों पर कब्जे जमाए बैठे हैं, शिक्षा सब्सिडी की आड़ में सस्ते कमरे और सस्ते भोजन के चक्कर में वर्षों से वहां जमे हुए हैं और विभिन्न NGOs के जरिये अपनी राजनीति चला रहे हैं. देश की जनता यह जानकार हैरान थी कि जाने कैसे-कैसे “फर्जी कोर्सेस” की आड़ में यह सारा खेल वर्षों से चल रहा था. इस समय तक “भारत माता की जय” जैसा कहीं कोई मुद्दा नहीं था. देश की जनता के खदबदाते क्रोध के बीच ही मानव संसाधन मंत्रालय का यह निर्णय आया कि युवाओं में देशप्रेम की भावना जागृत करने के लिए देश के सभी विश्वविद्यालयों में २०० फुट ऊंचा तिरंगा फहराया जाएगा. चेन्नई, हैदराबाद और JNU में जिस तरह की विचारधारा का पालन-पोषण किया जा रहा है और जिन लोगों द्वारा किया जा रहा है, उन्हें यह निर्णय कतई पसंद नहीं आया. तिरंगा फहराने जैसे सामान्य से देशप्रेमी निर्णय का भी दबे स्वरों में विरोध शुरू हो गया, क्योंकि मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही देश में कुछ कथित बुद्धिजीवियों का एक ऐसा गिरोह तैयार हो गया है, जिसे सरकार के प्रत्येक निर्णय पर अपना विरोध जताना ही है. देश का मध्यमवर्ग यह हरकतें देखकर हैरान-परेशान था, आखिर ये हो क्या रहा है. इस नाजुक मोड़ पर संघ प्रमुख का बयान आया कि “सभी को भारत माता की जय बोलना ही चाहिए”. बस फिर क्या था, दिन-रात संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले तथा “राष्ट्रवाद” नामक शब्द से भी घृणा करने वाले उछलकूद मचाने लगे. सबसे पहले हमेशा की तरह ओवैसी सामने आए. एक हास्यास्पद बयान में उन्होंने कहा कि “संविधान में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है, कि भारत माता की जय बोलना जरूरी है”. ओवैसी ने तिरंगे को धर्म से जोड़ने की जो फूहड़ कोशिश की, उसके कारण इस विवाद में जो कुछ तटस्थ लोग थे, वे भी न सिर्फ आश्चर्यचकित हुए, बल्कि क्रोधित भी हुए. सामान्य लोग यह सोचकर हैरान होने लगे कि आखिर तिरंगा फहराने और भारत माता की जय बोलने जैसे मुद्दों में धर्म और विचारधारा कहाँ से घुस आई. देश की जनता यह सोचने पर मजबूर हो गई कि आखिर देश के विश्वविद्यालयों में तथा राजनीति में यह कैसा ज़हर भर गया है, कि मोदी और भाजपा से घृणा करने वाले अब तिरंगे और भारत माता से भी घृणा करने लगे? उल्लेखनीय है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने कभी भी “भारत माता की जय” का नारा नहीं लगाया, जबकि मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद ने इस नारे का गर्व से उद्घोष किया. ओवैसी के ऐसे घृणित बयान से यह समझ में आता है कि ओवैसी जानबूझकर जिन्ना की राह पर आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि तिरंगे और भारत माता को इस्लाम से जोड़ने की हिमाकत कोई मूर्ख या धूर्त ही कर सकता है. लेकिन बात यहीं तक नहीं थमी, ओवैसी के सुर में सुर मिलाते हुए देवबंद से सम्बंधित दारुल इफ्ता ने भी एक मुस्लिम के सवाल पूछने पर 19 मार्च को यह फ़तवा जारी किया कि “इस्लाम में भारत माता की जय बोलना निषिद्ध है, क्योंकि इस्लाम में बुत-परस्ती की मनाही है”. फतवे में कहा गया कि चूंकि भारत माता को एक मूर्ति के रूप में, एक देवी के रूप में पेश किया गया है इसलिए इसकी वंदना करना इस्लाम के अनुरूप नहीं है. जबकि सामान्य बुद्धि वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है कि भारत माता को देवी के रूप में किसी भी संगठन ने प्रोजेक्ट नहीं किया है. भारत माता की एक काल्पनिक छवि संघ ने जरूर गढ़ी है, परन्तु उसे सर्वमान्य रूप से “देवी” नहीं बल्कि “माता” के रूप में चित्रित किया जाता है. अब भला माता को पूजने अथवा उसके सामने सर झुकाने में क्या तकलीफ है? यदि हम बांग्लादेश के राष्ट्रीय गीत को ध्यान से सुनें और उसका अर्थ निकालें तो साफ़-साफ़ पता चलेगा कि उसमें भी “आमार शोनार बांगला” को मातृभूमि के रूप में पेश किया गया है और उसकी वंदना की गयी है. तो फिर ओवैसी अथवा देवबंद के उलेमाओं ने यह तर्क इस्लाम की किस किताब से निकाल लिया कि “माँ के आगे सजदा नहीं किया जा सकता”?? दरअसल यह कुछ और नहीं सिर्फ और सिर्फ मोदी एवं संघ का अंध-विरोध भर है. चूंकि संघ ने कहा है कि इसलिए हम उसका ठीक उल्टा ही करेंगे, यही जिद देश के लिए घातक है. पाठकों को याद ही होगा कि इससे पहले भी काफी लम्बे समय से इस्लामी “विद्वान”(??) वन्देमातरम का विरोध करते आए हैं. जबकि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में गांधी-नेहरू के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ने वाले कई इस्लामी नेताओं ने उन दिनों बड़े गर्व से वन्देमातरम का नारा लगाया था, यह गीत भी गाया था. फिर पिछले साठ साल में ऐसा क्या हो गया कि “वन्देमातरम” गीतों को भी साम्प्रदायिक की श्रेणी में डाल दिया गया? सरस्वती वंदना के मामले में तो एकबारगी समझ में आता है, कि चूंकि वह हिन्दू देवी हैं, इसलिए इस्लामी कट्टरता सरस्वती वंदना का विरोध करते हैं, परन्तु “भारत माता” कोई देवी नहीं है, वह तो जन्मभूमि का पर्याय है. तो क्या जन्मभूमि की भी वंदना नहीं की जा सकती? ऐसा कट्टर रवैया ठीक नहीं है. यही नियम सूर्य नमस्कार एवं योग पर भी लागू होता है. सूर्य कोई भगवान् नहीं हैं, वह तो एक अखंड ज्योति पुंज है, जिसके बिना धरती पर जीवन संभव नहीं है. माना कि इस्लामी मान्यताओं में “ॐ सूर्याय नमः” कहना निषिद्ध है, लेकिन क्या अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य हेतु बिना मन्त्र का उच्चारण किए सूर्य नमस्कार नहीं लगाए जा सकते? देवबंद के कट्टरपंथी मौलवियों द्वारा मनमाने तरीके से इस्लाम की व्याख्या करने के कारण ही उदारवादी मुस्लिम तबका भी धीरे-धीरे समाज से कटता चला जाता है. जबकि आज भी देश के हजारों गाँवों में रामनवमी की शोभायात्रा में मुस्लिम समाजजन फूलों से स्वागत करते हैं और ताजिए के जुलूस में कई हिन्दू भाई कन्धा लगाते हैं. ओवैसी और देवबंद जैसे लोगों के कारण अब “भारत माता” और सूर्य को भी संघी या साम्प्रदायिक बना दिया गया है, बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. अपनी राजनीति चमकाने के लिए ओवैसी के अनुयायी कैसे अंध विरोध में उतर सकते हैं, इसका उदाहरण है महाराष्ट्र विधानसभा में MIM के सदस्य वारिस पठान द्वारा सदन के अन्दर भी वन्देमातरम अथवा भारत माता की जय नहीं बोलने पर अड़ गए. स्वाभाविक है कि जब एक पक्ष अड़ियल रवैया अपनाता है तो सामने वाला पक्ष भी और अधिक अड़ियल बन जाता है. नतीजा यह हुआ कि शिवसेना और भाजपा के विधायकों ने एकमत से वारिस पठान को विधानसभा से निलंबित करवा दिया. कांग्रेस और वामपंथियों का तो क्या कहना, ये लोग भी बिलकुल कट्टर इस्लामी मानसिकता के समकक्ष व्यवहार करते हैं, अर्थात यदि मोदी-संघ-भाजपा ने कोई बात कही है तो चाहे वह कितनी भी अच्छी या सही हो, उसका विरोध जरूर करेंगे, और विरोध भी ऐसा कि ये लोग राष्ट्रहित के मुद्दे पर भी एकदम दुसरे छोर पर जा बैठते हैं. विपक्षी दलों एवं कथित बुद्धिजीवियों के इसी अंध-विरोध तथा जिद के कारण श्रीनगर की NIT में भी “राष्ट्रवादी विचार विस्फोट” हो गया. काँग्रेस शासन के दौरान वर्षों से स्थानीय कश्मीरियों द्वारा सताए जाने और अपमान झेलने के लिए अभिशप्त NIT श्रीनगर के छात्रों ने आखिर JNU के इस देशद्रोही कृत्य को देखते हुए तिरंगा उठा ही लिया... और जो काम श्रीनगर की वादी में पिछले बीस-पच्चीस वर्ष में नहीं हुआ था, वह इन उत्साही छात्रों ने कर दिखाया. श्रीनगर में तिरंगा लहराना और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए दौड़ लगाना एक क्रान्तिकारी कदम कहा जाना चाहिए. हालाँकि छात्रों का यह दुस्साहस श्रीनगर के स्थानीय छात्रों एवं जम्मू-कश्मीर पुलिस-प्रशासन में घुसे बैठे देशद्रोही तत्त्वों को रास नहीं आया, और उन्होंने एकमत होकर बाहर से पढ़ाई करने आए छात्रों के साथ बुरी तरह मारपीट की, लड़कियों को अश्लील गालियाँ दीं और फोन पर ह्त्या करने की धमकी दी. ऐसे समय में जो कथित रूप से निष्पक्ष बुद्धिजीवी JNU मामले में अपना गला फाड़ रहे थे, अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की दुहाई दे रहे थे और शिक्षा कैम्पस में पुलिस कैसे घुसी जैसे अनर्गल प्रश्नों का प्रलाप कर रहे थे, वे लोग अचानक गायब हो गए. इन वामपंथी प्रोफेसरों और समाजसेवा का झण्डा उठाए बुद्धिजीवियों को NIT श्रीनगर के छात्रों से कोई लेना-देना ही नहीं रहा. उमर खालिद के समर्थन में सरकार को कोसने वाले NIT श्रीनगर मामले में एकदम चुप्पी साध गए, क्योंकि भले ही दोनों स्थानों पर छात्र ही शामिल हों, लेकिन JNU में वामपंथ के प्यारे-दुलारे देशद्रोही नारे लगे थे जबकि श्रीनगर में वामपंथ को चिढ़ाने वाले “भारत माता की जय” के नारे लग रहे थे. अर्थात इनके सिद्धांत, इनकी कथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इनके दवात शिक्षा कैम्पसों की स्वायत्तता की बातें आदि सिर्फ और सिर्फ “वैचारिक पाखण्ड” निकला. देशवासी समझ गए कि छात्रों द्वारा “अफज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं” तो वामपंथ का प्रिय नारा हो सकता है, लेकिन ऐसे ही छात्रों द्वारा श्रीनगर में “भारत माता की जय” का नारा इन्हें बीमार कर देता है. तात्पर्य यह है कि इस विवाद ने वामपंथियों को पूरी तरह बेनकाब कर डाला. यानी जो हंगामा JNU के देशद्रोहियों द्वारा उनकी राजनीति चमकाने और गिरोह बढाने के लिए शुरू किया गया था, वह ठेठ इस्लाम और कांग्रेस तक जा पहुंचा. वामपंथ ने इस देश के बौद्धिक वातावरण का बहुत नुकसान किया है. भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता वगैरह तो खैर उनके शब्दकोष में है ही नहीं, लेकिन वामपंथ ने कभी भी भारत को एक “राष्ट्र” माना ही नहीं. वामपंथियों के अनुसार भारत सिर्फ कुछ राज्यों का संघ है, जिसे जबरदस्ती एक साथ रखा गया है. इसीलिए जब जनेवि में ““भारत तेरे टुकड़े होंगे”” के नारे लगते हैं तो उसका बचाव करने के लिए सबसे पहले और सबसे आगे वामपंथी ही दिखाई देते हैं. दिनदहाड़े देश को तोड़ने का सपना देखने वाले इस वामपंथ को देश का युवा काफी पहले समझ चूका है, और इसी युवा ने विकास और रोजगार के लिए मोदी को केंद्र की सत्ता तक पहुँचाया है. यानी विचारधारा का मरते जाना, विभिन्न राज्यों में सीटों का सिमटते जाना और एक क्षेत्रीय दल के रूप में लगभग पहचान खोते जाने के सदमे ने वामपंथियों को खुलेआम देशद्रोह के साथ खड़े होने की स्थिति में ला दिया है. “भारत माता की जय” का विरोध इसी श्रृंखला की एक कड़ी है. मुख्यधारा से लगभग कट जाने की वजह से वामपंथ ने अब नई चाल चलने का फैसला किया है, और वह है देश के तमाम विश्वविद्यालयों में युवाओं को झूठी कहानियाँ सुनाकर भड़काने की. कभी रोहित वेमुला को नकली दलित बनाकर पेश करना, तो कभी आंबेडकर-पेरियार के नाम पर जातिवाद का ज़हर घोलना तो कभी उमर खालिद जैसे लोगों को सरेआम समर्थन देकर युवाओं में असंतोष भड़काना हो... ये सारे कारनामे वामपंथी या तो खुले तौर पर कर रहे हैं, या फिर वर्षों से विभिन्न संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में जमेजमाए बैठे उनके गुर्गे प्रोफेसरों और NGOs के माध्यम से, जैसे भी हो और जितना भी हो मोदी सरकार के खिलाफ तथा देश-समाज को तोड़ने की दिशा में काम किए जा रहे हैं. परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि “एक्शन” का “रिएक्शन” तो होता ही है, इसीलिए जब JNU में मुठ्ठी भर लोग “भारत तेरे टुकड़े होंगे” के नारे लगाते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया में समूचे देश में राष्ट्रवाद एवं भारत माता की जय का रिएक्शन शुरू हो जाता है, क्योंकि अब देश का युवा समझदार हो चूका है. युवाओं को भी समझ में आने लगा है कि फैक्ट्रियों, उद्योगों, विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं में बैठे ये वामपंथी उन्हें अपना मोहरा बनाकर हड़ताल, धरने, प्रदर्शनों में झोंक देते हैं और खुद अपनी राजनीति चमकाकर चुपके से पीछे हट जाते हैं. पाठकों को याद होगा कि उमर खालिद और कन्हैया के साथ सरेआम देशद्रोही नारे लगाने वालों में एक और नाम आया था “अपराजिता राजा” का. यह कन्या वामपंथी नेता डी.राजा की बेटी है. अपराजिता राजा का गुनाह भी उमर खालिद और उसके साथियों जितना ही था. लेकिन क्या अब उसका नाम कहीं भी दिखाई देता है? क्या किसी पुलिस FIR में अथवा किसी न्यायालयीन मामले में अपराजिता राजा जुडी हुई दिखाई देती हैं? नहीं... क्योंकि वह बड़े वामपंथी नेता की बेटी है. यानी डी. राजा साहब ने अपनी बेटी को तो बड़े सुरक्षित तरीके से इस मामले से बाहर करके उसका भविष्य सुरक्षित कर लिया, लेकिन फँस गए उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य. सुनने में आया है कि केंद्र सरकार की एजेंसियों और डी. राजा के बीच अपराजिता को लेकर कोई गुप्त सौदा हुआ है, जिसके अनुसार सरकार ने अपराजिता को इस मामले से एकदम गायब करने के बदले, संसद में कुछ बिलों पर वामपंथी दलों सरकार को सहयोग करेंगे. संसद के बजट सत्र में हमने इस गुप्त समझौते की एक बानगी भी देख ली, जब सिर्फ GST को छोड़कर लगभग सभी बिल सरकार ने पास करवा लिए. विश्लेषकों का मानना यह भी है, कि यह मुद्दा दोनों की आपसी “गुप्त डील” के तहत बनाया गया, ताकि बंगाल चुनावों में काँग्रेस को थोड़ा नीचे किया जा सके. यानी डी.राजा भी खुश, उनकी राजनीति भी चमक गयी और इधर सरकार भी खुश... अब खालिद, अनिर्बान और कन्हैया विभिन्न मामलों एवं न्यायालयों में वर्षों तक रगड़े जाएंगे, जबकि अपराजिता राजा कुछ वर्ष बाद अपने पिता की वामपंथी पार्टी में किसी प्रमुख पद पर दिखाई देगी. अर्थात “राष्ट्रवाद का यह भावनात्मक उफान, तथा “भारत माता की जय”” विवाद भले ही अनजाने में एक बड़ा मुद्दा बन गया हो, परन्तु यह सरकार के लिए भी लाभ का सौदा रहा कि इधर संसद में उसके कुछ बिल पास हो गए और उधर श्रीनगर में राष्ट्रवाद के नारे पहली बार बुलंद हुए... और वामपंथियों के लिए भी, जिनकी राजनीति उनके वोट बैंक के बीच थोड़ी चमक गई, ताकि बंगाल के चुनावों में वे ममता से ढंग का मुकाबला कर पाएँगे. पुनश्च :- राष्ट्रवादी भावनाओं का यह तूफ़ान सिर्फ भारत में ही सीमित नहीं है, विश्व के अनेक देशों में राष्ट्रवाद की यह भावना तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में सबसे आगे चल रहे डोनाल्ड ट्रम्प. ट्रम्प ने अपने भाषणों में जिस तरह से खुलेआम इस्लामी आतंकवाद से निपटने के लिए अतिवादी उपाय अपनाने के संकेत दिए हैं, उसने समूचे विश्व को बेचैन कर दिया है. डोनाल्ड ट्रम्प की बढ़ती लोकप्रियता, एवं अमेरिकी युवाओं को अपने उत्तेजक भाषणों के जरिये उकसाने की उनकी शैली से परम्परागत अमेरिकी राजनीति में हलचल मची हुई है. अमेरिका वैसे ही 9/11 की घटना के बाद मुस्लिम प्रवासियों के प्रति कठोर रवैया अपना ही रहा है, लेकिन यदि डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो इस्लामी देशों के प्रति उसकी नीतियों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. इसी प्रकार ISIS के अत्याचारों से तंग आकर सीरिया सहित अनेक इस्लामी देशों से जो शरणार्थी यूरोप पहुँचने में कामयाब हो गए, वे वहाँ के खुले समाज को देखकर खुद पर काबू नहीं रख पा रहे. आए दिन जर्मनी, स्वीडन, नॉर्वे, बेल्जियम इत्यादि देशों से मुस्लिम शरणार्थियों द्वारा लूटपाट, बलात्कार की ख़बरें आना शुरू हो गई हैं. इन हरकतों की वजह से यूरोप में भी “प्रतिकारक रिएक्शन” की एक लहर जागने को है. यूरोप के निवासी सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि हमने इन जंगलियों को शरण देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी. यदि मुस्लिम शरणार्थी नहीं सुधरे और उन्होंने सम्बन्धित देशों के नियम-कानूनों को नहीं माना तो “राष्ट्रवादी भावनाओं” के उभार की शुरुआत जो हमेशा की तरह जर्मनी और रूस से शुरू हुई है, आगे चलकर न सिर्फ उन शरणार्थियों, बल्कि कुछ इस्लामी देशों को भारी पड़ेगी. संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे भारत में JNU की नारेबाजी ने “उत्प्रेरक” का काम किया, वैसे ही अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्दों पर युवा एवं देशप्रेमी जनता के बीच “राष्ट्रवाद” की भावना उफान मारने लगी है. कम से कम भारत में तो इसके लिए हमें वामपंथियों को धन्यवाद देना ही चाहिए, कि उन हरकतों की वजह से एक “अ-मुद्दा” भी महत्त्वपूर्ण बन गया, जिसने देश में जागरूकता बढ़ाने एवं एकात्मकता कायम करने में अच्छी भूमिका निभाई और इसी बहाने कुछ “तटस्थ” लोगों को भी संघ के पाले में धकेल दिया है.

Posted on: 3 May 2016 | 11:57 pm

Posting Rapist Bishop in India

वेटिकन द्वारा रेपिस्ट पादरी की भारत में नियुक्ति पिछले कुछ वर्षों में चर्च के पादरियों द्वारा बाल यौन शोषण की घटनाएँ पश्चिम में अत्यधिक मात्रा में बढ़ गई हैं. समूचा वेटिकन प्रशासन एवं स्वयं पोप पादरियों की इस “मानसिक समस्या” से बहुत त्रस्त हैं. पोप फ्रांसिस और इससे पहले वाले पोप ने भी मीडिया के सामने खुद स्वीकार किया है कि पादरियों में बाल यौन शोषण की “बीमारी” एक महामारी बन चुकी है. पश्चिमी देशों में मुक्त यौन व्यवहार एवं खुले समाज के कारण इस प्रकार की घटनाएँ जल्द ही सामने भी आ जाती हैं, इसीलिए सन 2001 से 2014 के बीच वेटिकन ने अपने पादरियों के गुनाह छिपाने के लिए न्यायालय से बाहर “सहमति से समझौते” के तहत लाखों डॉलर मुआवजे के रूप में बाँटे हैं. दूसरी तरफ भारत एक सांस्कृतिक समाज है, जहाँ यौन स्वच्छंदता कतई आम बात नहीं है. यहाँ पर लड़कियाँ अक्सर पीछे रहती हैं, और जब मामला यौन शोषण अथवा बलात्कार का हो, तो उस लड़की पर समाज और परिवार का इतना जबरदस्त दबाव होता है कि वह खुलकर अपने अत्याचारी के खिलाफ सामने आ ही नहीं पाती. एक सर्वे के अनुसार बलात्कार एवं यौन शोषण के 92% मामले वहीं दबा दिए जाते हैं, जबकि बचे हुए 8% में भी सजा होने का प्रतिशत बहुत कम है, क्योंकि जागरूकता की कमी है. भारत के ऐसे माहौल में वेटिकन के उच्चाधिकारी एक बलात्कारी पादरी को भारत में नियुक्त कर रहे हैं. जी हाँ, चौंकिए नहीं... रेव्हरेंड जोसफ जेयापौल नामक पादरी की नियुक्ति जल्द ही भारत के किसी चर्च में की जाने वाली है. रेवरेंड जेयापौल 2011 तक अमेरिका के मिनेसोटा प्रांत में डायोसीज ऑफ क्रुक्सटन में पादरी था, जहाँ इसने मीगन पीटरसन नाम की चौदह वर्षीय लड़की के साथ लगातार एक वर्ष तक बलात्कार और यौन शोषण किया. कोर्ट में खुद पीटरसन के लिखित बयान के अनुसार, “मैं फादर जेयापौल से सबसे पहली बार 2004 में मिली, जब उनका ट्रांसफर कनाडा की सीमा पर स्थित मिनेसोटा प्रांत के एक गाँव ग्रीनबुश में ब्लेस्ड सेक्रामेन्टो चर्च में हुआ. मैं बचपन से ही बहुत ही धार्मिक लड़की थी, और रोज़ाना चर्च जाती थी. मेरा सपना था कि मैं नन बनूँ. पहली ही भेंट में फादर जेयापौल ने मुझे धार्मिक किताबें देने के बहाने अपने निजी कमरे में बुलाया. मैं छोटी थी, इसलिए उसकी नीयत नहीं भाँप सकी. लेकिन उसने मुझे बहला-फुसलाकर मुझे “पापी” होने का अहसास दिलाया और पापों से मुक्त करने के बदले उसने लगातार एक वर्ष तक उस चर्च में यौन शोषण किया. मुझे जान से मारने और पीटने की धमकी देकर उसने मुझे बहुत डरा दिया था, इसलिए मैं किसी के सामने मुँह खोलने से घबराती थी. लेकिन जब यह सिलसिला लगातार चलता रहा और मैं थोड़ी बड़ी हुई, तब मुझमे हिम्मत जागी और मैंने अपने परिवार वालों को इसके बारे में बताया”. जब पीटरसन के परिवार वालों ने वेटिकन में शिकायत की तो पहले अधिकारियों द्वारा लीपापोती की कोशिशें की गईं, लेकिन जब परिवार ने सीधे पोप फ्रांसिस से संपर्क किया तब जाकर काफी टालमटोल के बाद 2010 में रेवरेंड जोसफ जेयापौल को चर्च से निलंबित (सिर्फ निलंबित) किया गया. पीटरसन के परिजनों ने वेटिकन पर मुकदमा दायर कर दिया और 2011 में पादरी की सजा कम करने के समझौते के तहत कोर्ट के बाहर आपसी सहमति से सात लाख पचास हजार डॉलर का मुआवज़ा वसूल किया. सजा सुनते ही यह पादरी भारत भाग निकला, लेकिन 2012 में इंटरपोल ने इसे पकड़कर पुनः अमेरिकी पुलिस के हवाले कर दिया. दो वर्ष की जेल काटने के बाद रेवरेंड जोसफ रिहा हो गया और वेटिकन ने इसे पुनः चर्च की सेवाओं में शामिल कर लिया. ताज़ा खबर यह है कि फरवरी 2016 में जब इस बहादुर लड़की पीटरसन को यह पता चला कि फादर जोसफ जेयापौल को एक नए असाइनमेंट के तहत विशेष नियुक्ति देकर भारत के किसी चर्च में भेजा जा रहा है, तब इसे और इसके परिवार को तगड़ा झटका लगा. पीटरसन कहती हैं, कि “यह बेहद अपमानजनक निर्णय है, वेटिकन कैसे एक बलात्कारी को पुनः किसी चर्च में नियुक्त कर सकता है? भारत जाकर यह आदमी पता नहीं कितनी लड़कियों का जीवन खराब करेगा, जहाँ वे इसके खिलाफ खुलकर सामने भी नहीं आ सकेंगी” अब इसने पुनः वेटिकन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. फिलहाल पादरी जेयापौल 61 वर्ष का है, और पीटरसन द्वारा इस मामले में पुनः आवाज़ उठाने के कारण भारत भेजने का फैसला कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया है, लेकिन यह स्थिति कब तक रहेगी कहा नहीं जा सकता. हो सकता है निकट भविष्य में दिल्ली अथवा तमिलनाडु के किसी चर्च में रेवरेंड जोसफ जेयापौल को बिशप नियुक्त कर दिया जाए... बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत के “प्रगतिशील”(??) महिला संगठन वेटिकन के इस निर्णय के खिलाफ अपना मुँह खोलेंगे?? भारत के वामपंथी और सेकुलर बुद्धिजीवी, जेल काट चुके इस बाल यौन अपराधी को भारत में पादरी बनाने का विरोध करेंगे?? या फिर इनकी सारी बौद्धिक तोपें सिर्फ हिन्दू संतों के विरोध हेतु आरक्षित हैं??

Posted on: 2 May 2016 | 1:56 am

Farmer Village Budget 2016 : Congress Free India Step 2

ग्रामीण एवं कृषि आधारित बजट 2016 :- “काँग्रेस मुक्त भारत” का दूसरा चरण जब कोई पहलवान अखाड़े में लड़ने उतरता है, तो वह सामने वाले पहलवान की शक्ति को आँकने के लिए शुरू में थोड़ी देर तक हलके-फुल्के दाँव आजमाता है, और जब उसे पूरा अंदाजा हो जाता है कि कौन सा दाँव लगाने से प्रतिद्वंद्वी चित हो जाएगा, तभी वह उसे पटखनी देने के लिए अपना पूरा जोर लगाता है. 2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी ने “काँग्रेस मुक्त भारत” का नारा दिया था. काँग्रेस के कुकर्मों की वजह से इस नारे में ऐसा आकर्षण पैदा हुआ कि देश की जनता ने मोदी को 282 सीटों से नवाज़ा और केन्द्र में पहली बार भाजपा बिना किसी की मदद के सत्तारूढ़ हुई. इसके बाद अगले एक वर्ष में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उनमें “मोदी लहर का हैंगओवर” ही काम करता रहा और भाजपा हरियाणा, महाराष्ट्र भी जीती. इसके बाद प्रतिद्वंद्वी पहलवान ने मोदी को दिल्ली और बिहार जैसे जोरदार दाँव लगाकर लगभग पटक ही दिया था... लेकिन ये पहलवान भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेला हुआ है वह संभला और अब इस पहलवान ने शुरुआती कामकाज और विदेश यात्राओं द्वारा देश की छवि निर्माण करने के बाद “मूलभूत” मैदानी दाँव आजमाने का फैसला कर लिया है. 2009 के आम चुनाव सभी को याद हैं, मनमोहन सिंह की सरकार इतनी भी लोकप्रिय नहीं थी कि उसे बहुमत मिल जाए, परन्तु काँग्रेस ने 2008 में 65,000 करोड़ रुपए का “मनरेगा” नामक ऐसा जोरदार दाँव मारा कि आडवानी चित हो गए. उन्हें समझ ही नहीं आया कि ये क्या हो गया. वह तो भला हो कलमाडी-राजा-बंसल-खुर्शीद जैसों का, तथा देश के युवाओं में काँग्रेसी भ्रष्टाचार के प्रति बढ़ते तीव्र क्रोध और सोशल मीडिया का, जिनकी वजह से नरेंद्र मोदी को उभरने और स्थापित होने का मौका मिला. मोदी ने इस मौके को बखूबी भुनाया भी और सीधे प्रधानमंत्री पद तक जा पहुँचे. संभवतः नरेंद्र मोदी ने सोचा था कि 44 सीटों पर सिमटने के बाद काँग्रेस को अक्ल आ जाएगी... संभवतः भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने पर वामपंथी और अन्य जातिवादी दलों को भी विकास की महत्ता समझ में आ जाएगी, लेकिन देश के दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ. उधर मोदी आधारभूत संरचनाओं को तेजी से शुरू करने सहित विदेशों में देश की छवि निर्माण के काम में जुटे रहे, और इधर “नकारात्मक” विपक्ष अख़लाक़, रोहित वेमुला, कन्हैया, FTII, आईआईटी चेन्नै जैसे मामलों में न सिर्फ खुद उलझा रहा, बल्कि मीडिया की मदद से देश की जनता को भी भ्रमित करने में लगा रहा. इस बीच नरेंद्र मोदी दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव हार गए तो विरोधियों की तो मानो पौ-बारह हो गई. ऐसा अनुमान है कि इसी के बाद नरेंद्र मोदी ने काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष को उन्हीं के खेल में, उन्हीं के दाँव से चित करने का मूड बना लिया. केन्द्र में सरकार होने के अपने लाभ होते हैं, जिसमें सबसे बड़ा लाभ होता है “बजट बनाने और उसके आवंटन” का. जैसा कि विशेषज्ञ मानते हैं कि नरेंद्र मोदी का असली वोट बैंक है शहरी माध्यम वर्ग एवं गैर-मुस्लिम युवा, जबकि माना जाता है कि विपक्ष का वोट बैंक है किसान, मजदूर और अल्पसंख्यक. जब वर्ष 2016-17 का बजट तैयार किया जा रहा था, जनता, उद्योगपतियों, किसान नेताओं एवं मजदूर संगठनों से विचार एवं सुझाव आमंत्रित किए जा रहे थे, उस समय विपक्षियों ने सोचा था कि इस बजट के बहाने वे नरेंद्र मोदी पर “चिपकाए गए उनके आरोप” अर्थात सूट-बूट की सरकार को एक बार पुनः ठोस तरीके से जनता के सामने रख सकेंगे, लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया कि लगता है नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को उन्हीं के खेल में, उन्हीं के मैदान में और उन्हीं की चालों से मात देने का फैसला कर लिया है. इसीलिए जब अरुण जेटली ने लोकसभा में इस वर्ष का बजट पेश किया, उसके एक-एक बिंदु को जैसे-जैसे वे पढ़ते गए और समझाते गए वैसे-वैसे विपक्ष के हाथों से तोते उड़ने लगे. विपक्षी बेंच के सदस्यों के चेहरे देखने लायक हो रहे थे. विपक्ष ने सोचा भी नहीं था कि नरेंद्र मोदी उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकाने वाला किसान समर्थक बजट पेश कर देंगे. हालाँकि “विपक्षी कर्मकांड” की परम्परा निभाते हुए काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष ने केन्द्रीय बजट की आलोचना की, उसे हमेशा की तरह गरीब-किसान विरोधी बताने की कोशिश की, परन्तु जैसे-जैसे बजट के तमाम प्रावधान जनता के सामने आते गए वैसे-वैसे विपक्ष की आवाज़ दबती चली गई और वह पुनः अपने पुराने घिसेपिटे सेकुलरिज़्म, संघ की आलोचना, भारत माता की जय नहीं बोलेंगे जैसे बकवास मुद्दों पर लौट गया. भाजपा की सरकार ने अपने “पहले पूर्ण बजट” में जिस तरह से किसानों, माध्यम वर्गीय मतदाताओं तथा विशेषकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने एवं उसमें पैसा झोंकने के निर्णय लिए हैं, वह यदि अगले तीन वर्ष में धरातल पर उतर आएँ तो यह तय जानिये कि किसानों, ग्रामीणों और छोटे उद्यमियों की जेब में पैसा जाएगा. नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली की जोड़ी ने विपक्ष के पैरों के नीचे से दरी खींच ली है और अब बजट प्रस्तावों पर विरोध करने के लिए उनके पास कुछ बचा ही नहीं है. आईये पहले हम देखते हैं कि ग्रामीण विकास और कृषि को फोकस में लेकर इस “वास्तविक क्रान्तिकारी” बजट में मोदी सरकार ने ऐसा क्या कर दिया है, कि काँग्रेस और बाकी विपक्ष बजट के मुद्दों, अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना एवं पानी-बिजली पर बात ही नहीं कर रहे और देश की जनता को फालतू के “अ”-मुद्दों पर भटकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं. बजट को लेकर विपक्ष का सबसे पहला आरोप था कि यह बजट 2019 के आम चुनावों को ध्यान में रखकर बनाया गया “लॉलीपॉप” बजट है, इस बोदे आरोप से ही हमें समझ जाना चाहिए कि अपने बजट से नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को किस तरह डरा दिया है. जब नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का उनका लक्ष्य है तो शुरू में हमेशा की तरह विपक्षियों एवं कथित बुद्धिजीवियों ने उनके इस बयान की खिल्ली उड़ाई. लेकिन अब जब हम बजट के प्रावधानों को देखते हैं तो साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि अगले तीन वर्ष में जिस तरह मोदी सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि में पैसा और संसाधन झोंकने जा रही है, उससे किसान की आय दोगुनी करने का लक्ष्य असाध्य नहीं है. हम सभी जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है कृषि क्षेत्र एवं ग्रामीण विकास. पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस की सरकारों ने पैसा ऊपर से नीचे की तरफ बहाया है और इस बहाव में अपने कैडर का “पूरा ख़याल” रखा है. दिल्ली से बहकर आने वाली पैसों की गंगा में निचले स्तर तक के लोगों ने जमकर हाथ धोए हैं, क्योंकि काँग्रेस की नीति है “बाँटो और राज करो”. काँग्रेस का यह “बाँटो” अभियान दोनों क्षेत्रों के लिए था अर्थात पहला समाज को धर्म एवं जाति के आधार पर “बाँटो”, तथा दूसरा जमकर पैसा “बाँटो” कि जनता को मुफ्तखोरी की आदत लग जाए. मोदी सरकार के आने के बाद इस पर अंकुश लगना शुरू हुआ है. मोदी सरकार ने बजट में सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि जब केन्द्र से पैसा बाँटा जाए तो उसका उसी कार्य में सदुपयोग हो, जिसके लिए यह आवंटित किया गया है. दिल्ली से आने वाले पैसे पर कड़ी निगरानी हो तथा तकनीक एवं सोशल मीडिया की मदद से भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जाए क्योंकि जब ग्रामीण विकास और कृषि, यह दोनों प्रमुख क्षेत्र तीव्र विकास करेंगे, तो अपने-आप पैसा नीचे से ऊपर की तरफ भी आना शुरू हो जाएगा. यही देश को मजबूत बनाएगा. यानी काँग्रेस और विपक्ष के इस परम्परागत वोट बैंक को खुश करके एवं गाँवों में खुशहाली लाकर मोदी ने उनकी नींद उड़ाने का पूरा बंदोबस्त कर दिया है. ऐसे में यदि विपक्ष इन बजट प्रस्तावों की आलोचना करेगा अथवा उसमें मीनमेख निकालेगा तो ग्रामीणों और किसानों में उसका विपरीत सन्देश जाएगा. इसीलिए इस बार विपक्ष उलझ गया है और बजट छोड़कर बाकी के बेकार मुद्दों पर राजनीति में लग गया है. जब भी हम किसी किसान की आत्महत्या की खबर सुनते हैं तो मन विषाद से भर उठता है. जो अन्नदाता हमें अन्न प्रदान करता है, यदि वह पैसों की कमी अथवा संसाधनों की अल्पता के कारण फसल उगाने में असफल रहता है और कर्ज़दार बनकर आत्महत्या की तरफ उन्मुख होता है तो ज़ाहिर है कि इसका मतलब ये है कि देश की अर्थव्यवस्था के एक मजबूत स्तंभ में कीड़ा लग गया है, जिसे तत्काल प्रभाव से सही करने की आवश्यकता है. अब मूल सवाल उठता है कि किसान की स्थिति सुधारने के लिए क्या-क्या किया जाए? काँग्रेस शासित महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में सर्वाधिक किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं, इससे कम से कम यह बात तो साफ़ हो जाती है कि काँग्रेस का जो विकास मॉडल है अथवा नीतियाँ हैं वे असफल सिद्ध हुई हैं. अर्थात काँग्रेस के शासनकाल ने किसानों को कृषि के लिए प्रोत्साहित करने, आधारभूत संरचनाओं जैसे सड़कों-नहरों का जाल बिछाने, बिजली की व्यवस्था सुधारने जैसे काम करने की बजाय उन्हें मजदूर बनाने में रूचि दिखाई और “मनरेगा” जैसी योजनाएँ चलाईं. मनरेगा में जितना पैसा 2009 से 2014 तक दिया गया, उतने में तो देश के गाँव-गाँव में तालाब और बिजली पहुँच सकती थी. अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इन्हीं मूलभूत कार्यों पर ध्यान देना आरम्भ कर दिया है, ताकि किसान समृद्ध हो सके. सरकार ने एक स्पष्ट रोडमैप बनाकर बताया है कि पानी, बिजली, सड़क की समस्या कैसे दूर होगी, बाकायदा तारीख दी गई है कि इस समस्या का हल इस तारीख तक हो जाएगा. इस बजट में पानी की गंभीर समस्या को समझकर जमीन में पानी का स्तर बढ़ाने के लिए 60,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. अभी तक किसी भी पूर्ववर्ती बजट में किसी भी सरकार ने जमीन में पानी का स्तर बढ़ाने के लिए इतनी बड़ी रकम आवंटित नहीं की है. जमीन में पानी का स्तर उठाने के साथ ही सरकार ने सिंचाई पर भी ध्यान दिया है. इस बजट में अट्ठाइस लाख पचास हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई को “प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना” के अंतर्गत सिंचित करने का लक्ष्य रखा गया है. एक अध्ययन के अनुसार भारत में कुल कृषि भूमि पर यदि सभी तरह के सिंचाई साधन जोड़ लें, तब भी देश के करीब दो-तिहाई खेत पानी का साधन न मिलने के कारण सिर्फ बारिश के भरोसे होते हैं. मोदी सरकार ने इस बजट में जमीन में पानी का लेवल उठाने तथा खेतों की सिंचाई पक्की करने का प्रावधान किया है. जेटली के अनुसार “नाबार्ड” बीस हजार करोड़ रुपये का सिंचाई फंड तैयार करेगा. किसान का नुक्सान कई बार खेत की मृत हो चुकी मिट्टी अथवा खराब बीजों के कारण भी होता है, इसके लिए इस बजट में “मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना” अधिक गंभीरता से लागू करने का संकल्प लिया गया है. इसके तहत मार्च 2017 तक चौदह करोड़ खेतों में मिट्टी एवं बीजों का परीक्षण करने का लक्ष्य रखा गया है. स्वाभाविक है कि जब मिट्टी उपजाऊ और बीज स्वस्थ होगा तो फसल अधिक होगी. साथ ही किसान का फायदा बढ़े और उसे ज्यादा उपज मिले, इस हेतु सरकार ऑर्गेनिक खेती को भी बढ़ावा दे रही है. अगले तीन वर्ष में पांच लाख एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती का लक्ष्य रखा गया है, जो एक सराहनीय कदम कहा जाएगा. मैंने पिछले एक लेख में देश की बिजली समस्या हल करने के प्रति यह सरकार कितनी गंभीर है इस पर चर्चा की थी, और यह बताया था कि ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल मोदी जी द्वारा दिए गए लक्ष्य से भी आगे चल रहे हैं. चूँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी गांवों तक एक हजार दिनों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था. इसलिए इस बजट में 1 मई 2018 का लक्ष्य घोषित किया गया है, जिसके बाद देश में ऐसा कोई गांव नहीं होगा, जहां बिजली नहीं हो. अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसके लिए ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल की तारीफ़ की. बिजली समस्या को लेकर यह सरकार जिस तरह से गंभीर दिखाई दे रही है, वह काँग्रेस के ग्रामीण वोट बैंक पर भीषण सेंधमारी साबित होने जा रही है. मोदी सरकार ने पानी और बिजली के साथ सड़क पर भी विशेष ध्यान देने का फैसला किया है. भाजपा की पिछली सरकार में वाजपेयी जी ने जो “स्वर्णिम चतुर्भुज” की योजना शुरू की थी और उस पर काफी काम भी किया था वैसे ही इस सरकार में भी नितिन गड़करी जैसे अनुभवी नेता हैं, जिन्होंने पिछले दो साल में लगातार तीस किलोमीटर प्रतिदिन राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का लक्ष्य हासिल कर लिया है, जो कि काँग्रेस सरकार में बड़ी मुश्किल से अधिकतम बारह किमी प्रतिदिन तक पहुँच पाया था. जैसा कि लेख में मैंने ऊपर लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं कि अगर किसान अपने गाँव से जिला, और राज्य मुख्यालय तक अपनी उपज लेकर नहीं आ पाया, तो सन २०२२ में किसान की आमदनी दोगुनी करने का वादा पूरा नहीं हो पाएगा. इसीलिए इस बजट में विशेष रूप से ग्रामीण सड़कों के लिए उन्नीस हजार करोड़ रूपए रखे गए हैं. इनके अलावा दो हजार किलोमीटर के “स्टेट-हाईवे” को राष्ट्रीय राजमार्ग में बदलने का प्रस्ताव भी इस बजट में किया गया है. अन्य सड़कों के लिए 97000 करोड़ रुपये का प्रावधान इस बजट में है. अर्थात यदि रेलवे-सड़क दोनों को जोड़ें, तो इस बजट में करीब सवा दो लाख करोड़ रुपये का सिर्फ इसी काम के लिए रखे गए हैं, जो कि ऐतिहासिक है. स्वाभाविक है कि काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष की बोलती बन्द होना ही है. नितिन गडकरी ने सभी सड़क परियोजनाओं को तेजी से लागू करने की अपनी छवि को और दुरुस्त किया है. पानी, बिजली और सड़क तीनों की सबसे ज्यादा मुश्किल देश के गांवों में ही है. अतः पहली बार किसी सरकार ने इन मुश्किलों की जड़ में जाकर समस्या को समझा है और उसी के अनुरूप बजट में योजनाएँ बनाई हैं. ज़ाहिर है कि यदि मानसून सामान्य रहा तो अगले तीन वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भारी उछाल आना ही है, और जब किसान और ग्रामीण की जेब में पैसा होगा, तो अंततः वह पैसा नीचे से ऊपर की ओर ही बहेगा तथा स्वाभाविक रूप से वोट में भी तब्दील होगा. इस बजट की एक और खास बात यह है कि मोदी सरकार ने गाँवों एवं नगरों की स्थानीय सरकारों को मजबूत करने का फैसला किया है. जेटली ने शहरी और ग्रामीण विकास के लिए इन संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान में 228% की बम्पर बढ़ोतरी कर दी है. चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार यह राशि 2.87 लाख करोड़ रूपए होगी, जो अभी तक किसी सरकार ने कभी भी नहीं दी है. जबकि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए 19,000 करोड़ रूपए अलग से रखे हैं. “मनरेगा” काँग्रेस का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है, इस योजना के जरिए ही काँग्रेस ने 2009 का आम चुनाव जीता था, लेकिन 2009-2014 के बीच यूपीए-२ के शासनकाल के दौरान इस योजना में इतना जमकर भ्रष्टाचार हुआ कि ग्रामीण मजदूर त्राहिमाम करने लगे. काँग्रेस के स्थानीय नेताओं और पंचों-सरपंचों ने इस योजना पर ऐसा कब्ज़ा जमाया कि कि निचले स्तर तक के सभी कार्यकर्ता मालामाल हो गए, जबकि वास्तविक गरीब मजदूरों को कोई फायदा नहीं पहुँचा और उन्हें रोजगार के लिए अपने गाँव से पलायन करना ही पड़ता था. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में “मनरेगा” को एक असफल स्मारक घोषित किया. मोदी जी के अनुसार, यदि वास्तव में मनरेगा योजना ईमानदारी से चलाई जाती, इसके तहत “उत्पादक” कार्यों को प्राथमिकता दी जाती और भ्रष्टाचार पर लगाम कस दी जाती तो ग्रामीण मजदूरों के लिए यह एक सुनहरी योजना होती. परन्तु काँग्रेस के शासनकाल में ऐसा होना संभव ही नहीं था, क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार मनरेगा में अधिकाँश स्थानों पर बोगस रजिस्टर बनाए गए, कहीं-कहीं सिर्फ गढ्ढे खुदवाकर उसे तालाब दर्शा दिया गया, तो कहीं-कहीं मजदूरों को पूरे सौ दिन का रोजगार तक नहीं मिला और बजट में आया हुआ पैसा ताबड़तोड़ कागज़ों पर ही खत्म कर दिया गया. अब मोदी सरकार ने इस योजना को कसने और इसके भ्रष्टाचार पर नकेल डालने का फैसला कर लिया है. इस बार के बजट में मनरेगा के लिए 38500 करोड़ रूपए दिए गए हैं, जो अब तक के सर्वाधिक हैं. लेकिन साथ ही मोदी-जेटली की जोड़ी ने मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी तथा बजट आवंटन को “जन-धन योजना” तथा “आधार कार्ड” एवं किए जाने वाले कार्यों की गुणवत्ता से जोड़ दिया है, ताकि पैसा नगद नहीं देकर सीधे मजदूरों के खाते में ही जाए, साथ ही गाँवों में इस मनरेगा के कारण कोई अच्छा निर्माण कार्य, तालाब, नहर, कुँवा जैसा स्थायी बुनियादी ढाँचा तैयार हो. स्वाभाविक है कि काँग्रेस नेताओं को इस कदम से बहुत तिलमिलाहट हुई है. हाल ही में सरकार ने लोकसभा में “राष्ट्रीय जलमार्ग विधेयक” भी पास करवा लिया है, जिसके तहत देश के सड़क और रेलमार्गों के अतिरिक्त अब नदी एवं समुद्री जलमार्गों को भी “राष्ट्रीय जलमार्ग” घोषित किया जाएगा तथा जहाज़ों के लिए नए “ग्रीनफील्ड” बंदरगाह बनाए जाएँगे. एक शोध के अनुसार देश में कम से कम 19 जलमार्ग ऐसे हैं जिन पर परिवहन किया जा सकता है, जो सड़क और रेलमार्ग दोनों के मुकाबले बेहद सस्ता सिद्ध होगा. इसके अलावा देश के कई छोटे शहरों में प्रयोग में नहीं आने वाली अथवा बहुत कम प्रयोग की जाने वाली हवाई पट्टियों के नवीनीकरण एवं उनका समुचित उपयोग आरम्भ करने के लिए प्रत्येक राज्य सरकार को 100 करोड़ रूपए उपलब्ध करवाए हैं, ताकि इन हवाई पट्टियों को भी काम में लिया जा सके. इन दोनों मार्गों के आरम्भ होने से रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों एवं नदी किनारे बसे नगरों में व्यावसायिक गतिविधियाँ तेज़ होंगी. इनके अलावा यूपीए-२ सरकार के दौरान धन की कमी एवं लेटलतीफी के कारण बन्द बड़े 138 बड़े प्रोजेक्ट्स को पुनः चालू करने का भी निर्देश दिया गया है. देश में काले धन और भ्रष्टाचार की समस्या आज से नहीं, बल्कि पिछले पचास साल से है. काँग्रेस की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाए. काला धन उत्पन्न होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा देश है, जहाँ सर्वाधिक नगद लेन-देन होता है. एक अध्ययन के अनुसार जितना अधिक नगद लेन-देन होगा, भ्रष्टाचार, कर चोरी तथा काले धन की समस्या उतनी अधिक बढ़ेगी. इसीलिए मोदी सरकार ने एक लाख से अधिक की किसी भी खरीदी के लिए PAN कार्ड अनिवार्य कर दिया है. इस प्रकार किसी भी बड़े लेन-देन पर सरकार के पास समुचित सूचना रहेगी. सरकार की योजना यह है कि नगद व्यवहार कम से कम हों तथा क्रेडिट कार्ड से लेन-देन अधिकाधिक हो ताकि काले धन पर थोड़ा सा अंकुश लगे. बड़े-बड़े उद्योगों एवं कंपनियों पर 15% की दर से डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स लगा दिया है, और इस धन का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के नाम पर लिए जाने वाले गैस कनेक्शन हेतु 2000 करोड़ रूपए की सब्सिडी में किया जाएगा. लंबे समय से बैंकों की यह माँग थी कि उनके पक्ष में एक मजबूत क़ानून बनाया जाए, ताकि ऋण लेकर नहीं चुकाने वाले लेनदारों द्वारा सख्ती से वसूली की जा सके. इस संसद सत्र में सरकार ने बैंकों को मजबूत करने के लिए एक क़ानून बना दिया है, और सभी सरकारी एवं निजी बैंक उनकी सुविधा एवं संसाधन के मुताबिक़ जानबूझकर ऋण नहीं चुकाने वालों के खिलाफ कई प्रकार की कानूनी कार्रवाई एवं कुर्की इत्यादि कर सकेंगी. बजट के बोझिल आँकड़ों में अधिक गहराई से न जाते हुए भी उपरोक्त बातों के आधार पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने काँग्रेस के परंपरागत वोट बैंक अर्थात किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सेंध लगाने की पूरी तैयारी कर ली है. काँग्रेस ने पिछले साठ वर्षों में किसानों और मजदूरों को विभिन्न प्रकार के लालच और झूठे आश्वासन देकर उन्हें अपने पाले में उलझाए रखा, परन्तु नरेंद्र मोदी की रणनीति दूरगामी है. नरेंद्र मोदी अगले तीन वर्ष में ग्रामीण क्षेत्रों हेतु सड़क-पानी और बिजली का ऐसा जाल बिछाने जा रहे हैं जिसके कारण किसान की आमदनी में अच्छा-ख़ासा इज़ाफ़ा होगा. काँग्रेस ने ऋण माफी दे-देकर किसानों को अपने पक्ष में किया था, लेकिन नरेंद्र मोदी “सकारात्मक” राजनीति करते हुए किसानों को ही इतना मजबूत बना देना चाहते हैं कि उन्हें ऋण लेने की जरूरत ही ना रहे, और यदि लेना भी पड़े तो वे साहूकारों की बजाय किसान क्रेडिट कार्ड से, अथवा “मुद्रा बैंक” से अथवा माईक्रो क्रेडिट बैंकों से ऋण लें और चुकाएँ. यह नीति थोड़ा समय जरूर लेगी, परन्तु इससे किसान आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनेगा, उसे किसी के आगे हाथ पसारने की जरूरत नहीं रहेगी, जबकि काँग्रेस यह चाहती थी कि किसान सदैव याचक बना रहे अथवा खेती छोड़कर मनरेगा में मजदूरी करने लगे. यदि जमीन की मिट्टी अच्छी हो जाए, बीज स्वस्थ मिलें, सिंचाई के लिए पानी और बिजली की व्यवस्था उत्तम हो जाए तथा फसलों को सही समय पर मंडी पहुँचाने के लिए अच्छी सड़कें मिल जाएँ तो किसान को और क्या चाहिए. भारत का किसान तो वैसे ही काफी जीवट वाला होता है, वह अत्यधिक विषम परिस्थिति से भी हार नहीं मानता. और अंत में, इतना सब कुछ करने के बावजूद, यदि फिर भी ईश्वर एवं प्रकृति नाराज़ हो जाएँ, तो मास्टर स्ट्रोक के रूप में NDA की सरकार ने “फसल बीमा योजना” भी लागू कर दी है, जिसके तहत खेत के आकार, उपज के प्रकार के आधार पर किसान को बीमे की प्रीमियम चुकानी होगी, लेकिन कम से कम उसकी मूल पूँजी सुरक्षित रहेगी. अर्थात ग्रामीण अर्थव्यवस्था का “शेर” अभी गरज भले ही न रहा हो, लेकिन उसने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया है. अधिक लंबा न खींचते हुए संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि पहले दो साल मोदी ने विदेश संबंधों, रक्षा उपकरणों, राजमार्गों एवं बिजली पर गंभीरता से काम किया... अब संभवतः अगले दो वर्ष नरेंद्र मोदी ग्रामीण विकास, कृषि अर्थव्यवस्था, किसान एवं ग्रामीण मजदूर के लिए जोरदार काम करेंगे, ताकि ये लोग आर्थिक रूप से थोड़े बहुत सुदृढ़ हो सकें. उसके बाद अंतिम वर्ष (अर्थात लोकसभा चुनावी वर्ष 2019) में नरेंद्र मोदी अपनी जेब से कौन सा जादू निकालेंगे यह अनुमान अभी से लगाना मुश्किल है... परन्तु इतना तो तय है कि जिस तरह 2016 के इस बजट में मोदी ने शहर छोड़कर गाँवों की तरफ रुख किया है, उसने काँग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है. इसके अलावा बाबा साहेब आंबेडकर से सम्बन्धित कार्यक्रमों में जिस तरह नरेंद्र मोदी अपनी उपस्थिति बढ़ा रहे हैं, आरक्षण के प्रति अपनी जोरदार प्रतिबद्धता दर्शा रहे हैं, उसके कारण अन्य छोटे दलों में भी बेचैनी है. स्वाभाविक है कि इस बजट में आलोचना के अधिक बिंदु नहीं मिलने के कारण ही विपक्ष द्वारा रोहित वेमुला और कन्हैया जैसे “पानी के बुलबुले” पैदा किए जा रहे हैं. लेकिन भाजपा के लिए असली चुनौती विपक्ष की तरफ से नहीं, बल्कि खुद भाजपा के “आलसी” सांसदों की तरफ से है. सरकार के विकास कार्यों, रक्षा संबंधी तैयारियों, सड़कों एवं बिजली के शानदार कार्यों को भाजपा के सांसद और राज्य सरकारें नीचे मतदाता तक ठीक से पहुँचा नहीं पा रहीं. उत्तरप्रदेश से भाजपा को सर्वाधिक सांसद मिले, लेकिन अधिकाँश सांसद नरेंद्र मोदी के नाम और जादू की आस में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, ना जमीन पर कोई संघर्ष दिखाई देता है और ना ही सक्रियता. नरेंद्र मोदी अकेले कहाँ-कहाँ तक, और क्या-क्या करेंगे? भाजपाई सांसदों के पक्ष में कम से कम ये अच्छी बात है कि काँग्रेस की तरफ से राहुल गाँधी मोर्चा संभाले हुए हैं, इसलिए मुकाबला आसान है, परन्तु राज्यों में यह स्थिति नहीं है, इसीलिए भाजपा को आगामी वर्ष के तमाम विधानसभा चुनावों जैसे असम, बंगाल, उत्तरप्रदेश, केरल, तमिलनाडु में अच्छा-ख़ासा संघर्ष करना पड़ेगा. विश्लेषकों के अनुसार असम छोड़कर बाकी चारों राज्यों में भाजपा पहले से ही मुकाबले में कहीं नहीं है, इसलिए वहाँ की हार-जीत से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन वास्तविकता तो यही है कि विपक्ष को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि मोदी का जादू खत्म हो गया है... और इसीलिए नरेंद्र मोदी ने समय से पहले ही किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का पाँसा फेंक दिया है, ताकि जब 2019 के लोकसभा चुनावों का समय आए, तब तक किसान-मजदूर की जेब में कुछ पैसा आ जाए और वोट देते समय वह काँग्रेस के बहकावे में ना आए... और हाँ!!! यदि नेशनल हेरल्ड और इशरत जहाँ जैसे मामलों को छोड़ भी दें, तब भी 2019 तक मध्यम वर्ग को लुभाने के लिए कोई न कोई “नया पैंतरा” आ ही जाएगा... काँग्रेस मुक्त भारत का दूसरा चरण आरम्भ हो चुका है... और पिछले पचास वर्ष के लोकतांत्रिक इतिहास को देखते हुए यह बात हम बिहार-उत्तरप्रदेश-तमिलनाडु-बंगाल-गुजरात-मध्यप्रदेश जैसे कई राज्यों में देख चुके हैं कि यदि काँग्रेस लगातार दस-पन्द्रह वर्ष तक सत्ता से बाहर रहे, तो वह पूरी तरह खत्म हो जाती है. आशा है कि काँग्रेस के खाँटी और घाघ नेता, राहुल बाबा के साथ जुड़े अपने भविष्य पर पुनः चिंतन-मनन करेंगे और मुँह खोलने की हिम्मत करेंगे... वर्ना खेती-सड़क और बिजली के जरिये नरेंद्र मोदी काँग्रेस के लंबे “बुरे दिनों” का इंतजाम करने के मूड में दिखाई दे रहे हैं. 

Posted on: 30 March 2016 | 2:38 am

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ऑनलाइन खरीदी हेतु ग्राहक की समझ और विकल्प बढ़ाने वाली स्टार्ट-अप...आधुनिक युग “ऑनलाइन” का युग है. प्रत्येक बच्चे-किशोर-युवा के हाथों में मोबाईल हैं, जिनके जरिये आज की नई पीढ़ी अपने बहुत से आवश्यक कार्य तेजी से निपटाती है. स्वाभाविक है कि आजकल समय की कमी के कारण, तथा ऑनलाइन खरीदी में ढेरों विकल्प मौजूद होने के कारण युवा पीढ़ी तेजी से इसी पद्धति की तरफ जा रही है. एक अनुमान के अनुसार सन 2020 तक भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का बाज़ार लगभग सौ बिलियन डॉलर का हो जाएगा. ऑनलाइन शॉपिंग के क्षेत्र में कई स्थापित एवं जानी-मानी कम्पनियाँ बड़ी खिलाड़ी हैं, जिनकी वेबसाईटों से रोज़ाना लाखों भारतीय क्रय-विक्रय कर रहे हैं. चूँकि इस प्रतिद्वंद्वी बाज़ार में कई कम्पनियाँ हैं, इसलिए ग्राहक के सामने कई बार अच्छे, टिकाऊ एवं उचित दामों वाले उत्पाद की पहचान करके उन्हें छाँटना, ग्राहक की जेब, समय एवं पहुँच के अनुकूल उत्पाद को चुनना एक बेहद थकाऊ काम है. यदि हम मोबाईल का ही उदाहरण देखें, तो जब भी हमें कोई नया मोबाईल ऑनलाइन खरीदना हो, तो सबसे पहले हम Amazon, Flipkart, SnapDeal, PayTM जैसी कई वेबसाईटों को खंगालना शुरू करते हैं. अपनी पसंद का, मॉडल का, कम्पनी का, अपनी क्रय रेंज का, अपने दोस्तों से बेहतर चुनकर दिखाने का एक बेहद दुरूह कार्य आरम्भ होता है. विभिन्न वेबसाईटों के चक्कर लगाते-लगाते, उनके रेट्स एवं फीचर्स की तुलना करते-करते ग्राहक का दिमाग बुरी तरह पक जाता है, और इतना करने पर भी कोई जरूरी नहीं है कि “उपलब्ध उत्पादों में सबसे बेहतर” की तलाश पूरी हो ही जाए. ऐसा अनुभव सिर्फ मोबाईल ही नहीं, कपड़े, जूते, अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तु अथवा सेवा के बारे में भी होता है, जब ग्राहक “सही उत्पाद” की तलाश करते-करते साईट-दर-साईट भटकते हुए बुरी तरह त्रस्त हो जाता है. इस समस्या का एक नवोन्मेषी एवं शानदार आईडिया लेकर आई है www.ReadyViews.com नाम की स्टार्ट-अप.. इस कम्पनी की वेबसाईट आपको “सबसे बेहतर” चुनने में मदद करती है, और इस चुनाव की प्रक्रिया गणितीय होते हुए भी ग्राहक के लिए बेहद सरल और सटीक रखी गई है, ताकि ग्राहक को वही मिले जो सबसे उत्तम हो. आईये संक्षेप में देखते हैं कि आखिर इस का नवोन्मेषी विचार क्या है और यह कैसे काम करती है. सामान्यतः हम भारतीय लोग “माउथ पब्लिसिटी” पर अधिक भरोसा करते हैं, अर्थात किसी उत्पाद या वस्तु अथवा सेवाप्रदाता के बारे में “लोग क्या कहते हैं”, इस बात को हम ध्यान से देखते-सुनते-पढ़ते हैं. यदि हमारा कोई मित्र हमें कहता है कि फलाँ मोबाईल बहुत शानदार है, अथवा हमारा कोई परिचित कहता है कि उस सेवाप्रदाता की सेवाएँ बहुत ही बेहतरीन हैं तो हम सरलता से मान जाते हैं और उस मोबाईल अथवा उत्पाद की तरफ आकर्षित हो जाते हैं, तथा उसके बारे में हमारी सकारात्मक राय पहले ही बन जाती है. तो हम लोग जब भी कोई वस्तु खरीदने निकलते हैं अथवा किसी सेवा का लाभ लेने के बारे में सोचते हैं तो सबसे पहले हम यह देखना चाहते हैं कि “लोग उसके बारे में क्या कह रहे हैं?” क्या मेरे दोस्त को फलाँ कम्पनी की वॉशिंग मशीन अच्छी लगी?? क्या मेरे रिश्तेदार के यहाँ फलाँ कम्पनी का फ्रिज इतने वर्षों बाद भी ठीक चल रहा है?? इस प्रकार किसी भी उत्पाद को खरीदने के सम्बन्ध में हमारी प्राथमिक समझ तथा लगभग 70% दृढ़ विचार इसी पद्धति से बनता है. इसलिए जब भी हम किसी वेबसाइट से ऑनलाइन खरीदी करने निकलते हैं तो वहाँ पर हम उस “प्रोडक्ट” को लेकर हमसे पहले के खरीदारों की प्रतिक्रियाएँ एवं विचार पढ़ते हैं. मोबाईल खरीदने से पहले हम इन सभी वेबसाईटों पर आने वाली ढेरों प्रतिक्रियाओं एवं तमाम विरोधी विचारों को एक साथ पढ़कर अपना मन बनाने की कोशिश करते हैं. परन्तु जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि चूँकि कई-कई वेबसाईट हैं, कई प्रकार के उत्पाद हैं, विभिन्न उत्पादों के बीच ढेर सारे मानकों की तुलना करना एक बेहद थकाऊ और कठिन काम है. Readyviews.com यहीं आकर आपकी सहायता करती है. यह वेबसाईट आपके द्वारा इच्छित प्रोडक्ट के बारे में ढेरों वेबसाईटों पर उपलब्ध उपभोक्ता प्रतिक्रियाओं एवं विचारों को एकत्रित करके उस विशाल डाटाबेस का विवेचन करते हुए औसत निकालकर आपको बताती है कि आप जिस प्रोडक्ट के बारे में जानना-समझना और पसंद करना चाहते हैं, उस प्रोडक्ट के बारे में उन तमाम वेबसाईटों पर कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक लिखा अथवा कहा गया है... यह वेबसाईट आपको विश्लेषण करके बताती है कि आप जो खरीदना चाहते हैं, अथवा जो सेवा चाहते हैं, उपभोक्ता उस सेवा के बारे में क्या-क्या अच्छा-बुरा कहते हैं. आजकल लगभग सभी वेबसाईट्स पर “रेटिंग” की सुविधा भी दी जाती है, अधिकाँश ग्राहक कमेन्ट करने से बचते हैं तो वे चुपके से उस प्रोडक्ट के बारे में अपने अनुभवों के अनुसार एक स्टार, तीन स्टार या पाँच स्टार की रेटिंग दे देते हैं. Readyviews.com इन रेटिंग का भी विश्लेषण करती है, ताकि आपको एकदम सटीक जानकारी मिले और किसी उत्पाद को खरीदने से पहले उसके बारे में आप पूरा जान लें और ठगे न जाएँ. इस वेबसाईट की कार्यपद्धति ऊपर दिए गए चित्र से स्पष्ट हो जाती है, जिसमें उदाहरण के रूप में हमने मोबाईल खरीदी संबंधी जानकारी चाही है.. – अब जैसा कि आप देख रहे हैं, पहले तो यह वेबसाइट विभिन्न शॉपिंग वेबसाइटों से “आधिकारिक” उपभोक्ताओं द्वारा दिए गए विचारों, प्रतिक्रियाओं को एकत्रित करती है. फिर उसके बाद उस प्रोडक्ट (अर्थात मोबाईल) के विभिन्न गुणधर्म (फीचर्स) के आधार पर उसके तीन भाग करती है , अर्थात मोबाईल की आवाज़, उसकी बैटरी एवं उसका कैमरा. फिर इन तीनों वर्गीकरणों को एक बार पुनः विश्लेषित किया जाता है और आपके सामने पेश किया जाता है, कि जिस उत्पाद के बारे में आपने जानना चाहा था, उसके बारे में लोगों की राय क्या-क्या हैं? तमाम वेबसाइटों पर संतुष्ट (या असंतुष्ट) ग्राहक उस मोबाईल की बैटरी, कैमरे एवं साउंड के बारे में कितने प्रतिशत की और कैसी राय रखते हैं. यह वेबसाईट उस प्रोडक्ट के विभिन्न फीचर्स के बारे में दूसरे संतुष्ट अथवा असंतुष्ट उपभोक्ताओं की “अच्छी", “बुरी" अथवा “तटस्थ" राय स्पष्ट रूप से बताती है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप ढेरों वेबसाईटों के चक्कर लगाने से बच जाते हैं, आपके समय की बचत भी होती है और सबसे बड़ी बात यह कि आप उस प्रोडक्ट को जानने के लिए अपना अत्यधिक दिमाग खपाने से भी बच जाते हैं, और तत्काल इस निर्णय पर पहुँच जाते हैं कि आपको यह उत्पाद खरीदना है या नहीं. शुरुआत में फिलहाल यह वेबसाईट सिर्फ डिजिटल उत्पादों, जैसे मोबाईल, पेन ड्राईव, पावर बैंक, टीवी, कंप्यूटर, लैपटॉप के बारे में अपनी सेवाएँ दे रही है, परन्तु जल्दी ही इसमें कई अन्य प्रोडक्ट्स एवं सेवाएँ जोड़ी जाएँगी. एक ही स्थान पर उपभोक्ताओं को शिक्षित एवं जानकारियों से लैस करने संबंधी अभी तक ऐसा विचार किसी भी कम्पनी के दिमाग में नहीं आया था. लेकिन भीलवाड़ा (राजस्थान) के युवा उद्यमी श्याम राठौर ने अपनी प्रतिभाशाली टीम के साथ शुरू की गई “स्टार्ट-अप” सॉफ्टवेयर कम्पनी www.ReadyViews.com में इस नवोन्मेषी आईडिया पर काम किया और उन्हें सफलता भी मिलने लगी है. 27 सितम्बर 2015 को अमेरिका में सम्पन्न Indo-US StartupConnect कार्यक्रम में भी “नैसकॉम” ने श्याम राठौर जी के इस नवोन्मेषी आईडिया को सराहा तथा मोदी जी ने अपने डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम के तहत इनके स्टार्ट-अप को शुभकामनाएँ प्रदान कीं. अतः कोई भी प्रोडक्ट खरीदने से पहले यदि आप अपना समय, ऊर्जा एवं माथापच्ची बचाना चाहते हैं तो सीधे इस वेबसाइट पर पहुँचिये, जहाँ बड़े आराम से एक क्लिक पर आपको उस उत्पाद से सम्बन्धित तमाम जानकारियाँ बाकायदा छन-छनकर ठोस एवं विश्वसनीय स्वरूप तथा बाकायदा ग्राफिक्स में प्राप्त होंगी.

Posted on: 19 March 2016 | 1:08 am

Difference between "Shahid" and "Hutatma"

शहीद और हुतात्मा शब्द का अंतरजिस समय डेविड हेडली अमेरिका में पूछताछ के दौरान आतंकी इशरत जहाँ के नए-नए खुलासे कर रहा था, और यह साफ़ होता गया कि वह लड़की मासूम कतई नहीं थी, बल्कि चार मुस्टंडे आतंकियों के साथ अकेली अहमदाबाद एक आतंकी मिशन पर आई थी, उस समय मुम्बई के कुछ इलाकों में “शहीद” इशरत जहाँ के नाम से चलाई जा रही एम्बुलेंस पर जनता का माथा ठनका था. इसके बाद जब JNU जैसे विश्वविद्यालयों में “शहीद” अफज़ल गूरू के नारे लगाए गए, तब भी लोगों को अजीब सा लगा... इसी प्रकार सियाचिन में बर्फ में दबकर मारे गए लांसनायक हनुमंथप्पा के लिए भी अखबारों और जनता ने “शहीद” शब्द का उपयोग होते देखा... इससे कई लोगों का माथा चकरा गया. इशरत जहाँ भी “शहीद” और हनुमंथप्पा भी “शहीद”, ऐसा कैसे हो सकता है?? परन्तु वास्तव में देखा जाए तो इसमें अजीब कुछ भी नहीं था. शहीद शब्द को लेकर इस्लाम में एकदम स्पष्ट परिभाषा है, जबकि अज्ञानी एवं भोलेभाले हिंदुओं को जैसा पढ़ा-लिखा दिया जाता है, वे उसका पालन करने लग जाते हैं. ऐसा क्यों?? तो आईये पहले हम समझें “शहीद” और “हुतात्मा” शब्दों के बीच का अंतर... चाणक्य सीरियल का एक वाक्य है, “भय सिर्फ यवनों की दासता का नहीं, भय उनकी सांस्कृतिक दासता का भी है”  यह वाक्य (सिरियल से) इसलिए याद आया कि, हमें पता भी नहीं चला और हम अपने हुतात्माओं को “शहीद” कहने लगे. इसे समझने के लिए आप को तीन ऐसे लिंक्स दे रहा हूँ, जिसका काट देने की कोई मुसलमान हिम्मत नहीं कर सकता. इनमें शहीद शब्द की व्याख्या की गई है. 1. http://www.albalagh.net/qa/shaheed.... 2. http://www.quran-islam.org/main_top...3. https://www.2600.com/news/mirrors/h... सब से पहली लिंक है मुफ़्ती तकी उसमानी साहब की, जो कराची स्थित दारुल उलूम में फिकह और हदीथ के अध्येता हैं. इंग्लिश, अरबी और उर्दू में 66 किताबें उनके नाम पर हैं और अधिकारी व्यक्ति हैं, जिनका संदर्भ गंभीरता से लिया जाता है. देखते हैं वे क्या कहते हैं शहीद के बारे में : Shaheed in the real sense is a Muslim who has been killed during "Jihad" or has been killed by any person unjustly. Such a person has two characteristics different from common people who die on their bed. Firstly, he should be buried without giving him a ritual bath. However, the prayer of the Janazah shall be offered on him and he shall also be given a proper kafin (burial shroud). Secondly, he will deserve a great reward in the Hereafter and it is hoped that Allah Almighty shall forgive his sins and admit him to Jannah. It is also stated in some of the traditions that the body of such a person remains in the grave protected from contamination or dissolution.  अर्थात सही मायने में “शहीद” वो मुसलमान होगा, जो जिहाद करते समय कत्ल होगा अथवा जिसकी अन्याय से हत्या हुई होगी. आम आदमी की सामान्य मौत से अलग इसके दो भिन्न लक्षण होंगे. पहली बात यह है कि, उसे गुसल (यानी स्नान) के बिना ही दफनाया जाएगा, लेकिन जनाजे की नमाज अता की जाएगी तथा उसे एक सही कफन ओढा जाएगा. दूसरी बात यह है कि वो (दूसरी दुनिया) में बड़े इनाम का हकदार होगा तथा यह उम्मीद है कि अल्लाह तआला उसके गुनाह माफ करके उसे जन्नत में आने की इजाजत देंगे.  कुछ जगहों में यह भी कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति का शव सुरक्षित रहता है, उसमें सड़न नहीं होती. यह बात मजेदार है, सडन न होनेवाली. जबकि जिनको भी ये शहीद कहते आए हैं, जरा देखो तो आज उनकी लाशों का क्या हाल है? कीड़े केंचुओं ने खा कर खाक में मिला दिया होगा... तो शहादत कैन्सल हो जानी चाहिए, नहीं? इस लेख के अंत में मुफ़्ती साहब ये कहते हैं  It is evident from the above discussion that the word "Shaheed" can only be used for a Muslim and cannot be applied to a non-Muslim at all. Similarly, the term cannot be used for a person who has been rightly killed as a punishment of his own offence. इस चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि यह शब्द "शहीद" केवल एक मुसलमान के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है, गैर-मुस्लिम के लिए कतई नहीं प्रयुक्त किया जा सकता. इसी तरह से, यह संज्ञा किसी ऐसे (मुस्लिम) व्यक्ति के लिए भी नहीं प्रयुक्त की जा सकती जिसे अपने गुनाहों के लिए न्यायोचित मृत्युदंड दिया गया हो. मुफ़्ती तकी उस्मानी साहब की बात को गौर से पढ़ें और समझें... "Shaheed in the real sense is a Muslim who has been killed during "Jihad" or has been killed by any person unjustly. यानी सही मायने में शहीद वो मुसलमान होगा, जो जिहाद करते समय कत्ल होगा या जिसकी अन्यायपूर्ण हत्या हुई होगी. अब जिहाद करते कत्ल क्यूँ होगा? अगर जिहाद केवल भाई से भाई को मिलाने की बात हो या केवल आत्मोन्नति वाला जिहाद हो (Jihad-al-Nafs) जैसे कि हमें बताया जाता है, जब हम जिहादी को आतंकी कहते हैं? भारत में काफिरों ने कभी किसी संत को नहीं मारा. हाँ, मोमिनों द्वारा सत्य की राह में जो लोग नहीं आए, उनको लाते लाते वे मर गए उसमें मोमीन बेकसूर ही हैं, क्या नहीं? मुसलमान पर कोई भी आरोप लगता है तो उसके बचाव में खड़े होनेवाले अपनी बात की शुरुआत ही "मासूम मुसलमान" से करते हैं. बात यह भी है कि मुफ़्ती साहब पाकिस्तान में रहते हैं, वहाँ हिन्दू सत्ता में नहीं । जहां काफिरों के देश में रहना नहीं है, वहाँ मुसलमान खुल कर बोलता है.  इस्लाम को ले कर भारत या अमेरिका में रहनेवाले किसी मुसलमान के मुकाबले ये मुफ़्ती साहब ज्यादा ईमानदार हैं. उसी वाक्य के आखरी हिस्से में वे कहते हैं कि वो मुसलमान भी शहीद है जिसकी अन्याय हत्या हुई होगी. अब न्याय क्या, और अन्याय क्या? जब केस दर्ज होता है तो उन्हें भारत की न्याय व्यवस्था और भारत के संविधान में विश्वास होता है. अगर फैसला विरोध में आए तो judicial killing. किसी को फुर्सत नहीं, और किसी के पास उतना धन भी नहीं इसलिए इनकी गर्जनाएँ चलती हैं कि इस कानून को हम कानून ही नहीं मानते. हमारे लिए कुरान / शरिया ही कानून है. अब ये लोग अपने शहीद की कैटेगरी स्पष्ट करें कि जिन्हें भारत की न्याय व्यवस्था ने मृत्युदंड दिया उन्हें ये शहीद कह रहे हैं, तो क्या उनके साथ जो हुआ वो न्याय नहीं था या फिर उनपर जो आरोप हैं वे काम इस्लाम में जायज और बिलकुल करने योग्य हैं? इतने सारे सबूतों और गवाहियों के बाद यह तो मानना मुमकिन नहीं कि आरोप ही झूठे थे. भारत के स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं के साथ इनकी तुलना नहीं हो सकती. देशज जन और देशज सत्ता से आप इस देश को इस्लाम के लिए काबिज नहीं कर सकते, ना ही ऐसे गतिविधियों को आजादी की जंग का नाम दे सकते हैं. अर्थात इससे कुछ उजागर होता है तो वह जिहाद का असली चेहरा ही है.  मुफ़्ती उस्मानी साहब की दूसरी बात को देखते हैं -  1. इस चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि यह शब्द "शहीद " केवल एक मुसलमान के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है और गैर मुस्लिम के लिए कतई नहीं प्रयुक्त किया जा सकता. 2. इसी तरह से, यह संज्ञा किसी ऐसे (मुस्लिम) व्यक्ति के लिए भी नहीं प्रयुक्त किया जा सकती जिसे अपने गुनाहों के लिए न्यायोचित मृत्युदंड दिया गया हो.मुफ़्ती साहब साफ कह रहे हैं कि यह शब्द "शहीद" केवल मुसलमान के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है और गैर मुस्लिम के लिए कतई नहीं प्रयुक्त किया जा सकता. मुफ्ती साहब द्वारा वर्णित परिभाषा के अनुसार इसका मतलब यह है कि यदि हम चंद्रशेखर आज़ाद अथवा भगत सिंह जैसे वीरों को शहीद कहते हैं, तो गलत है क्योंकि वे मुसलमान नहीं हैं. मुफ्ती साहब की इसी व्याख्या से अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत के मुसलमान की नजर में अब्दुल हमीद “शहीद” है या नहीं ? अब्दुल हमीद पाकिस्तान से लड़ते हुए मारे गए थे, पाकिस्तानियों के हाथों. याने इस्लाम और अल्लाह के लिए सरजमीं-ए-हिन्द को फतेह करने निकले गाजी मुसलमान ने अपने काफिर आकाओं से वफादारी दिखाकर इस्लामी गाजियों को मारा था. युद्ध में पाकिस्तानी तो इस्लाम की फतेह के लिए मारे गए, यानी वे तो ऑटोमैटिक शहीद हो गए, लेकिन काफिरों की तरफ से गाजियों से लड़ते हुए अब्दुल हमीद को भारत के मुसलमान शहीद मानेंगे या नहीं? सवाल यही है कि क्या भारत का मुसलमान, पाकिस्तानी सैनिकों को इस देश का हमलावर मानता है या दस्तगीर (हाथ बढ़ाकर मदद करनेवाला) मानता है?  सूरह 5:53 से 5:55 को संदर्भों के साथ देखें तो यह हिदायत है कि अगर गलत लोगों को अपने से दूर न रखा जाये और अपने साथ घुलने दिया जाये तो गेहूं के साथ घुन को पिसना ही है. बात हम शहीदों की कर रहे थे, और शहीद शब्द की व्याख्या कर दी गई है. तो हमारे भारत के वीर “शहीद” कब से कहलाने लगे? पोस्ट की शुरुआत मैंने चाणक्य सिरियल के एक वाक्य से की थी – “भय सिर्फ यवनों की दासता का नहीं, भय उनकी सांस्कृतिक दासता का भी है”. उसी के आगे चाणक्य यह भी कहते हैं कि – “अनुभव कहता है कि पराजित राष्ट्र, और पराजित मन प्राय: विजेताओं के संस्कार और संस्कृति को स्वीकार करते हैं. सैकड़ों वर्ष की इस्लामी हुकूमत से हिन्दू राज्यों की राजभाषा में भी उर्दू और फारसी शब्द प्रचुरता से पाये जाते हैं. वैसे हम शहीद कब से कहने लगे, इसका इतिहास थोड़े ही किसी ने लिख रखा है? कह दिया किसी ने शहीद, तो लग गए हम भी शहीद कहने. 1948 में फिल्म आई थी 'शहीद' जिसका अमर गाना 'वतन के राह में वतन के नौजवाँ शहीद हो' आज भी सभी के जुबान पर है. उसके बाद दूसरी शहीद फिल्म आ गयी, और यही शब्द मनोमस्तिष्क पर दृढ़ हो गया, किसी को कुछ अलग से सोचने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई. विदेशी भाषा के शब्दों को हम किस तरह बिना सोचे-समझे उपयोग करने लगते हैं इसका शानदार उदाहरण है "RIP" नामक शब्द... "फैशन" की तरह उपयोग किए जाने वाले इस शब्द की असलियत जानना चाहते हों तो मेरे एक पुराने ब्लॉग पर पहुँचें... (http://blog.sureshchiplunkar.com/2015/04/what-is-rest-in-peace-rip.html)... खैर, आगे बढ़ते हैं... आज जब मुसलमानों ने हमें थप्पड़ मार कर जगाया कि शहीद तो अफजल गुरु है, याक़ूब मेमन है, इशरत जहां है, तब जा कर ये सोचना पड़ा कि आखिर शहीद होता क्या है. तब ही समझ में आया कि इस शब्द को ले कर मुसलमान तो एकदम स्पष्ट हैं कि एक मुसलमान ही शहीद कहला सकता है - क्यूँ और कब, यह हम ऊपर देख चुके. तो अब हमें भी यह सोचना चाहिए कि हमारे स्वतंत्रता वीर तथा राजा-महाराजा क्या थे, उनको किस शब्द से सम्मानित किया जाये? “हुतात्मा” - यह शब्द हमारे पास पहले से है, आज का नहीं है. बस हम भूल गए थे, या यूँ कहें कि शहीद कहने में हमें शहद की मिठास महसूस होती थी. लेकिन अब जागरूकता आ रही है और शहद खत्म हो गया, तो जहर की कड़वाहट भी समझ आने लगी है. हुतात्मा शब्द का संधि विच्छेद करने से पता चलता है, कि जिसने अपनी आत्मा की आहुति दे दी हो, उसे हुतात्मा कहेंगे. अर्थात जिस व्यक्ति ने किसी पवित्र कार्य के लिए अपनी आत्मा या अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया हो.  जर्मन शेफर्ड जानते हैं आप? अल्सेशियन भी कहलाता है. जी हाँ, कुत्ते की ही बात कर रहा हूँ. कोई कहता है कि यह भेड़िये जैसा दिखता है. नहीं, गलत कहते हैं... भेडिये और अल्सेशियन में फर्क होता है. शक्ल में भी फर्क है और फितरत में तो बहुत ही ज्यादा फर्क है. अल्सेशियन अपने स्वामी के लिए जान भी देने से कतराता नहीं. जबकि भेड़िये में ऐसे गुण नहीं होते. भेडिये कि वफादारी उसकी “टोली” से या कहें कि उसके कबीले से होती है, उम्मत भी कहना चाहें तो मुझे एतराज नहीं. कुत्ते में एक गुण और भी होता है. वह अपने मालिक के दुश्मन को, मालिक से भी पहले पहचान जाता है. चोर या उठाईगीरों को भी कुत्ता छोड़ता नहीं. मालिक से वफादार रहता है, अपरिचित के हाथों से खाएगा नहीं. अगर आप को पता न हो तो बता दूँ, इस्लाम के नियमों के अनुसार घर में कुत्ते पालना मना है. हिकारत से किसी को कुत्ता कहकर गाली देना, यह भी हमारे लिए विजेताओं का स्वीकृत संस्कार है. अब लगता है कि “शहीद” और “हुतात्मा” के बीच का फर्क आप को स्पष्ट समझ में आया ही होगा.========================= श्री आनंद राजाध्यक्ष जी की फेसबुक वाल से साभार... (मामूली संशोधन एवं साजसज्जा के साथ). 

Posted on: 19 March 2016 | 12:55 am

Sufism, Dargah and Islam in India

सूफीवाद, दरगाह-मज़ार और इस्लाम प्रचारपिछले कुछ वर्षों में आपने हिन्दी फिल्मों एवं खासकर गीतों में अचानक तेजी से बढ़े कुछ खास शब्दों की तरफ ध्यान दिया होगा... जैसे “मौला”, “अल्ला” इत्यादि. फिल्मों में भी विजय अथवा राहुल नाम का कोई “हिन्दू” हीरो कई बार दरगाहों अथवा चर्चों में मत्था टेकते या सीने पर क्रास बनाए हुए दिखाई दे जाता है. इसी प्रकार अजमेर की ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आए दिन बड़े-बड़े फ़िल्मी सितारों का जमघट लगा हुआ दीखता है, जो सिर पर गुलाबों के फूल की टोकरी और हाथ में हरी चादर लेकर “दुआ”(??) माँगने जाते हैं. क्या कभी आपने सोचा कि ऐसा क्यों होता है? वास्तव में यह एक प्रकार का “दृश्य-श्रव्य” धीमा ज़हर होता है, जिसके जरिये आपकी सांस्कृतिक चेतना एवं अवचेतन मन पर प्रभाव उत्पन्न किया जाता है. लगातार कई वर्षों तक विभिन्न माध्यमों के जरिये ऐसा करने से व्यक्ति के दिमाग के एक हिस्से में उन दृश्यों एवं उनमें दिखाए जाने वाले मौलाओं, कब्रों, दरगाहों के प्रति एक “सॉफ्ट कॉर्नर” उत्पन्न हो जाता है, जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए पूर्ण ब्रेनवॉश का रूप ग्रहण कर लेता है. हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान बयान दिया, कि इस्लाम में यदि सूफ़ी मत प्रभावी स्वर होता, तो इतनी हत्याएं न होतीं... संसार में इस्लाम की केंद्रीय अवधारणा तौहीद के मानने वाले इतने नरसंहार न करते. इस्लामी इतिहास और इस्लामी वांग्मय के एक विद्यार्थी होने के नाते, यह मेरा दायित्व है कि मैं इस्लाम और सूफ़ीवाद पर इतिहास के आलोक में बात करूँ. और पाठकों को बताऊँ कि वास्तव में मोदी ने अनजाने में ही एक भीषण गलती कर दी है. आइये हम पहले जानें कि भारत के संदर्भ में सूफ़ी मत क्या है? सूफ़ीमत यानी भारत के अपने में ही डूबे रहने वाले बुद्धिजीवी वर्ग, अपने चश्मे से दुनिया को देखने एवं उसके बारे में राय बनाने वाले विशिष्ट वर्ग के लिये हिन्दू-मुस्लिम एकता का एक और गंगा-जमुनी काम भर है. इन सेकुलर बुद्धिजीवियों की इस “गंगा-जमनी”(??) तहज़ीब का प्रकटन पाकिस्तानी गजगामिनी क़व्वाला आबिदा परवीन की क़व्वाली का आनंद लेने, उसके कार्यक्रमों में जा कर ताली बजा-बजा कर सर धुनने-धुनवाने, वडाली बंधुओं के अबूझ-अजीब से गानों में रस लेना प्रदर्शित करने, अमीर ख़ुसरो, बुल्ले शाह जैसे शायरों, कवियों की निहायत फटीचर कविता को अद्भुत मानने इत्यादि में होता है. आईये पहले उदाहरण के रूप में हम सर्वाधिक चर्चित सूफ़ी शायरों की कविताओं के कुछ उद्धरण लेते हैं, ताकि बात आगे बढ़ने के लिये ये उपयोगी होंगे... रैनी चढ़ी रसूल की रंग मौला के हाथ जिसकी चूँदर रंग दई धन-धन उसके भाग { अमीर ख़ुसरो }मौला अली मौला मौला अली मौला आज रंग है ए माँ रंग है जी रंग है {अमीर ख़ुसरो } छाप-तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलाय केप्रेमभटी का मधवा पिलाय के मतवाली कर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के गोरी-गोरी बहियाँ हरी-हरी चुरियां, बँहियां पाकर धर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के बल-बल जाऊं मैं तोरे रंगरेजवा अपनी सी कर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के ख़ुसरो निज़ाम के बल-बल जाइये मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैना मिलाय के {अमीर ख़ुसरो) मोरा जोबना नवेलरा भयो है गुलाल कैसी धार दिनी विकास मोरी माल मोरा जोबना नवेलरा......निजामुद्दीन औलिया को कोई समझाये ज्यों ज्यों मनाऊं वो तो रूठता ही जायेमोरा जोबना नवेलरा......चूड़ियाँ फोड़ पलंग पे डारूँ इस चोली को दूँ मैं आग लगायसुनी सेज डरावन लागे विरही अगन मोहे डंस-डंस जाये मोरा जोबना नवेलरा......{अमीर ख़ुसरो ) बुल्ले शाह शौह तैनूं मिलसी दिल नूं देह दलेरीप्रीतम पास ते टोलणा किस नूं भुलिओं सिखर दुपहरी { बुल्ले शाह }ओ रंग रंगिया गूडा रंगिया मुरशद वाली लाली ओ यार { बुल्ले शाह) जिसे शायरी अथवा कविताओं की अधिक समझ नहीं है, उसे पहली नज़र में तो यही समझ में आता है कि इन क़व्वाली / कविताओं का उद्देश्य कपडे रंगवाना है, या होली में कपडे रंगवाना है और ये किसी मौला नाम के रंगरेज़ की बात कह रहे हैं. कई जगह ख़ुसरो या अन्य सूफ़ी नज़रें मिलते ही चेरी [दासी] बनने, अपने सुहागन होने, अपने नवल जोबन की अगन, अपनी चोली को जलाने की बात करते हैं. इसका तो मतलब ये लिया जा सकता है कि ये पठानी-ईरानी शौक़ { ग़िलमाँ} की बात कर रहे होंगे, मगर रंगरेज़ पर कविता लिखने का क्या मतलब? ये भी निश्चित है कि बुल्ले शाह, निज़ामुद्दीन, बख़्तियार काकी, ख़ुसरो इत्यादि लोग धोबी तो नहीं ही थे. विश्व की किसी भी भाषा में रंगरेज़ पर कवितायें मेरी जानकारी में तो नहीं मिलतीं. ये कविता का विषय ही नहीं है. तो फिर ये रंग क्या है? रसूल की चढ़ी रैनी में मौला के हाथ रंग होने का क्या मतलब? जिसकी चूनर रंग दी गयी, उसके धन-धन भाग का क्या अर्थ है? ये किसी सांकेतिक रंग की बात तो नहीं कर रहे? फिर ये छाप तिलक क्या है? ख़ुसरो अमीर सैफ़ुद्दीन मुहम्मद के बेटे थे जो तुर्क थे और निज़ामुद्दीन के शिष्य थे. न तो तुर्क लोग तिलक लगते हैं, और न ही निज़ामुद्दीन जिस चिश्ती परम्परा के सूफ़ी हैं उसमें तिलक लगाये जाते हैं. तो फिर ये किस छाप-तिलक का ज़िक्र किया जा रहा है? कहीं ये किसी अन्य की बात तो नहीं कर रहे, जिसकी छाप-तिलक नैना मिला कर छीन ली गयी हो? जी हाँ यही सच है, और ये मतलब खुलता है अमीर ख़ुसरो की एक रचना 'छाप-तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलाय के' से. छाप-तिलक से अभिप्राय ब्रज के गोस्वामियों द्वारा कृष्ण भक्ति में 8 जगह लगाने वाली छाप से है. वास्तव में ख़ुसरो कह रहा है, कि मुझसे आँखें मिला कर मेरी छाप-तिलक सब छीन ली... यानी मुझे मुसलमान कर दिया. आज रंग है हे माँ... का अर्थ इस्लाम में लोगों के दीक्षित होने से है. धर्मबंधुओ! सूफ़ी मत इस्लाम फ़ैलाने का केवल एक उपकरण मात्र है और सूफ़ियों की हर बात का अर्थ प्रकारांतर में इस्लाम में दीक्षित हो जाना है. भारत में धर्मान्तरण के सबसे प्रमुख उपकरण सूफ़ी ही रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान से शुरू करके मुल्तान, पाकिस्तानी पंजाब, भारतीय पंजाब, हरियाणा, दिल्ली पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, बांग्लादेश से इंडोनेशिया से आगे जाता हुआ पूरा गलियारा इन्हीं सूफियों का शिकार हुआ है. उत्तर प्रदेश के “बौद्ध राजपथ” वाले सारे ज़िलों से बुद्ध मत गायब हो गया. यहाँ के बौद्ध इन्हीं सूफ़ियों के शिकार हुए हैं. बुल्ले शाह, मुईनुद्दीन, निजामुद्दीन, बख़्तियार काकी जैसे कुछ प्रमुख के अलावा भी सारे भारत में इनकी दरगाहें बिखरी पड़ी हैं. ये सब इस्लाम की लड़ाई लड़ने आये सैनिक थे. जिन्हें प्रतापी हिन्दू राजाओं ने काट डाला, वो “शहीद” कहला कर पूजे जा रहे हैं, बाक़ी पीर बाबा, ग़ाज़ी बाबा कहला रहे हैं. इनकी किताबें पढ़िये, सभी में इनके काफ़िरों या जादूगरों से संघर्ष की चतुराई से लिखी गयी कथाएं हैं. अजमेर के मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह या दिल्ली के निज़ामुद्दीन और अमीर ख़ुसरो की क़ब्रों पर जा कर देखिये, वहां आने वाले नब्बे प्रतिशत हिन्दू मिलते हैं, यानी आज भी न्यूनाधिक ये पापलीला चल रही है, क्योंकि एक सामान्य हिन्दू “लचीला” तो होता ही है, वह सामान्यतः दूसरे पंथों का अपमान भी नहीं करता और भोला तो इतना होता है कि पश्चिम से आए पंथों द्वारा रचे गए चतुराईपूर्ण षड्यंत्रों को समझ ही नहीं पाता. वर्तमान भारत से इतर वृहत्तर भारत का “सिल्क रूट” कहलाने वाला क्षेत्र इन्हीं कुचक्रों के कारण बौद्ध मत की जगह इस्लामी बना है. इसी का परिणाम आज चीन का सिंक्यांग, एवं रूस से अलग हुए इस्लामी देशों में दिखाई देता है. सब जगह खंडित बुद्ध मूर्तियां, ध्वस्त बौद्ध विहार मिलते हैं. ऑनलाइन विवाद की स्थिति में मोमिन पूछते हैं कि बौद्ध धर्म का सफाया हिन्दू राजाओं ने किया और नव बौद्ध के साथ मिलकर दोनों राजा पुष्यमित्र शुंग को कोसते हैं, कि उन्होंने मौर्य राजवंश का अंत कर सत्ता हथियाई. सच्चाई का दूसरा पहलू यह है कि बामियान के बुद्ध हों, तक्षशीला, नालंदा या साँची के स्तूप हों... तारीख के स्याह पन्नों पर बख्तियार ख़िलजी, होशंग शाह और तालिबानी ज्यादतियों की कहानी कभी मिटाई नहीं जा सकेगी. हिन्दू और उनके नेता इतने भोले (बल्कि मूर्ख) हैं कि वह अभी तक खूंखार जिहादियों के सूफी होने का नकाब ओढ़ने वालों के मोह जाल में फंसे हुए हैं. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लंदन में सूफियों के गुणगान करते हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा की सरकारें करोड़ों रुपये इन सूफी दरगाहों पर खर्च करती हैं. आज भी इन सूफी दरगाहों पर जाने वाले लोग मुसलमान नहीं, बल्कि हिन्दू हैं. दुःख की बात यह है, कि इन तथाकथित जिहादी सूफियों ने करोड़ों हिन्दुओं को तलवार के जोर से मुसलमान बनाया, और उनके उपासना स्थलों को जबरन मस्जिदों और दरगाहों में बदल डाला. इस्लाम के इन छिपे जिहादियों के खतरनाक घिनौने चेहरों का कई विद्वानों ने पर्दाफाश करने का प्रयास बारम्बार किया है, ताकि बुद्धिहीन हिन्दू उनके असली चेहरों को पहचान सकें और उनके दरगाहों पर नजराने देने का सिलसिला फौरन बंद कर दें. आजादी के बाद इस्लाम के खूँखार प्रचारकों को सूफी करार देकर उनको महिमामंडित करने का अभियान चल रहा है. इस दुष्प्रचार का शिकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी हो गए और उन्होंने लंदन में भाषण देते हुए फरमाया कि अगर सूफी होते तो कोई हत्याकांड नहीं होता. वर्ष 1992 में विख्यात् पत्रकार गिरीलाल जैन सूफी दरगाहों को इस्लाम में भर्ती करने वाली संस्थाओं की संज्ञा दी थी. गत कुछ दशकों से लम्बी-लम्बी दाढ़ियों वाले मौलवी, जगह-जगह हरी चादरें बिछाकर अपने पालतू संगठन बनाकर सूफीवाद की आड़ में अपनी दुकानें चला रहे हैं. यह दावा सरासर गलत है कि सूफी मौला, हिन्दू धर्म और इस्लाम के बीच पुल का काम करते थे. सच्चाई तो यह है कि अधिकांश सूफी इस्लाम के प्रचारक थे, जिन्होंने इस्लाम को फैलाने के लिए और हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के लिए हर हथकंडा अपनाया. उनका हिन्दू धर्म या उनके दर्शन से कोई दूर-दर तक वास्ता नहीं था. यह बात दूसरी है कि उन्होंने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए हिन्दवी भाषा का सहारा लिया. उनके खरीदे हुए गुलामों ने उनकी करामात के बारे में झूठे वायदे करके आस्थावान हिन्दुओं को उनकी ओर आकर्षित किया. विडंबना यह भी है कि जिन सूफियों ने हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया और उनके पूजास्थलों को मिट्टी में मिलाया, उन्हीं की दरगाहों में हाजिरी देने वालों में 90 प्रतिशत मूर्ख हिन्दू होते हैं. इस तथ्य से कोई व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि इन सूफियों ने जासूस के रूप में कार्य किया और मुस्लिम अक्रांताओं को हिन्दू राजाओं को पराजित करने के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई. यदि यह सूफी भारत की बहुधर्मी संस्कृति में विश्वास करते थे, तो क्या उन्होंने एक भी मुसलमान को हिन्दू धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया? क्या उनमें से एक भी “कथित सन्त” ने मुस्लिम सुल्तानों द्वारा हिन्दू जनता के उत्पीड़न और उनके उपासना स्थलों को तबाह करने का कभी विरोध किया था? कभी नहीं... सच तो यह है कि इनकी दरगाहें इस्लाम के प्रचार का मुख्य केन्द्र बनीं रहीं. पंजाब में बाबा फरीदगंज शक्कर का नाम काफी श्रद्धा से लिया जाता है. गुरूग्रंथ साहिब तक में उनकी वाणी शामिल है. मगर नवीं शताब्दी की एक फारसी पुस्तक जिसका नाम है ‘मिरात-ए-फरीदी’ लेखक अहमद बुखारी में इस महान सूफी की पोल खोलकर रख दी गई है. लेखक के अनुसार इस सूफी ने पंजाब में 25 लाख हिन्दू जाटों का धर्मांतरण करवाया था। उनके दस हजार बुतखानों को ध्वस्त करवाया. इस पुस्तक में उनके इन कारनामों का बड़े विस्तृत रूप से जिक्र किया गया है. अजमेर के हजरत गरीब नवाज मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में कुछ वर्ष पूर्व लाहौर के एक समाचारपत्र कोहिस्तान में कुछ फारसी पत्र प्रकाशित हुए थे, जो कि उन्होंने शाहबुद्दीन गौरी को लिखे थे. इन पत्रों में मोईनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर के किले तारागढ़ को कैसे जीता जाये, इसके बारे में गौरी को कई सुझाव दिए थे. इनकी चार पत्नियां थीं जिनमें से एक पत्नी राजपूत थीं, जिसे किसी युद्ध में बंदी बनाया गया था. इसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया. इस राजपूत औरत से चिश्ती की एक पुत्री का जन्म हुआ था, जिसका नाम बीबी जमाल है और उसकी कब्र आज भी अजमेर स्थित दरगाह के परिसर में है. तत्कालीन फारसी इतिहासकारों ने इनके बारे में यह दावा किया है, कि उन्होंने दस लाख काफिरों (हिन्दू) को कुफ्र की जहालत से निकालकर इस्लामी के नूर से रोशन किया, अर्थात् उनका धर्मांतरण करवाया. इस सूफी की प्रेरणा से अजमेर और नागौर में अनेक मंदिरों को ध्वस्त किया गया. अजेमर स्थित “ढाई दिन का झोपड़ा” इसका ज्वलंत उदाहरण है... लेकिन भारत की नई पीढ़ी जिसका “सेकुलर ब्रेनवॉश” हो चुका है वह इस दरगाह पर अमिताभ बच्चन को सिर पर गुलाबों की टोकरी उठाए देखता है तो गदगद हो जाता है. यह पीढ़ी इस दरगाह के पीछे का खूनी इतिहास जानने में रूचि नहीं रखती... अंग्रेजी में इसे “Deadly Ignorance” (घातक अज्ञान) कहा जाता है. इसी प्रकार बंगाल के खूंखार और लड़ाके सूफियों में एक मुख्य नाम सिलहट के शेख जलाल का भी है. गुलजार-ए-अबरार नामक ग्रंथ के अनुसार इस सूफी ने राजा गौढ़ गोविन्द को हराया. शेख जलाल का अपने अनुयायियों को स्पष्ट आदेश था कि वह हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने की दावत दें और जो उससे इंकार करे उसे फौरन कत्ल कर दें.बहराइच के गाजी मियां उर्फ सलार मसूद गाजी का नाम भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है. यह महमूद गजनवी का भांजा था, और इसी ने सोमनाथ के मंदिर को ध्वस्त करने के लिए अपने मामा को प्रेरित किया था. प्रारम्भ से ही उनका हिन्दुओं के सामने एक ही प्रस्ताव था - मौत या इस्लाम. बहराइच के समीप वीर हिन्दू महाराजा सोहेल देव की सेनाओं के हाथ वह अपने हजारों साथियों सहित मारा गया था, लेकिन सोहेल देव के हारने के पश्चात मोहम्मद तुगलक ने मसूद की मजार पर एक पक्का मकबरा बनवा दिया और ये “गाजी मियां” उर्फ बाले मियां उत्तर प्रदेश और बिहार में एक बेहद लोकप्रिय पीर के रूप में विख्यात् हो गए, जबकि इसे हराने और मारने वाले हिन्दू राजा सोहेलदेव इतिहास से गायब हो गए. “जिकर बाले मियां” नामक उर्दू पुस्तक के अनुसार, गाजी मसूद ने पांच लाख हिन्दुओं को मुसलमान बनाया और अपने अनुयायियों को यह आदेश दिया था कि वह हिन्दू महिलाओं से जबरन निकाह करें. इतिहासकारों के अनुसार मेरठ स्थित नवचंडी मंदिर को ध्वस्त करने वाले बाले मियां ही थे। बाले मियां के काले कारनामों का उल्लेख (ईलियट एण्ड डाउसनः हिस्ट्री आॅफ इण्डिया बाई इट्स ओन हिस्टोरियन्स, खण्ड-2, पेज-529-547) में विस्तृत रूप से किया गया है. कश्मीर का इस्लामीकरण करने में भी सूफियों का महत्वपूर्ण हाथ है. जाफर मिक्की ने “कश्मीर में इस्लाम” नामक फारसी पुस्तक में यह स्वीकार किया है, कि तुर्किस्तान से आने वाले 21 सूफियों ने नुरूद्दीन उर्फ नंदऋषि के नेतृत्व में कश्मीर के 12 लाख हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया था. इन सूफियों ने उन सभी पांच लाख हिन्दुओं का कत्ल कर दिया, जिन्होंने इस्लाम कबूल करने से इंकार कर दिया था. कश्मीर के कुख्यात् धर्मांध और कट्टरवादी मुस्लिम शासक सुल्तान सिकंदर बुतशिकन ने कश्मीर घाटी में स्थित सभी हिन्दू मंदिरों को तहस-नहस करवा दिया था। मार्तंड के विख्यात् सूर्य मंदिर के खंडहर आज भी इन सूफियों के जुल्मों की कहानी के साक्षी हैं. इस सुल्तान ने अवंतीपुर के विष्णु के भव्य मंदिर को भी तहस-नहस करवाया था, यह बात भी कश्मीर में बाकायदा लिखित स्वरूप में उपलब्ध है. वैसे तो सूफी शब्द के और भी दो तीन अर्थ निकलते हैं, लेकिन एक सर्वमान्य अर्थ है कि ऐसे सच्चे मुसलमान जो ऊन से बने वस्त्र पहनते थे. Suf से Sufi बनता है, और Suf का अर्थ Wool दिया गया है. (बहराईच के  इस सालार गाजी के बारे में और अधिक जानने के लिए सात वर्ष पूर्व मेरी लिखी हुई इस पोस्ट को भी जरूर पढ़िए...और सोचिए कि हिंदुओं को कैसे मूर्ख बनाया गया है... http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/05/mughal-invader-defeated-by-hindu-kings.html)वैसे आप को शायद पता ही होगा कि इंग्लिश में एक मुहावरा है – “pulling wool over someone's eyes” . इसका लौकिकार्थ होता है, “किसी का भरोसा जीतकर उसे मूर्ख बनाना...”. Suf = Wool होता है, ये हम इस लेख में विस्तार से देख चुके हैं. आँखों में धूल झोंककर, स्वयं को आध्यात्मिक एवं मौलवी टाईप के स्वांग में रचकर भोलेभाले हिंदुओं को इस्लाम की तरफ खींचने की चाल अभी तक काफी सफल रही है, परन्तु अब उम्मीद करता हूँ कि गाँव-गाँव में हरी चादरें फैलाकर खैरात माँगने वाली टोली अथवा हाईवे एवं महत्त्वपूर्ण सामरिक ठिकानों के आसपास अथवा सड़क के दोनों तरफ रातोंरात अचानक उग आईं दरगाहों, मज़ारों और चमत्कारों का दावा करने वाली इन “लाशों” के बारे में, आप लोग गहरे पड़ताल तो करेंगे ही... हिन्दू नाम वाले किसी फ़िल्मी हीरो को किसी दरगाह पर चादर चढ़ाते हुए देखकर लहालोट भी नहीं होंगे. वास्तव में सूफ़ी मत, “इस्लामी ऑक्टोपस” की ही एक बांह भर है. ===========================(भाई तुफैल चतुर्वेदी जी की फेसबुक पोस्ट, एवं कमेंट्स में मामूली फेरबदल के साथ साभार). 

Posted on: 12 March 2016 | 10:40 pm

JNU, Anti-National Congress and Communists

कांग्रेस का हाथ... वामपंथ और देशविरोधियों के साथ गत नौ फरवरी को जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सियाचिन के बर्फीले तूफ़ान को हराकर वापस लौटे वीर सैनिक हनुमंथप्पा को देखने अस्पताल गए, ठीक उसी समय राजधानी दिल्ली के बीचोंबीच स्थित जवाहरलाल नेहरू विवि उर्फ़ JNU में छात्रों का एक गुट न सिर्फ भारत विरोधी नारे लगा रहा था, बल्कि भारत की न्याय व्यवस्था एवं राष्ट्रपति की खिल्ली उड़ाते हुए कश्मीरी अलगाववादी अफज़ल गूरू के समर्थन में तख्तियां लटकाए और उसे बेक़सूर बताते हुए प्रदर्शनों में लगा हुआ था. इस विश्वविद्यालय के छात्रों एवं प्रोफेसरों द्वारा ऐसे बौद्धिक कुकृत्यों में शामिल होने के इतिहास को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू के नाम पर स्थापित इस विश्वविद्यालय के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. जब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के छिहत्तर जवानों को मौत के घाट उतारा था, उस समय जनेवि में ऐसे ही “तथाकथित छात्रों” द्वारा जश्न मनाया गया था. पिछले कई वर्षों से JNU में इस प्रकार की देशद्रोही एवं भारत के संविधान एवं न्याय व्यवस्था की आलोचना करने जैसे कृत्य लगातार होते आ रहे थे, परन्तु कांग्रेस की सरकारों द्वारा इस प्रश्रय दिया जाता रहा अथवा आँख मूँदी जाती रही. जब से नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई है काँग्रेस एवं वामपंथीयों की बेचैनी बढ़ने लगी है एवं मानसिक स्थिति बेहद मटमैली हो चली है. येन-केन-प्रकारेण मोदी सरकार को नित-नए मुद्दों में कैसे उलझाकर रखा जाए एवं देश को जाति-धर्म एवं भाषा में कैसे टुकड़े-टुकड़े किया जाए इसकी रोज़ाना योजनाएँ बनाई जा रही हैं... चूँकि मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही काँग्रेस और वामपंथियों के इस “मुफ्तखोरी वाले दुष्चक्र” को तोड़ने की शुरुआत की है, इसलिए स्वाभाविक है कि दोनों चोट खाए सांप की तरह अपने फन फैलाए लगातार फुँफकार रहे हैं, चाहे वह फिल्म एंड टीवी संस्थान का मामला हो, चाहे शनि शिंगणापुर का मामला हो, चाहे हैदराबाद के रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो... या फिर JNU में देशद्रोही नारों का ताज़ा मामला हो... सभी मामलों में काँग्रेस एवं वामपंथियों ने आग में घी डालने और भड़काने का ही काम किया है. चूँकि राहुल गाँधी के सलाहकार मणिशंकर अय्यर एवं दिग्विजयसिंह जैसे महानुभाव हैं, इसलिए राहुल बाबा तो मामले की गंभीरता समझे बिना ही उन उद्दंड एवं कश्मीरी अलगाववादियों के हाथों में खेलने वाले छात्रों के समर्थन में सीधे JNU भी पहुँच गए. दरअसल स्वतंत्रता के पश्चात से ही कांग्रेस (यानी वामपंथ, रूस एवं सोशलिज्म की तरफ झुकाव रखने वाले जवाहरलाल नेहरू) एवं वामपंथी दलों में आपस में एक अलिखित समझौता था जिसके अनुसार शैक्षणिक संस्थाओं, शोध संस्थानों तथा अकादमिक, नाटक एवं फ़िल्म क्षेत्र में वामपंथियों की मनमर्जी चलेगी, उनके पैर पसारने का पूरा मौका दिया जाएगा, सेकुलर-वामपंथी विचारधारा वाले प्रोफेसरों, लेखकों, फिल्मकारों को इन सभी क्षेत्रों में घुसपैठ करवाने तथा उन्हें वहां स्थापित करने का पूरा मौका दिया जाएगा, कांग्रेस इसमें कोई दखलंदाजी नहीं करेगी. इसके बदले में वामपंथी दल, कांग्रेस को संसद में, संसद के बाहर तथा राजनैतिक क्षेत्र के भ्रष्टाचार व अनियमितताओं के खिलाफ या तो कुछ नहीं बोलेंगे अथवा मामला ज्यादा बढ़ा, तो दबे स्वरों में आलोचना करेंगे ताकि माहौल को भटकाने तथा मुद्दे को ठंडा करने में मदद हो सके. कांग्रेस और वामपंथियों ने इस अलिखित समझौते का अभी तक लगातार पालन किया है. जैसे वामपंथियों ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का “अनुशासन पर्व” कहते हुए समर्थन किया, उसी प्रकार कांग्रेस ने भी सुभाषचंद्र बोस की फाईलों को साठ वर्षों तक दबाए रखा, ताकि सुभाष बाबू को “तोजो का कुत्ता” कहने वाले वामपंथी शर्मिन्दा ना हों. वामपंथ की विचारधारा तो खैर भारत से बाहर चीन-रूस-क्यूबा-वियतनाम जैसे तानाशाही ग्रस्त, एवं साम्यवादी हत्यारी विचारधारा से शासित देशों से आयातित की हुई है, इसलिए स्वाभाविक रूप से उनका भारतीय लोकतंत्र में तनिक भी विश्वास नहीं है, परन्तु काँग्रेस जैसी पार्टी जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को हथियाए बैठी है, देश की जनता को कम से कम उससे यह उम्मीद नहीं होती कि वह भी नरेंद्र मोदी से ईर्ष्या के चलते, देश को तोड़ने वाली ताकतों के साथ खड़ी हो जाए परन्तु ऐसा हुआ. JNU के देशद्रोही नारों वाले मामले को छोड़ भी दें तो यह पहली बार नहीं है कि काँग्रेस ने वामपंथ एवं देशद्रोहियों का साथ न दिया हो... सभी पाठकों को याद होगा कि 26/11 के नृशंस और भीषण आतंकवादी हमले के पश्चात जब हमारे सुरक्षाबलों ने बहादुरी दिखाते हुए सभी पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराया और अजमल कसाब जैसे दुर्दांत आतंकी को जीवित पकड़ लिया था, उसके बाद भी दिग्विजयसिंह जैसे वरिष्ठ काँग्रेसी सरेआम अज़ीज़ बर्नी जैसे विघटनकारी लेखक की पुस्तक “26/11 हमला – RSS की साज़िश” जैसी मूर्खतापूर्ण एवं तथ्यों से परे लिखी हुई किताब का विमोचन कर रहे थे. काँग्रेस के जो नेता सोनिया गाँधी की मर्जी और आदेश के बगैर पानी तक नहीं पी सकते हैं, उस काँग्रेस में ऐसा संभव ही नहीं कि दिग्विजयसिंह द्वारा ऐसी पुस्तक का विमोचन सोनिया-राहुल की जानकारी के बिना हुआ होगा. आगे चलकर यही दिग्विजयसिंह टीवी पर अन्तर्राष्ट्रीय आतंकी ओसामा बिन लादेन को “ओसामा जी” कहते हुए पाए गए. ताज़ा विवाद के बाद एक अन्य टीवी चैनल पर बहस के दौरान काँग्रेस के ही एक और वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने “अफज़ल “गुरूजी” का संबोधन भी किया. तात्पर्य यह है कि जो कांग्रेसियों के मन में है, वही गाहे-बगाहे उनकी जुबां पर आ ही जाता है और ऐसा कुछ होने के बाद सोनिया की चुप्पी अथवा इन पर कार्रवाई नहीं करना क्या दर्शाता है?? यदि हम इतिहास पर नज़र घुमाएँ तो पाते हैं कि ऐसी कई घटनाएँ हुईं, जिनसे काँग्रेस का यह देशविरोधी रुख प्रदर्शित होता है. उदाहरण के लिए स्वतंत्रता से पूर्व काँग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम गाया जाता था. लेकिन जब 1923 के अधिवेशन में काँग्रेस नेता पलुस्कर वन्देमातरम गाने के लिए खड़े हुए तो काँग्रेस के ही एक अन्य नेता मोहम्मद अली ने इसका विरोध किया और कहा कि “वन्देमातरम” गाना इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ है, इसे नहीं गाया जाना चाहिए. इस पर पलुस्कर ने कहा कि वे परंपरा को तोड़ेंगे नहीं और वन्देमातरम जारी रखा. इस पर मोहम्मद अली अधिवेशन छोड़कर निकल गए, उस समय मंच पर महात्मा गाँधी सहित लगभग सभी बड़े काँग्रेस नेता थे, लेकिन कोई भी नेता पलुस्कर (यानी वन्देमातरम) के समर्थन में खड़ा नहीं हुआ. यदि उसी समय मोहम्मद अली को उचित समझाईश दे दी गई होती तो ना ही उसके बाद हेडगेवार का काँग्रेस में दम घुटता, ना ही हेडगेवार काँग्रेस से बाहर निकलते और ना ही RSS का गठन हुआ होता. काँग्रेस का “वंदेमातरम” जैसे संस्कृतनिष्ठ एवं देशप्रेमी गीत पर यह ढुलमुल रवैया न सिर्फ आज भी जारी है बल्कि “सेकुलरों की मानसिक स्थिति” इतनी गिर गई है, कि “वन्देमातरम” बोलने वाले को तत्काल संघी घोषित कर दिया जाता है. काँग्रेस को अपने अध्यक्ष पद के लिए सदैव उच्चवर्गीय एवं गोरे साहबों के प्रति प्रेम रहा है. दूसरा उदाहरण स्वतंत्रता से तुरंत पहले का है, जब गाँधी और नेहरू अक्षरशः लॉर्ड माउंटबेटन के सामने गिडगिडा रहे थे कि वे स्वतंत्रता के बाद भी कुछ वर्ष तक भारत के गवर्नर बने रहें. 1948 में ही जब पाकिस्तान ने कबाईलियों को भेजकर भारत पर पहला हमला किया तो जवाहरलाल नेहरू ने सरदार पटेल, जनरल करिअप्पा एवं जनरल थिमैया की सलाह को ठुकराते हुए लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले गए, जिसका नतीजा भारत आज भी भुगत रहा है. लॉर्ड माउंटबेटन ने ही नेहरू को सलाह दी थी कि हैदराबाद के रजाकारों एवं निजाम का मामला भी संयुक्त राष्ट्र ले जाएँ और उन्हें “आत्मनिर्णय”(??) का अधिकार दें, परन्तु चूँकि तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने नेहरू की एक ना सुनी और सरदार पटेल द्वारा निज़ाम और दंगाई रजाकारों पर की गई कठोर कार्रवाई को पूर्ण समर्थन दिया. यही देशविरोधी कहानी उस समय भारत के उत्तर-पूर्व में भी दोहराई गई थी. उत्तर-पूर्व के राज्यों की नाज़ुक सामरिक स्थिति को देखते हुए जनरल करिअप्पा ने नेहरू को सुझाव दिया था कि भारत को उस क्षेत्र में अपनी रक्षा तैयारियों तथा सड़क-बिजली-पानी-बाँधों जैसे मूल इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक ध्यान देना चाहिए. परन्तु चूँकि नेहरू पर उस समय “चीन-प्रेम” हावी था, इसलिए उन्होंने उत्तर-पूर्व के राज्यों में सेना की अधिक उपस्थिति की बजाय विदेशी मिशनरी “वेरियर एल्विन” की सलाह को प्राथमिकता देते हुए आदिवासी एवं पहाड़ी क्षेत्रों को खुला छोड़ दिया. इसका नतीजा यह रहा कि चीन ने अरुणाचल का बड़ा हिस्सा हड़प लिया, नेहरू की पीठ में छुरा घोंपते हुए भारत पर एक युद्ध भी थोप दिया एवं ईसाई मिशनरियों ने समूचे उत्तर-पूर्व में अपना जाल मजबूत कर लिया. काँग्रेस की बदौलत आज की स्थिति यह है कि उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में हिंदुओं-आदिवासियों की संख्या चिंताजनक स्तर तक घट गई है और कुछ राज्य ईसाई बहुल बन चुके हैं. संक्षेप में तात्पर्य यह है कि गोरी चमड़ी वाले देशी-विदेशी आकाओं की बातें मानना, काँग्रेस का प्रिय शगल रहा है, फिर चाहे वह माउंटबेटन हों अथवा सोनिया माईनो. 1885 में एक अंग्रेज ह्यूम द्वारा ही स्थापित काँग्रेस की देशविरोधी हरकतों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले तो कांग्रेसियों ने सोनिया गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए एक दलित अर्थात सीताराम केसरी की धोती फाड़कर उन्हें बाहर धकिया दिया, तो दूसरी तरफ गोरे साहब क्वात्रोच्ची को बचाने के लिए काँग्रेस के वरिष्ठ नेता हंसराज भारद्वाज बाकायदा विदेश जाकर उसका बचाव करके आए, लेकिन बिहार के जमीनी दलित नेता बाबू जगजीवनराम को कभी भी काँग्रेस का अध्यक्ष नहीं बनने दिया. विडम्बना यह कि सीताराम केसरी और जगजीवनराम का घोर अपमान करने वाली काँग्रेस के युवराज सीधे हैदराबाद जाकर रोहित वेमुला की लाश पर घडियाली आँसू बहा देते हैं, क्योंकि काँग्रेस के “सहोदर” वामपंथी भी इसी उच्चवर्णीय ग्रंथि से पीड़ित हैं. वामपंथियों की सर्वोच्च पोलित ब्यूरो में भी दलितों की संख्या नगण्य है, लेकिन फिर भी रोहित वेमुला जो कि एक OBC है, उसे “दलित” बनाकर गिद्धों की तरह लाश नोचने में वामपंथी दल ही सबसे आगे रहे. अर्थात देशविरोधी ताकतों का साथ देना तो एक प्रमुख मुद्दा है ही, लेकिन वास्तव में काँग्रेस और वामपंथी दलों की संस्थाओं में “घनघोर उच्चवर्गीय जातिवाद” भी फैला हुआ है. इन्हीं के षड्यंत्रों एवं तरुण तेजपाल जैसे रेपिस्ट पत्रकार की वजह से भाजपा के पहले दलित अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को झूठे मामले में फँसाया गया. बहरहाल, फिलहाल हम अपना फोकस काँग्रेस-वामपंथ के जातिवाद की बजाय देशद्रोही हरकतों एवं बयानों पर ही रखते हैं. देश की जनता उस घटनाक्रम को भी भूली नहीं है, जिसमें भारत के पश्चिमी इलाके में नौसेना ने पाकिस्तान से आने वाली एक नौका को उड़ा दिया था, जिसमें संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही थीं तथा उस नौका में आतंकवादियों की मौजूदगी की पूरी संभावना थी, क्योंकि वह नौका मछली मारने वाले रूट पर नहीं थी, और ना ही उस नौका ने सुरक्षाबलों को संतोषजनक जवाब दिया था. स्वाभाविक रूप से एक संप्रभु राष्ट्र की सुरक्षा में जो किया जाना चाहिए, वह हमारे सुरक्षाबलों ने किया. कोई और देश होता तो ऐसी संभावित घुसपैठ को रोकने के लिए की गई कार्रवाई की सभी द्वारा प्रशंसा की जाती. लेकिन भारत की महान पार्टी उर्फ “देशविरोधी” काँग्रेस को यह रास नहीं आया. उस नौका को उड़ाते ही काँग्रेस का सनातन पाकिस्तान प्रेम अचानक जागृत हो गया. देश के सुरक्षाबलों की तारीफ़ करने की बजाय सबसे पहले तो काँग्रेस ने यह पूछा कि आखिर पाकिस्तान से आने वाली उस नौका को क्यों उड़ाया? नौसेना और कोस्टगार्ड के पास उनके आतंकवादी होने का क्या सबूत था? सरकार इस नतीजे पर कैसे पहुँची कि उसमें आतंकवादी ही थे? यानी पाकिस्तान सरकार द्वारा सवाल पूछे जाने की बजाय, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ही यह जिम्मेदारी निभाती रही. क्या इसे देशविरोधी कृत्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए? काँग्रेस का यही देशद्रोही रुख दिल्ली के “बाटला हाउस मुठभेड़” के समय भी सामने आया था. सितम्बर 2008 में जबकि केन्द्र और दिल्ली दोनों स्थानों पर काँग्रेस की ही सरकार थी, उस समय दो आतंकियों के मारे जाने एवं मोहनचंद्र शर्मा नामक जाँबाज पुलिस अधिकारी के शहीद होने के बावजूद काँग्रेस की तरफ से कोई कठोर बयान आना तो दूर, हमेशा की तरह राहुल के राजनैतिक गुरु, अर्थात दिग्विजय सिंह मातमपुरसी करने उन आतंकियों के घर अर्थात आजमगढ़ पहुँच गए. मुस्लिमों के वोट लेने के चक्कर में पार्टी ने सीधे-सीधे दिल्ली पुलिस एवं शहीद शर्मा की शहादत पर अपरोक्ष सवाल उठा दिया था. अगला उदाहरण नरेन्द्र मोदी के अमेरिकी वीजा से सम्बन्धित है. भारत जैसे संघ गणराज्य के एक प्रमुख राज्य गुजरात में जनता द्वारा तीन-तीन बार चुने हुए एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री को जब काँग्रेस के ही पोषित NGOs एवं “बुद्धिजीवी गिरोह” के दुष्प्रचार से प्रेरित होकर अमेरिका द्वारा वीज़ा देने से इनकार किया गया उस समय काँग्रेस ने जमकर खुशियाँ मनाई गईं. नरेंद्र मोदी को 2002 के दंगों को लेकर भला-बुरा कहा गया. परन्तु खुद को एक राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली काँग्रेस को इस बात का ख़याल नहीं आया कि मोदी को वीज़ा नहीं देना एक तरह से भारत का ही अपमान है. काँग्रेस अपनी मोदी-घृणा में इतनी अंधी हो गई थी कि उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली भारत की फजीहत का भी अंदाजा नहीं था... फ्रांस के शार्ली हेब्दो अखबार पर हुए जेहादी हमले के समय काँग्रेस का ढुलमुल रुख हो या इसी पार्टी के मणिशंकर अय्यर का हास्यास्पद बयान हो... या फिर सलमान खुर्शीद द्वारा पाकिस्तान जाकर भारत के विरोध में ऊटपटांग बयानबाजी करना हो, काँग्रेस ने कभी भी देशहित और भारत के सम्मान को ऊपर नहीं रखा. इसके अलावा तीस्ता सीतलवाड एवं अरुंधती रॉय जैसे देशविरोधी लोगों के NGOs को प्रश्रय देकर भारत में ही विभिन्न परियोजनाओं में अड़ंगे लगवाना, उन परियोजनाओं की लागत बढ़ाकर उन्हें देरी से पूरा करना यह देशविरोधी कृत्य तो काँग्रेस ने बहुत बार किया है. कहने का मतलब यह है कि नेहरू के जमाने में वीके कृष्ण मेनन से लेकर सोनिया के युग में दिग्विजयसिंह तक काँग्रेस का इतिहास अपने राजनैतिक लाभ के लिए देशविरोधियों को पालने-पोसने एवं समर्थन देने का रहा है. अपने मुस्लिम वोट प्रेम में काँग्रेस इतनी गिर चुकी है कि उसे कश्मीरी पंडितों का दर्द कभी समझ में नहीं आया. घाटी में लगने वाले “यहाँ निजाम-ए-मुस्तफा चलेगा” जैसे नारों को दरकिनार करके काँग्रेस के नेता सरेआम यह बयान देते हैं कि पंडितों के निर्वासन का कारण राज्यपाल जगमोहन थे. “ज़लज़ला आया है कुफ्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गए मैदान में” जैसे जहरीले नारों के बावजूद अपने ही देश में परायों की तरह शरणार्थी बने बैठे पंडितों से काँग्रेस कहती है कि उन्होंने खामख्वाह ही घाटी छोड़ी. ऐसी सोच को क्या कहा जाए? काँग्रेस का देशविरोधी और वामपंथी-मित्रता भरा इतिहास तो हमने देख लिया अब हम आते हैं देश के मनोमस्तिष्क को आंदोलित करने वाले वर्तमान विवाद अर्थात जेएनयू में देशद्रोही नारे लगाने के विवाद पर... एक समय पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षा एवं राजनैतिक बहस का एक प्रमुख केन्द्र हुआ करता था, परन्तु शुरू से ही वामपंथी विचारधारा की पकड़ वाला यह विवि धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है और इसकी विमर्श प्रक्रिया में ह्रास होकर अब यह विशुद्ध हिन्दू विरोधी, हिन्दू परंपरा विरोधी एवं राष्ट्रवादी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का अड्डा भर बनकर रह गया है. जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, जिस समय छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने 76 CRPF जवानों का क़त्ल किया था, उस समय भी JNU में वामपंथी विचारधारा के छात्रों ने जश्न मनाया था. यदि उसी समय काँग्रेस सरकार उन छात्रों पर कोई एक्शन ले लेती तो आज शायद यह नौबत नहीं आती, परन्तु काँग्रेस और वामपंथ के उस अलिखित समझौते के तहत सैन्य बलों के इस अपमान पर इन उद्दंड और देशद्रोही छात्रों को कोई सबक नहीं सिखाया गया और ये छात्र अपने प्रोफेसरों की छत्रछाया में पलते-बढ़ते रहे, अपनी जहरीली विचारधारा का प्रसार विभिन्न कैम्पसों में करते रहे. भारतीय सैन्य बलों के प्रति फैलाई गई यह वामपंथी नफरत बढ़ते-बढ़ते अफज़ल और याकूब प्रेम तक कब पहुँच गई देश को पता ही नहीं चला. इसी जेएनयू में हिन्दू संस्कृति से घृणा करने वाले वामपंथी गुटों की शह पर, कुछ जातिवादी छात्रों के एक गुट ने “महिषासुर दिवस” मनाया, जिसमें हिंदुओं की आराध्य देवी माँ दुर्गा को “वेश्या” कहा गया. जो काँग्रेस पैगम्बर मोहम्मद के अपमान पर ठेठ फ्रांस और जर्मनी तक को उपदेश देने लग जाती है, उसी काँग्रेस ने इस महिषासुर दिवस मामले पर चुप्पी साध ली, क्योंकि काँग्रेस को हमेशा दोनों हाथों में लड्डू चाहिए होते हैं. अतः जिस प्रकार काँग्रेस ने पहले राम जन्मभूमि का ताला खुलवाकर हिंदुओं को खुश करने की कोशिश की, उसी प्रकार शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट को लतियाकर मुस्लिमों को खुश रखने की कोशिश की, भले ही इस्लामी अतिवादियों को शह मिले एवं देश जाए भाड़ में, काँग्रेस को क्या परवाह?? काँग्रेस का यह दोगला रवैया हमेशा सामने आता रहता है, इसीलिए “किस ऑफ लव”, “समलैंगिक विवाह की अनुमति” जैसे छिछोरे कार्यक्रम सरेआम सड़कों पर आयोजित करने वाले जेएनयू के छात्रों के खिलाफ कोई बयान देना तो दूर, काँग्रेस इनके समर्थन में ही लगी रही, और अब जैसे ही छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया को गिरफ्तार किया तो अचानक राहुल बाबा का “लोकतंत्र प्रेम” जागृत हो उठा और वे उन छात्रों के समर्थन में दो घंटे के “सांकेतिक धरने” पर जा बैठे. चूँकि बंगाल में भी विधानसभा चुनाव निकट ही हैं और काँग्रेस भी इस समय सिर्फ 44 सीटों पर सिमटने के बाद एकदम फुर्सत में है इसलिए अब ममता बनर्जी के खिलाफ काँग्रेस और वामपंथ में “नग्न गठबंधन” की तैयारियाँ भी चल रही हैं. लगता है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, अब काँग्रेस ने तय कर लिया है कि वह बुर्के में नहीं छिपेगी बल्कि खुलेआम वामपंथियों का साथ देगी, चाहे इसके लिए उसे देश के सैनिकों का अपमान ही क्यों ना करना पड़े. कुछ दिनों पहले ही कोलकाता में काँग्रेस ने वाम मोर्चा की पार्टियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जेएनयू की घटना के खिलाफ प्रदर्शन किया तथा मोदी सरकार पर तानाशाही, अलोकतांत्रिक वगैरह होने के आरोप लगाए. लेकिन सवाल यह उठता है कि लेनिन-मार्क्स-माओ-स्टालिन एवं पोलपोट जैसे तानाशाहों ने जिस वामपंथी विचारधारा को पाला-पोसा और फैलाया, इस विचारधारा के तहत समूचे विश्व में करोड़ों हत्याएँ कीं, जब उनके भारत स्थित अनुयायी लोकतंत्र और मूल्यों की बात करते हैं बड़ी हँसी आती है. इसी प्रकार जब देश लोकतांत्रिक रूप से मजबूत हो रहा था, उस समय मात्र एक चुनावी हार की खीझ के चलते पूरे भारत पर आपातकाल थोपने वाली काँग्रेस की “आदर्श स्त्री” इंदिरा गाँधी के भक्तगण जब नरेंद्र मोदी पर तानाशाह होने का आरोप लगाते हैं तो सिर पीटने की इच्छा होती है. 1977 से लेकर 2011 तक पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने “आधिकारिक रूप से” 60,000 राजनैतिक विरोधियों की हत्याएं करवाई हैं (अर्थात औसतन पाँच हत्याएँ प्रतिदिन). ऐसा नहीं कि वामपंथियों ने सिर्फ अपने राजनैतिक विरोधियों की हत्याएँ करवाई हों, बल्कि बिना किसी राजनैतिक जुड़ाव वाले समूहों की भी हत्याएँ सिर्फ इसलिए करवाई गईं, क्योंकि वे लोग ज्योति बसु अथवा वामपंथी सरकार की बातों से सहमत नहीं थे. जनवरी 1979 में सुंदरबन के एक टापू पर बांग्लादेश से भागकर आए हिन्दू शरणार्थियों को ज्योति बसु की पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया, चार सप्ताह तक उस टापू को पूरी दुनिया से काट दिया और जब भूख-प्यास से परेशान शरणार्थी भागने लगे तो उन्हें गोलियों से भून दिया गया था. इसी प्रकार मार्च 1970 में सेनबाडी इलाके में कई काँग्रेस समर्थकों की हत्याएँ करवाई गईं तथा खून उनकी विधवा के माथे पर पोता गया जिसके कारण वह पागल हो गई. जबकि अप्रैल 1982 में आनंदमार्गी सन्यासियों एवं साध्वियों को वामपंथियों ने पीट-पीटकर मार डाला था. केरल में भी पिछले दो वर्षों के दौरान RSS के दो सौ स्वयंसेवकों की हत्याएँ वामपंथियों द्वारा हुई हैं, फिर भी इन्हें JNU के देशद्रोही नारे लगाने वाले वामपंथी छात्र मासूम, और नरेंद्र मोदी तानाशाह नज़र आते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि जिनका खुद का इतिहास हत्याओं, तानाशाही और लोकतंत्र की गर्दन मरोड़ने का रहा हो, उस पार्टी के युवराज अपनी देशद्रोही हरकतों को छिपाने के लिए JNU में जाकर लोकतंत्र का नारा लगा रहे हैं और यह सोच रहे हैं कि जनता बेवकूफ बन जाएगी, अथवा इनके पापों को भारत भूल जाएगा? क्या राहुल गाँधी भूल चुके हैं कि उनकी दादी ने आपातकाल के इक्कीस महीनों के दौआर्ण सैकड़ों कलाकारों, नाट्यकर्मियों, निर्दोष संघ स्वयंसेवकों, विपक्षी नेताओं और पत्रकारों को बिना कारण जेल में ठूँस दिया था? और उस समय जेएनयू के छात्रों की प्रिय पार्टी भाकपा, इंदिरा गाँधी की तारीफें कर रही थी, और जेएनयू के देशद्रोही छात्रों के समर्थन में खड़े बेशर्म प्रोफेसरों को शायद यह याद नहीं कि उनके प्रियपात्र ज्योति बसु और बुद्धदेब भट्टाचार्य ने बंगाल में कितनी क्रूर हत्याएँ करवाई हैं. परन्तु जैसा कि ऊपर कहा गया कि काँग्रेस और वामपंथी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, इनमें आपसे में एक अलिखित समझौता रहा है जिसके अनुसार ये दोनों एक दूसरे के “काले कारनामों” में दखल नहीं देते. काँग्रेसी देशद्रोह को पूरी तरह से नंगा करने वाला एक और सच हाल ही में दुनिया के सामने आया है, जिसमें 26/11 के मुम्बई धमाकों के प्रमुख मास्टरमाइंड डेविड हेडली ने अमेरिका की जेल से भारत के न्यायालय में सीधे वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए उस आतंकी हमले की दास्ताँ बयान की है. हेडली ने यह भी बताया कि कौन-कौन इस साज़िश में शामिल था. डेविड हेडली ने हाफ़िज़ सईद और मौलाना मसूद अजहर जैसे “परिचित आतंकियों” के नाम तो लिए ही, परन्तु उसका सबसे अधिक चौंकाने वाला खुलासा यह है कि थाणे जिले के मुम्ब्रा कस्बे की मुस्लिम लड़की इशरत जहाँ, वास्तव में लश्कर-ए-तोईबा की सुसाईड बोम्बर थी. इशरत जहाँ अपने तीन साथियों अर्थात प्राणेश पिल्लई (उर्फ जावेद गुलाम शेख), अमजद अली राणा और जीशान जौहर के साथ नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से अहमदाबाद आई थी, जहाँ ATS पुलिस के दस्ते ने सूचना मिलने पर उन्हें मार गिराया. डेविड हेडली ने यही बयान अमेरिका में भी दिया है और फिलहाल उसे वहाँ के कानूनों के मुताबिक़ पैंतीस वर्ष की जेल हुई है. अब तक तो पाठक समझ ही गए होंगे कि नरेंद्र मोदी से भीषण घृणा करने वाली काँग्रेस, वामपंथी तथा अन्य पार्टियों के सेकुलर नेताओं ने भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह को फँसाने के लिए लगातार कई वर्षों तक झूठ बोला कि इशरत जहाँ मासूम लड़की थी और यह एनकाउंटर अमित शाह ने जानबूझकर करवाया है, उन सभी का मुँह काला हो गया. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो इशरत जहाँ को “बिहार की बेटी” बनाए घूम रहे थे, जबकि काँग्रेस के सहयोगी शरद पवार की पार्टी ने एक कदम आगे बढ़कर “शहीद इशरत जहाँ” के नाम पर एम्बुलेंस सेवा भी आरम्भ करवा दी थी. अपने देश के सुरक्षाबलों, ख़ुफ़िया एजेंसियों एवं आतंकवाद विरोधी दस्तों की बात पर भरोसा नहीं करते हुए, मुस्लिम वोटों के लिए पतन की निचली सीमा तक गिर जाने वाली काँग्रेस को देशद्रोही ना कहें तो क्या कहें? इशरत जहाँ पर हुए खुलासे के बावजूद अभी तक ना तो काँग्रेस की तरफ से, ना ही नीतीश कुमार की तरफ से और ना ही जितेन्द्र आव्हाड़ की तरफ से माफीनामा आना तो दूर कोई शर्मयुक्त बयान तक नहीं आया. काँग्रेस इतने पर ही नहीं रुकी, प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार यूपीए सरकार को भी 2012 में ही ख़ुफ़िया एजेंसियों से इनपुट मिल चुका था कि इशरत जहाँ एक आतंकी है, लेकिन उसने जानबूझकर अमित शाह और मोदी को फँसाने के चक्कर में उस रिपोर्ट को दबा दिया था. NIA के अफसरों ने अमेरिका में हेडली से पूछताछ की थी उसकी रिपोर्ट पहले सुशीलकुमार शिंदे ने और फिर चिदंबरम ने अपने पास दबाकर रखी और फिर यह मामला देख रहे जोइंट डायरेक्टर एवं ईमानदार वरिष्ठ अधिकारी लोकनाथ बेहरा को प्रताड़ित करके ट्रान्सफर कर दिया. इशरत जहाँ जैसी आतंकी के पक्ष में मोमबती लेकर मार्च करने वाले वामपंथी छात्र उस बेशर्मी को भूलकर, अब JNU में उमर खालिद और कन्हैया को बचाने में लगे हैं. भोंदू किस्म के राहुल बाबा और वामपंथी बुद्धिजीवियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि इशरत जहाँ के साथ जो तीन घोषित और साबित आतंकी थे, वे वहाँ क्या कर रहे थे? ये तीनों इशरत के साथ क्यों थे? इशरत मुम्ब्रा से अहमदाबाद कैसे पहुँची? इन सब सवालों के जवाब हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास हैं, अब तो इनके जवाब भी जनता तक पहुँच चुके हैं, परन्तु देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करते काँग्रेस और वामपंथियों को अपनी नरेंद्र मोदी घृणा एवं मुस्लिम वोटों के लालच में कुछ दिखाई नहीं दे रहा. वामपंथी तो खैर भारत के लोकतंत्र से चिढ़ते ही हैं और मजबूरी में ही उन्हें यहाँ की व्यवस्था के अनुसार चलना पड़ता है. इसीलिए गाहे-बगाहे उनकी यह भावना उफन-उफन कर आती है, चाहे वह नक्सलवाद के समर्थन में हो या अफज़ल गूरू के समर्थन में हो अथवा तमिलनाडु के अलगाववादियों के पक्ष में बयानबाजी हो. भारत के दिल अर्थात दिल्ली के बीचोंबीच स्थित जवाहरलाल नेहरू विवि वामपंथ का गढ़ माना जाता है और यहाँ बीच-बीच में इस प्रकार के देशविरोधी आयोजन होते रहते हैं. जब भारत के संविधान में धारा 19(1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया हुआ है तो बाबासाहब आंबेडकर ने उसके साथ कुछ शर्तें भी लगाई हुई हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं लोकतांत्रिक अधिकारों का अर्थ यह नहीं होता कि नागरिक अपने ही देश की सेना के खिलाफ जहरीली भाषा बोलें, या अपने ही देश के टुकड़े करने की बात करें, नारेबाजी करें, भाषण और नाटक लिखें. किसी मित्र देश का अपमान अथवा किसी शत्रु देश की तरफदारी करना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में नहीं आता. जब आपको कोई अधिकार दिए जाते हैं तो आपसे जिम्मेदारी की भी उम्मीद की जाती है, परन्तु वामपंथियों और कांग्रेसियों में उनके “अनुवांशिक गुणों” के कारण यह भावना है ही नहीं. कुछ उदाहरण इसकी गवाही देते हैं, जैसे 2013 में ही JNU में अफज़ल गूरू को सरेआम श्रद्धांजलि दी गई थी और उसे शहीद घोषित करते हुए, उसकी फाँसी को “न्यायिक हत्या” के रूप में चित्रित किया गया... यदि उस समय केन्द्र में सत्तारूढ़ यूपीए (अर्थात काँग्रेस) ने इन वामपंथियों पर लगाम लगाई होती तो आज यह दिन ना देखना पड़ता. उसी वर्ष JNU का एक छात्र हेम मिश्रा को महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित गढ़चिरोली जिले के घने जंगलों से रंगे हाथों पकड़ा था. सूत्रों के अनुसार हेम मिश्रा नक्सलियों के कोरियर के रूप में काम कर रहा था, परन्तु महाराष्ट्र और केन्द्र की काँग्रेस सरकारों ने चुप्पी साधे रखी. 26 जनवरी 2014 को भी JNU के कतिपय “छात्रों(??) ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित फ़ूड फेस्टिवल में जानबूझकर फिलीस्तीन, तिब्बत और कश्मीरी खाद्य पदार्थों के स्टॉल लगाए, ताकि दुनिया को सन्देश दिया जा सके कि फिलीस्तीन के साथ-साथ कश्मीर भी “अलग” और “स्वायत्त” है, भारत का हिस्सा नहीं है. ABVP ने विरोध जताया, लेकिन तत्कालीन काँग्रेस सरकार ने तब भी कुछ नहीं किया. भारत के मिसाईल मैन अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि और मुम्बई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फाँसी की दिनाँक एक ही हफ्ते के भीतर आती है. नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद 2015 में JNU के छात्रों ने एक बार पुनः भारत को लज्जित करते हुए एक सच्चे और देशभक्त मुसलमान अब्दुल कलाम को श्रध्दांजलि देने की बजाय याकूब मेमन को हीरो की तरह पेश किया. इसी से पता चलता है कि JNU में वामपंथ ने कैसी मानसिक सड़ांध भर दी है, और किस तरह पिछले साठ वर्ष में काँग्रेस ने इसे पाला-पोसा है. 1996 में ही तत्कालीन कुलपति ने रिपोर्ट दे दी थी कि JNU में पाकिस्तानी एजेंट वामपंथियों के साथ मिलकर देशविरोधी गतिविधियाँ चला रहे हैं, परन्तु काँग्रेस को तो इस मामले पर ध्यान देना ही नहीं था, सो नहीं दिया गया, नतीजा सामने है. (भगवान राम का पुतला जलाने संबंधी JNU छात्रों का विवाद) फिर भी जब JNU में स्पष्ट रूप देशद्रोह से भरे हुई नारे लगते हैं कि, “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्ला इंशा अल्ला...” अथवा “भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी, जंग रहेगी...”, “तुम कितने अफज़ल मारोगे, घर-घर अफज़ल निकलेगा...” तब भी बेशर्म वामपंथी-सेकुलर एवं काँग्रेसी इन दूषित छात्रों के बचाव में उतर आते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जब JNU के ये तथाकथित छात्र नारे लगाते हैं कि “अफज़ल तेरा सपना अधूरा.. मिलकर करेंगे हम पूरा...” तो वे किस सपने की बात कर रहे हैं?? संसद पर हुए एक असफल हमले की? तो क्या राहुल गाँधी और तमाम वामपंथी नेता यह चाहते हैं, कि अगली बार जब संसद पर हमला हो, तो वह सफल हो जाए?? काँग्रेस की मुस्लिम वोट बैंक राजनीति का काला इतिहास, वामपंथियों से उनकी जुगलबंदी व समझौते तथा वामपंथ की देशद्रोही सोच को देखते हुए राहुल गाँधी का तत्काल JNU पहुँचना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता... लेकिन देश को युवराज के इस “स्टंट” की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी यह निश्चित है.

Posted on: 7 March 2016 | 2:33 am

Liberal Intolerance : The Real Face

वास्तविक असहिष्णुता (यह लेख श्री बी. जयमोहन जी के सौजन्य से) ‘सत्ता’ का असली अर्थ मुझे तब समझ में आया जब दिल्ली में मुझे 1994 में “संस्कृति सम्मान” पुरस्कार मिला .वहां स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में मैं दो दिनों तक रुका था.वैसे भी सूचना और संस्कृति मंत्रालयों से मेरा जुडाव तो था ही ,परन्तु इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) वो जगह है जहाँ 'सत्ता' सोने की चमकती थालियों में परोसी जाती है. इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) एक शांत, और भव्य बंगले में स्थित है जिसमे हरे भरे लॉन , उच्च स्तरीय खाने और पीने की चीजों के साथ शांति से घूमते हुए वेटर हैं , ऊपर वाले होंठो को बगैर पूरा खोले ही मक्खन की तरह अंग्रेजी बोलने वाले लोग हैं , लिपिस्टिक वाले होठों के साथ सौम्यता से बालों को सुलझाती हुई महिलायें हैं, जो बिना शोर किये हाथ हिलाकर या गले मिलकर शानदार स्वागत करते हैं. मैं अब तक कई अच्छे होटलों में रुक चुका हूँ लेकिन IIC जैसी सुविधा मुझे अब तक किसी जगह देखने को नहीं मिली. भारत सरकार द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) की स्थापना एक स्वायत्त संस्था के रूप में स्वच्छन्द विचारधारा और संस्कृति के उत्थान के लिए की गयी. और जहाँ तक मेरी याददाश्त ठीक है तो मुझे याद हैं की मैं उस शाम डॉ कर्ण सिंह से, जो इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) के प्रमुख रह चुके हैं , मिला था. मैंने उन सब बुद्धिजीवियों को वहां देखा जिनके बारे में मैं अंग्रेजी साहित्य और पत्रिकाओं के माध्यम से जानता था. यू.आर.अनंतमूर्ति वहां पिछले चार सालो से एक स्थायी स्तम्भ की तरह जमे हुए थे. गिरीश कर्नाड वहां कुछ दिनों से रह रहे थे. प्रितीश नंदी, मकरंद परांजपे , शोभा डे जैसे जाने कितने लेखक ,पत्रकार और विचारक IIC के कोने कोने में दिख रहे थे. ये सच है की उस दिन मैं बिलकुल ही अभिभूत था . गिरीश कर्नाड को देखते ही मेरी अर्धांगिनी अरुनमोझी दौड़ के उनके पास गयीं थीं और उनको अपना परिचय दिया था .मुझे पता चला कि नेहरू परिवार की वंशज नयनतारा सहगल यहाँ प्रतिदिन “ड्रिंक करने” के लिए आया करतीं थीं. मैंने उस दिन भी उन्हें देखा था .साथ ही मुझे ये भी महसूस हुआ कि राजदीप सरदेसाई और अनामिका हक्सर भी , जिन्हें मेरे साथ ही पुरस्कार दिया गया था , वहां रोजाना आने वालों में से ही थे. बंगाली कुर्ता और कोल्हापुरी चप्पलें पहने हुए इन लोगों की आँखों पर छोटे छोटे शीशे वाले चश्मे थे .सफ़ेद बालों और खादी साड़ियों में लिपटी महिलाओ में से एक की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने बताया था कि ये कपिला वात्स्यायन हैं .उन्होंने ये भी बताया था कि पुपुल जयकर भी आयेंगी. जिधर भी मुड़ो वहां बस साहित्यिक बाते और कला से सम्बंधित वार्तालाप ही नजर आ रहे थे. इस जलसे से मुझे थोड़ी सिहरन सी होने लगी थी, वहां की अत्याधुनिक बुद्धिजीविता के दर्शन ने मुझे अलग थलग सा कर दिया .वेंकट स्वामीनाथन जिनसे उसके अगले दिन मुलाकात हुई थी उन्होंने मेरी बेचैनी के भाव को भांप लिया. उन्होंने कहा –“ इस भीड़ का तीन चौथाई भाग महज कौवों का झुण्ड है. विभिन्न “पॉवर सेंटर्स “ के पैरों तले रहकर ये अपना जीवन निर्वाह करते हैं. इसमें से ज्यादातर लोग सिर्फ सत्ता के दलाल हैं. बड़ी कोशिश से इतने सारे लोंगों में से सम्मान और आदर के लायक सिर्फ एक या दो लोग ही मिलेंगे और ये लोग इस वातावरण को सहन न कर पा सकने की स्थिति में स्वयं कुछ देर बाद यहाँ से निकल लेंगे." लेकिन ये वो लोग हैं हैं जो हमारे देश की संस्कृति का निर्धारण करते हैं .एक निश्चित शब्दजाल का प्रयोग करते हुए ये किसी भी विषय पर रंगीन अंग्रेजी में घंटे भर तो बोलते हैं परन्तु इकसाठवें मिनट में ही इनका रंग फीका पड़ना शुरू हो जाता है. वास्तव में ये किसी चीज के बारे में कुछ नहीं जानते”. वेंकट स्वामीनाथन ने कहा. “ सेवा संस्थानों और सांस्कृतिक संस्थानों के नाम इनके पास चार पांच ट्रस्ट होते हैं और ये उसी के सम्मेलनों में भाग लेने के लिए इधर उधर ही हवाई यात्रायें करते रहते हैं. एक बार कोई भी सरकारी सुविधा या आवास मिलने के बाद इन्हें वहां से कभी नहीं हटाया जा सकता .अकेले दिल्ली में करीब पांच हज़ार बंगलो पर इनके अवैध कब्जे हैं.और दिल्ली में ही इनकी तरह एक और पॉवर सेण्टर JNU भी है. वहां की भी कहानी यही है.” तो सरकार खुद इन्हें हटाती क्यों नहीं ? मैंने कहा. उन्होंने कहा “पहली बात तो सरकार इस बारे में सोचती ही नहीं .क्योंकि नेहरू के ज़माने से ही ये लोग इससे चिपके हुए हैं .ये लोग एक दुसरे का सपोर्ट करते हैं.अगर कभी किसी आईएएस अधिकारी ने इन्हें हटाने की कोशिश भी की तो ये सत्ताधारी लोगों के पैर पकड लेते हैं और बच जाते हैं”. “इसके अलावा एक और बात है” . वेंकट स्वामीनाथन ने कहा. “ये महज एक परजीवी ही नहीं हैं अपितु स्वयं को प्रगतिशील वामंथी कहकर अपनी शक्ति का निर्धारण करते हैं “ आपने देखा कि नहीं ? “हाँ”- मैंने आश्चर्य चकित होते हुए कहा.“दुनिया भर में विभिन्न प्रकार के सेमिनार में उपस्थित होने के कारण ये दुनिया भर में जाने जाते हैं .ये बहुत ही अच्छे तरीके से एक दूसरे के साथ बंधे हुए हैं .दुनिया भर के पत्रकार भारत में कुछ भी होने पर इनकी राय मांगते हैं .इन्ही लोगों ने ही कांग्रेस को एक वामपंथी आवरण दे रखा है, उस हिसाब से अगर आप देखते है तो इन पर खर्च की गयी ये धनराशि तो बहुत ही कम है.”उन्होंने कहा. “ये लोग सरकार के सिर पर बैठे हुए जोकर की तरह हैं और कोई भी इनका कुछ नहीं कर सकता. और ये भारत की कला , संस्कृति और सोच का निर्धारण करते हैं.” मैं अपने मलयालम पत्रकार मित्रों के साथ अकसर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में रहा हूँ .उनके लिए लिए IIC अफवाहों को उठाकर “न्यूज” में बदल देने वाली जगह है. इसमें कोई रहस्य नहीं कि शाम ढलते ही इनके अन्दर अल्कोहल इनके सर चढ़कर बोलता है. लेकिन मुझे उन लोगों पर दया आती है जो इन “बुद्धिजीवियों” द्वारा किसी अंग्रेजी अखबार के बीच वाले पेज पर परोसे गए “ ज्ञान के रत्नों” पर हुई राजनैतिक बहस में भागीदारी करते हैं.इन बुद्धिजीवियों को वास्तव में वास्तविक राजनीति का जरा भी ज्ञान नहीं होता . ये बस अपने उथले ज्ञान के आधार पर जरुरत से ज्यादा चिल्लाते हैं और अपने नेटवर्क द्वारा प्रदत्त स्थान में मुद्दे उठाते हैं. बस. इनके बारे में लिखते हुए जब मैंने ये कहा कि बरखा दत्त और कोई नहीं बल्कि एक दलाल है सत्ता की,  तो मेरे अपने ही मित्र मुझसे एक “प्रगतिशील योद्धा” की छवि आहत करने को लेकर झगड़ बैठे. पर मेरा सौभाग्य था की कुछ दिन के अन्दर ही बरखा दत्त की टाटा के साथ की गयी दलाली नीरा रडिया टेप के लीक होने पर प्रकाश में आई(इस केस का क्या हुआ .क्या किसी को पता है?). ऐसे भीषण खुलासे भी बरखा दत्त को उसके पद से एक महीने के लिए भी नहीं हटा सके .ये स्तर है इनकी शक्ति का. लेकिन अब , स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार किसी ने इस चक्रव्यूह को तोड़ने की हिमाकत की है .चेतावनियाँ पिछले छह महीने से ही इन्हें दी जाती रही है. पिछले हफ्ते सांस्क्रतिक मंत्रालय ने इन्हें नोटिस भेजने का निश्चय किया.इन बुद्धिजीवियों द्वारा “असहिष्णुता” की आग फैलाने का कारण यही है शायद. उदाहरण के लिए पेंटर जतिन दास, जो कि बॉलीवुड एक्टर नंदिता दास के पिता हैं ,इन्होने पिछले कई सालों से दिल्ली की जानी मानी एरिया में एक सरकारी बंगले पर कब्ज़ा कर रखा है.सरकार ने उन्हें बंगले को खाली करने का नोटिस दे दिया .यही कारण हैं कि नंदिता दास लगातार अंग्रेजी चैनलों पर असहिष्णुता के ऊपर बयानबाजी कर रही है और अंग्रेजी अखबारों (जो कि इन लोगों के नेटवर्क द्वारा ही पोषित है ) में कॉलम लिख रही हैं . मोदी जैसे एक मजबूत आदमी ने भी मुझे लगता है कि इनकी दुखती नस पर हाथ रख दिया है. ये तथाकथित बुद्धिजीवी बेहद शक्तिशाली तत्व हैं.मीडिया के द्वारा ये भारत को नष्ट कर सकते हैं .ये पूरी दुनिया की नजर में ये ऐसा दिखा सकते हैं कि जैसे भारत में खून की नदियाँ बह रही हों .ये विश्व के बिजनेसमैन लॉबी को भारत में निवेश करने से रोक सकते हैं.पर्यटन इंडस्ट्री को बर्बाद कर सकते हैं .सच्चाई ये है कि इनके जैसी भारत में कोई दूसरी शक्ति ही नहीं हैं .भारत के लिए इनको सहन करना अनिवार्य है. और इनके प्रति मोदी जी की असहिशुणता बेहद खतरनाक है ..सिर्फ उनके लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए भी.====================टीप :- नागरकोविल के रहने वाले बी. जयमोहन जी एक जाने माने साहित्य समालोचक, समकालीन तमिल और मलयालम साहित्य के बेहद प्रभावशाली लेखकों में से एक हैं. “असहिष्णुता” पर लिखे उनके एक लेख का ये हिन्दी अनुवाद है.

Posted on: 28 January 2016 | 10:19 pm

Fake Dalit Concerns by Muslims

मुस्लिमों का नकली दलित प्रेम... हाल ही में हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र रोहित वेमुला को गुंडागर्दी एवं देशद्रोही हरकतों के लिए विश्वविद्यालय से निकाला गया था, जिसके बाद उसने आत्महत्या कर ली और इस मामले को भारत के गैर-जिम्मेदार मीडिया ने जबरदस्त तूल देते हुए इस मुद्दे को दलित बनाम गैर-दलित बना दिया. हालाँकि रोहित वेमुला की जातिगत पहचान अभी भी संदेह और जाँच के घेरे में है, लेकिन भारत के अवार्ड लौटाऊ नकली बुद्धिजीवियों ने देश को तोड़ने वाली ताकतों के साथ मिलकर इस मुद्दे पर जमकर वैचारिक दुर्गन्ध मचाई. दिल्ली में रोज़ाना ठण्ड से दस व्यक्तियों की मौत होती है, लेकिन केजरीवाल साहब को गरीबों की सुध लेने की बजाय सुदूर हैदराबाद जाना जरूरी लगा, इस प्रकार सभी “गिद्धों” ने रोहित की लाश पर अपना-अपना भोज किया. रोहित वेमुला की मृत्यु के पश्चात देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा सोशल मीडिया पर एक विशेष “ट्रेण्ड” देखने को मिला, जिसमें देखा गया कि स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन तथा ईसाईयों के कुछ संगठन अपने “घडियाली आँसू” बहाते नज़र आए. सोशल मीडिया में कई चित्रों, पोस्ट्स एवं कमेंट्स में मुस्लिमों का दलित प्रेम उफन-उफन कर बह रहा था. हाल ही में केन्द्र सरकार ने देश के दो प्रमुख इस्लामिक विश्वविद्यालयों अर्थात अलीगढ़ मुस्लिम विवि तथा जामिया मिलिया इस्लामिया विवि को कारण बताओं नोटिस जारी करके पूछा है कि, क्यों ना इनका “अल्पसंख्यक संस्था” वाला दर्जा समाप्त कर दिया जाए?? केन्द्र सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया है कि स्वयं को अल्पसंख्यक संस्थान कहलाने वाले ये दोनों विश्वविद्यालय, क़ानून और नियमों की आड़ लेकर अपने यहाँ दलितों को आरक्षण की सुविधा नहीं देते हैं. जैसा कि सभी को पता है, “अल्पसंख्यक संस्थानों” में दलितों को आरक्षण नहीं मिलता है, बल्कि अलीगढ़ या जामिया में 50% सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित हैं, जबकि बची हुई पचास प्रतिशत “सभी के लिए ओपन” हैं, ऐसे में दलितों को इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश ही नहीं मिल पाता. मुस्लिमों द्वारा दलितों के प्रति प्रेम की झूठी नौटंकी को उजागर करने तथा दलितों के साथ होने वाले इस अन्याय को रोकने के लिए केन्द्र सरकार अब उच्चतम न्यायालय के जरिये इन दोनों विश्वविद्यालयों का अल्पसंख्यक दर्जा छीनने जा रही है. एक दलित केन्द्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि दलितों के साथ यह भेदभाव हम नहीं चलने देंगे, जब देश के सभी विश्वविद्यालयों में दलितों को संविधान के अनुसार आरक्षण दिया जाता है तो अलीगढ़ और जामिया में भी मिलना चाहिए. चूँकि इन दोनों विश्वविद्यालयों का “अल्पसंख्यक संस्थान दर्जा” असंवैधानिक है, इसलिए सरकार न्यायालय के जरिए ऐसे सभी अल्पसंख्यक संस्थानों में दलितों को आरक्षण दिलवाने के लिए कटिबद्ध है. उल्लेखनीय है कि दलितों की हितचिन्तक कही जाने वाली सभी राजनैतिक पार्टियों ने इन दोनों विश्वविद्यालयों के इस ज्वलंत मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है. जब यूपीए-२ की सरकार थी, तब भी 2006 से लेकर अब तक मनमोहन-सोनिया सरकार ने अपने वोट बैंक संतुलन की खातिर असंवैधानिक होने के बावजूद ना तो दलितों को न्याय दिलवाया, और ना ही इन दोनों विश्वविद्यालयों की यथास्थिति के साथ कोई छेड़खानी की. 2011 में भी काँग्रेस की केन्द्र सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुप्पी साधे रखी और मामले को टाल दिया. वास्तव में इतिहास इस प्रकार है कि, मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज (जिसे 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विवि में बदल दिया गया था) भारत के उच्चतम न्यायालय ने 1967 में ही एक निर्णय में कह दिया था कि इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता. लेकिन उस समय दलितों के मुकाबले मुसलमानों का वोट बैंक अधिक मजबूत होने की वजह से इंदिरा गाँधी ने जस्टिस अज़ीज़ बाशा के इस निर्णय को मानने से इनकार कर दिया तथा संसद के द्वारा क़ानून में ही बदलाव करवा दिया ताकि इन संस्थानों का अल्पसंख्यक स्तर बरकरार रहे. इस निर्णय को चुनौती दी गई और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2006 में इस प्रावधान को हटाने के निर्देश दिए, जिसे मनमोहन सरकार ने ठंडे बस्ते में डाले रखा. अब सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से पूछा है कि इन दोनों विश्वविद्यालयों के प्रति उनकी सरकार का मत है. इस पर केन्द्र सरकार ने लिखित में कह दिया है कि “चूँकि इन संस्थानों की स्थापनों सिर्फ मुस्लिमों ने, मुस्लिमों के लिए नहीं की है तथा जामिया एवं अलीगढ़ दोनों ही विश्वविद्यालय केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं इसलिए 1967 के उस फैसले के अनुसार इन्हें अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान नहीं किया जा सकता और इन संस्थानों को दलित छात्रों को एडमिशन देना ही होगा”. यहाँ तक कि काँग्रेस के दो पूर्ववर्ती शिक्षा मंत्रियों एमसी छागला और नूरुल हसन ने भी अलीगढ़ मुस्लिम विवि को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय के दर्जे का विरोध किया था (हालाँकि इंदिरा गाँधी की तानाशाही के आगे उनकी एक न चली). विपक्षी पार्टियों का “नकली दलित प्रेम” एक झटके में उस समय उजागर हो गया, जब आठ विपक्षी दलों ने केन्द्र सरकार के इस निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि वे इस निर्णय के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाएंगे तथा राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपेंगे. यानी कल तक जो विपक्षी पार्टियाँ दलितों पर अत्याचार और अन्याय के खिलाफ चिल्ला रही थीं, उन्हें अब अचानक अल्पसंख्यक वोटों का ख़याल आने लगा है. और मुसलमानों का तो कहना ही क्या? खुद इस्लाम में तमाम तरह की ऊँच-नीच और जाति प्रथा होने के बावजूद अपना घर सुधारने की बजाय, उन्हें हिन्दू दलितों की “नकली चिंता” अधिक सताती है. विभिन्न फोरमों एवं सोशल मीडिया में असली-नकली नामों तथा वामपंथी बुद्धिजीवियों के फेंके हुए बौद्धिक टुकड़ों के सहारे ये मुस्लिम बुद्धिजीवी हिंदुओं में दरार बढ़ाने की लगातार कोशिश करते रहते हैं. जबकि इनके खुद के संस्थानों में इन्होंने दलितों के लिए दरवाजे बन्द कर रखे हैं. पिछली सरकारों के दौरान तमाम मुस्लिम सांसदों के लिखित भाषणों की प्रतियाँ भी एकत्रित की जा रही हैं, जिनमें उन्होंने देश के सेकुलर ढाँचे को देखते हुए इन विश्वविद्यालयों के अल्पसंख्यक दर्जे का विरोध किया था. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई चार अप्रैल को होने जा रही है, जिसमें मानव संसाधन मंत्रालय अपना लिखित जवाब प्रस्तुत करेगा और माननीय न्यायालय से अनुरोध करेगा कि इन दोनों विश्वविद्यालयों का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करके दलित छात्रों को भी इसमें समुचित आरक्षण दिलवाया जाए. इस कदम से “मुस्लिमों का नकली दलित प्रेम” तो उजागर होगा ही, विपक्षी “कथित सेकुलर” राजनैतिक पार्टियों का मुखौटा भी टूट कर गिर पड़ेगा, क्योंकि यदि वे केन्द्र सरकार के इस निर्णय का विरोध करती हैं तो उनका भी “दलित प्रेम” सामने आ जाएगा, और यदि समर्थन करती हैं तो उन्हें मुस्लिम वोट बैंक खोने का खतरा रहेगा. कुल मिलाकर वामपंथी-सेकुलर बुद्धिजीवियों तथा दलितों के नकली प्रेमियों के सामने साँप-छछूंदर की स्थिति पैदा हो गई है. बहरहाल, रोहित वेमुला की लाश पर रोटी सेंकने वाले सोच में पड़ गए हैं, क्योंकि शुरुआत अलीगढ़ और जामिया विवि से हुई है और यह आगे किन-किन संस्थानों तक जाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता. एक बात तो निश्चित है कि इन “तथाकथित अल्पसंख्यक” संस्थानों में, दलितों को प्रवेश दिलवाने के मामले में मोदी सरकार गंभीर नज़र आती है.रही बात काँग्रेस की, तो रोहित वेमुला की मौत पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने को बेताब यह पार्टी शुरू से ही दलित विरोधी रही है... फिर चाहे बाबा साहेब आंबेडकर को मृत्यु के 34 वर्ष बाद भारत रत्न का सम्मान देने वाली बात हो, या फिर एक दलित पार्टी अध्यक्ष सीताराम केसरी की धोती फाड़कर उन्हें काँग्रेस से बाहर फेंकने जैसा मामला हो... इसलिए काँग्रेस के बारे में कुछ लिखना बेकार ही है. वह भी रोहित वेमुला के इस दुखद अवसर को "राजनैतिक गिद्ध" के रूप में ही देखती है. 

Posted on: 24 January 2016 | 10:45 pm

Free Basics Vs Net Neutrality (in Hindi)

फ्री बेसिक्स बनाम नेट न्यूट्रीलिटी... बचपन में आपने जादूगर जैसे उस ठग की कहानी जरूर सुनी होगी, जिसमें एक ठग रोज़ाना गाँव में आता और छोटे-छोटे बच्चों को टॉफी-बिस्किट देकर लुभाता था. धीरे-धीरे गाँव के सभी बच्चों को टॉफी` खाने की लत लग गई और वे टॉफी खाए बिना रह नहीं सकते थे, उस मुफ्त बिस्किट के मोहपाश में बंध चुके थे. आगे चलकर उस ठग ने अपना असली रूप दिखाना शुरू किया, और बच्चों तथा उनके माँ-बाप से पैसा ऐंठना शुरू कर दिया. बचपन की यही कहानी लगभग अपने मूल स्वरूप में हमारी पीढ़ी के समक्ष आन खड़ी हुई है. इसमें बच्चे हैं इंटरनेट का उपयोग करने वाले तमाम भारतवासी, टॉफी-बिस्किट हैं अभी तक मुफ्त में मिल रही फेसबुक/गूगल की सुविधा और ठग की भूमिका में हैं फेसबुक के मालिक जुकरबर्ग एवं रिलायंस के मालिक मुकेश अंबानी. ज़ाहिर है कि आरंभिक प्रस्तावना पढ़कर कोई चौंका होगा, कोई घबराया होगा तो करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जो पूरे मामले से बिलकुल ही अनजान हैं. संक्षेप में शुरू करूँ तो बात ऐसी है कि पिछले कुछ माह से देश में एक खामोश क्रान्ति चल रही है, और उस क्रान्ति को दबाने के लिए पूँजीपति भी अपने तमाम हथियार लेकर मैदान में हैं. यह क्रान्ति इसलिए शुरू हुई है, क्योंकि जल-जंगल-जमीन वगैरह पर कब्जे करने के बाद विश्व के बड़े पूंजीपतियों के दिमाग में, विश्व के सबसे सशक्त आविष्कार अर्थात “मुक्त इंटरनेट” पर कब्ज़ा करने का फितूर चढा है. इसकी शुरुआत उस समय हुई जब फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने “रिलायंस जिओ” के साथ गठबंधन और समझौता करके Internet.org नामक संस्था बनाई और यह घोषणा की, कि यह तकनीकी प्लेटफार्म उपभोक्ताओं को मुफ्त इंटरनेट सुविधा देगा. जुकरबर्ग-अंबानी की यह जुगलबंदी देश के दूरदराज इलाकों में ग्रामीणों और किसानों को मुफ्त इंटरनेट सुविधा देगी, ताकि भारत में इंटरनेट का प्रसार बढ़े, उपभोक्ताओं की संख्या बढ़े और देश के सभी क्षेत्र इंटरनेट की पहुँच में आ जाएँ, जिससे ज्ञान और सूचना का प्रसारण अधिकाधिक हो सके. सुनने में तो यह प्रस्ताव बड़ा ही आकर्षक लगता है ना..?? कोई भी व्यक्ति यही सोचेगा कि वाह, जुकरबर्ग और अंबानी कितने परोपकारी हैं और नरेंद्र मोदी के डिजिटल इण्डिया के नारे पर इन्होंने कितनी ईमानदारी से अमल किया है ताकि देश के गरीबों और किसानों को मुफ्त इंटरनेट मिले. परन्तु दुनिया में कभी भी, कुछ भी “मुफ्त” नहीं होता, “मुफ्त” नहीं मिलता यह एक सर्वमान्य सिद्धांत है जो हम भारतवासी अक्सर भूल जाते हैं. जब Internet.org की योजनाओं का गहराई से विवेचन किया गया तब पता चला कि वास्तव में यह योजना “इंटरनेट रूपी टॉफी की लत लगे हुए भारतीयों के लिए” उस ठग का एक मायाजाल ही है. शुरुआत में भारत के इंटरनेट उपभोक्ताओं ने Internet.org की इस योजना को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया, उसे बहुत ही कम समर्थन प्राप्त हुआ. अधिकाँश ने इसकी आलोचना की और इसे “मुफ्त और मुक्त इंटरनेट” तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” पर एक हमला बताया एवं खारिज कर दिया. चूँकि भारत में फोन-मोबाईल और इंटरनेट से सम्बन्धित कोई भी योजना TRAI की मंजूरी के बिना शुरू नहीं की जा सकती और बहुत से बुद्धिजीवियों ने Internet.Org की इस योजना को मंजूरी नहीं देने हेतु TRAI में शिकायत कर डाली और इस कारण इसे तात्कालिक रूप से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. अब जुकरबर्ग-अंबानी की जोड़ी ने नया पैंतरा खेला और इसी संस्था का नाम बदलकर “Free Basics” कर दिया. चूँकि हम भारतवासियों में “मुफ्त” शब्द का बड़ा आकर्षण होता है, इसलिए इस कमज़ोर नस को दबाते हुए इसका नाम Free Basics रखा गया. ऊपर बताया हुआ सिद्धांत, कि “दुनिया में कभी भी, कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता” हम भारत के लोग अक्सर भूल जाते हैं. इसलिए इस बार “Free Basics” के नाम से यह योजना का प्रचार-प्रसार बड़े जोर-शोर से आरम्भ किया गया. फेसबुक पर धडल्ले से इसका समर्थन करने के लिए अपीलें प्रसारित की जाने लगीं, बड़े-बड़े मेट्रो स्टेशनों पर होर्डिंग और बैनर लगाकर इस योजना के कारण “गरीबों, किसानों और छात्रों” को होने वाले फायदों(??) के बारे में बताया जाने लगा. दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) को भरमाने के लिए यह चाल चली गई कि 30 दिसम्बर तक भारत के करोड़ों इंटरनेट उपभोक्ताओं द्वारा ई-मेल करके यह बताया जाना था कि उन्हें “फ्री-बेसिक” चाहिए अथवा “नेट न्यूट्रलिटी”? यदि अधिकाधिक उपभोक्ता “फ्री बेसिक्स” के पक्ष में मतदान करें तो TRAI को इसे मंजूरी दे देनी चाहिए. जो नए पाठक हैं अथवा जो इस गंभीर मुद्दे से अपरिचित हैं, पहले वे “नेट न्यूट्रलिटी” के बारे में संक्षेप में समझ लें. Net Neutrality का अर्थ है पूरी दुनिया में इंटरनेट एकदम तटस्थ और मुक्त रहेगा, इस पर किसी का आधिपत्य नहीं होना चाहिए. Net Neutrality का अर्थ है कि मोबाईल अथवा नेट कनेक्शन के लिए उपभोक्ता ने जितना पैसा दिया वह उस राशि से इंटरनेट पर जो चाहे वह साईट देखे, उतने पैसों में वह मनचाहा डाउनलोड करे. जबकि जुकरबर्ग-अंबानी द्वारा पोषित Free Basics की अवधारणा यह है कि यदि आप रिलायंस का मोबाईल और रिलायंस का नेट कनेक्शन लें तो आपको (उनके द्वारा) कुछ निर्धारित वेबसाइट मुफ्त में देखने को मिलेंगी, लेकिन उन मुफ्त वेबसाईटों के अलावा किसी दूसरी साईट पर जाना हो तो उसका अतिरिक्त पैसा लगेगा. “जुकर-मुकेश” द्वारा खैरात में दी जाने वाली “फ्री-फ्री-फ्री” वेबसाईटों से आप मुफ्त में कुछ भी डाउनलोड कर सकते हैं परन्तु उनके अलावा किसी अन्य वेबसाईट से यदि आप कुछ डाउनलोड करेंगे तो उतनी राशि चुकानी होगी, जितनी अंबानी तय करेंगे. आगे बढ़ने से पहले आप समस्या को ठीक से समझ सकें इसलिए हम दो छोटे-छोटे उदाहरण और देखेंगे. मान लीजिए कि आपको एक निमंत्रण पत्र मिला जिसमें कहा गया कि आप एक सेमीनार में आमंत्रित हैं, जहाँ “मुफ्त भोजन” मिलेगा. जब आप वहाँ पहुँचते हैं तो आप पाते हैं कि सेमिनार तो घटिया था ही, वहां मिलने वाला मुफ्त भोजन भी बेहद खराब, निम्न क्वालिटी का और आपकी पसंद के व्यंजनों का नहीं था. जब आप आयोजकों से इस सम्बन्ध में शिकायत करते हैं तो आपको टका सा जवाब मिलता है कि “मुफ्त” में जो मिल रहा है, वह यही है और यदि आपको अच्छा और पसंदीदा भोजन चाहिए तो पास के महँगे रेस्टोरेंट में चले जाईये, मनमाने दाम चुकाईये और खाईये. जब आप उस रेस्टोरेंट में पहुँचते हैं तो पाते हैं कि वहाँ का भोजन तो अति-उत्तम और सुस्वादु है लेकिन उसके रेट्स बहुत ही गैर-वाजिब और अत्यधिक हैं. जब आप इसकी शिकायत करना चाहते हैं तो पाते हैं कि उस रेस्टोरेंट का मालिक वही व्यक्ति है, जो थोड़ी देर पहले आपको “मुफ्त भोजन” के नाम पर घटिया खाना परोस रहा था. दूसरा उदाहरण डिश टीवी (अथवा टाटा स्काई) के किसी उपभोक्ता से समझा जा सकता है. यदि आपको मुफ्त चैनल देखने हैं तो आपको दूरदर्शन के एंटीना पर जाना होगा, वहाँ आपको कोई मासिक शुल्क नहीं लगेगा और सरकार द्वारा दिखाए जा रहे सभी चैनल आपको मुफ्त में देखने को मिलेंगे. लेकिन यदि आपको विविध मनोरंजन, ख़बरें, नृत्य एवं फ़िल्में देखना चाहते हैं तो आपको निजी कंपनियों की सेवा लेनी पड़ेगी, समाचार देखने हैं तो उसका “पॅकेज” अलग, फ़िल्में देखनी हों तो उसका “पॅकेज” अलग होगा... और उसकी दरें भी मनमानी होंगी उसमें उपभोक्ता का कोई दखल नहीं होगा, वहाँ पर बाज़ार का एक ही सिद्धांत चलेगा कि “जेब में पैसा है तो चुकाओ और मजे लो, वर्ना फूटो यहाँ से...”. फ्री बेसिक्स और नेट न्यूट्रलिटी को लेकर जो खतरनाक शाब्दिक जंग और पैंतरेबाजी चल रही है वह भारत में इंटरनेट की तेजी से बढ़ते उपभोक्ताओं, भारत के युवाओं में ऑन्लाइन के बढ़े आकर्षण के कारण और भी गहरी हो चली है. इंटरनेट के बाजार पर निजी नियंत्रण और “बाजारू” कब्जे के जो गंभीर परिणाम होंगे उन्हें अभी कोई समझ नहीं पा रहा है. Free Basics के खतरे को एक और उदाहरण से समझिए... मान लीजिए कि IIT कोचिंग हेतु कोटा का प्रसिद्ध बंसल इंस्टीट्यूट, बिरला की कम्पनी आईडिया से हाथ मिला लेता है कि जिस बच्चे के पास आईडिया का नेट कनेक्शन होगा, उसे तो बंसल इंस्टीट्यूट की कोचिंग के सभी नोट्स एवं अभ्यास क्रम मिल्कुल मुफ्त में मिलेंगे. यानी अगर आप Idea की सिम और इंटरनेट डाटा पैक के ग्राहक हैं तो आपका बच्चा मुफ्त में बंसल इंस्टीट्यूट के कोचिंग वीडियो और नोट्स प्राप्त कर लेगा, लेकिन यदि आपने रिलायंस अथवा एयरटेल का कनेक्शन लिया है तो वे आपसे भारी शुल्क वसूलेंगे, जबकि उन्होंने भी अपने इंटरनेट डाटा पैक का पैसा पहले ही वसूल कर लिया है. इसी प्रकार यदि आईडिया वाला कोई उपभोक्ता अगर इंटरनेट पर मुफ्त में मिलने वाले संजीव कपूर के खाना-खजाना को देखने की कोशिश करेगा तो उसकी जेब से ज्यादा पैसा काटा जाएगा, क्योंकि हो सकता है कि संजीव कपूर का अनुबंध टाटा के डोकोमो से हो. संक्षेप में कहने का अर्थ यह है कि “फ्री बेसिक्स” के लागू होने के बाद आप किसी कम्पनी के बँधुआ गुलाम बन जाएँगे. वह कम्पनी आपको जो वेबसाईट्स दिखाना चाहती है वही दिखाएगी और चूँकि आप भी एक बार उस कम्पनी का मोबाईल खरीद चुके तथा उसी कम्पनी को आपने इंटरनेट डाटा पैक का भी पैसा दे दिया है, इसलिए आप अधिक पैसा देकर किसी “Paid” वेबसाईट पर भला क्यों जाने लगे? यही तो वह कम्पनी चाहती है कि आप उतना ही सोचें, उतना ही देखें, उतना ही सुनें जितना वह कम्पनी आपको दिखाना-सुनाना-पढ़ाना चाहती है. जबकि इस समय स्थिति बिलकुल उलट है, आज की तारीख में यदि आपने एक बार इंटरनेट डाटा पैक ले लिया अथवा अपने घर में किसी कम्पनी से वाई-फाई कनेक्शन ले लिया तो आप जो मर्जी चाहें, उस वेबसाइट पर जा सकते हैं. आज की तारीख में आप पर ऐसा कोई बंधन नहीं है कि आपको बंसल इंस्टीट्यूट अथवा एलेन इंस्टीट्यूट में से किसी एक का ही चुनाव करना पड़ेगा... फिलहाल आप पर यह बंधन भी नहीं है कि आप तरला दलाल या संजीव कपूर में से किसी एक से ही कुकिंग सीख सकते हैं... चूँकि अभी जुकरबर्ग-अंबानी की चालबाजी सफल नहीं हुई है, इसलिए फिलहाल आप टाईम्स, एक्सप्रेस से लेकर वॉशिंगटन-जर्मनी तक के अपने सभी पसंदीदा अखबार पढ़ सकते हैं, “फ्री-बेसिक्स” लागू होने के बाद संभव है कि रिलायंस के मोबाईल पर आपको सिर्फ दैनिक भास्कर ही पढ़ने को मिले, क्योंकि एक-दो अखबार ही “मुफ्त” में मिलेंगे, बाकी कुछ पढ़ना हो तो पैसा चुकाना पड़ेगा. मान लीजिए जैसे आज फेसबुक और रिलायंस का गठबंधन है, वैसे ही यदि गूगल और एयरटेल का समझौता हो गया तो रिलायंस के नेट कनेक्शन से गूगल पर कोई बात सर्च करना हो तो अतिरिक्त्त पैसा लगेगा, जबकि एयरटेल के कनेक्शन वाले को यदि फेसबुक पर मित्रों से बात करनी है तो वह उसका पैसा लेगा. यानी आपकी स्वतंत्रता खत्म... फ्री-बेसिक्स का विरोध क्यों हो रहा है कुछ समझे आप?? लेकिन समस्या यह है कि भारत में खासे पढ़े-लिखे लोगों को भी “मुफ्त” “फ्री” के नाम पर आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है, इसीलिए लाखों लोगों ने फेसबुक पर चल रहे विज्ञापनों एवं उनके द्वारा आए ई-मेल के झाँसे में आकर बिना सोचे-समझे-पढ़े, “हाँ, मैं फ्री बेसिक्स का समर्थन करता हूँ” कहते हुए TRAI को ई-मेल भी भेज डाला है. अब देखते हैं कि आगे क्या होता है. फ्री-बेसिक्स के विरोधियों अर्थात नेट-न्यूट्रलिटी के समर्थकों का यह तर्क उचित जान पड़ता है कि जब उपभोक्ता ने एक बार इंटरनेट डाटा पैक के पैसे चुका दिए हैं तो उसे यह स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वह “एक-समान स्पीड” से दुनिया की किसी भी वेबसाईट पर जा सके. यदि कंपनियों को इंटरनेट डाटा पैक के दाम बढ़ाने हों तो वे TRAI की अनुमति लेकर बेशक बढ़ाएँ परन्तु एक बार नेट कनेक्शन लेने के बाद उपभोक्ता को किसी टेलिकॉम कम्पनी अथवा किसी वेबसाईट की दादागिरी ना सहनी पड़े कि वह फलाँ चीज ही देखे या फलाँ न्यूज़ ही पढ़े. यही सच्चा लोकतांत्रिक व्यवहार और सिद्धांत है. जबकि फ्री-बेसिक्स के समर्थकों (खासकर मार्क जुकरबर्ग) का कहना है कि यह योजना लागू की जानी चाहिए, ताकि देश में इंटरनेट के उपयोगकर्ता बढ़ें, इस योजना से इंटरनेट की पहुँच गरीबों, किसानों और छात्रों तक सुलभ होगी. रिलायंस का मोबाईल खरीदते ही उपभोक्ता को बिना किसी नेट कनेक्शन के उनके द्वारा निर्धारित कई वेबसाईट्स मुफ्त में देखने को मिलेंगी. जुकरबर्ग का कहना है कि भारत में इसका विरोध क्यों हो रहा है, उन्हें समझ नहीं आता क्योंकि फिलीपींस, मलावी, बांग्लादेश, थाईलैंड और मंगोलिया जैसे कई देशों में “फ्री-बेसिक्स” योजना लागू है. जैसा कि फेसबुक और अंबानी दावा कर रहे हैं कि “फ्री-बेसिक्स” के नाम पर वे यह सब इसलिए कर रहे हैं ताकि देश के गरीबों-किसानों तक इंटरनेट की पहुँच बन सके उन्हें लाभ पहुँचे तो उनके पास फ्री-बेसिक्स के अलावा दूसरे भी विकल्प हैं जिसमें “नेट न्यूट्रलिटी” भी बरक़रार रहेगी और उपभोक्ता की स्वतंत्रता भी. उदाहरणार्थ रिलायंस यह घोषणा कर सकता है कि जो उनका मोबाईल खरीदेगा उसे 100MB तक फेसबुक मुफ्त देखने को मिलेगा. यदि एयरटेल का समझौता गूगल के साथ हो जाता है तो एयरटेल घोषणा कर सकता है कि उनका मोबाईल खरीदने पर अथवा एयरटेल का कनेक्शन लेने पर ग्राहक को 200MB तक का डाटा बहुत तेज गति से लेकिन मुफ्त मिलेगा, परन्तु उसके बाद उसे सामान्य इंटरनेट डाटा पैक शुल्क चुकाना होगा. दूसरा सुझाव यह है कि यदि उन्हें वास्तव में गरीबों की चिंता है तो उन्हें सस्ते एंड्रायड मोबाईल बाज़ार में उतारकर “दस-दस रूपए में 300MB” के छोटे-छोटे रिचार्ज वाउचर निकालने चाहिए ताकि किसान को जितनी जरूरत हो वह उतना ही इंटरनेट उपयोग करे, लेकिन वह दुनिया की कोई भी वेबसाइट खोलकर देख सके, ना कि जुकरबर्ग और अंबानी की पसंद की. बांग्लादेश में मोज़िला कंपनी ने “ग्रामीण-फोन” नामक इंटरनेट सेवा प्रदाता से समझौता किया है, जिसके अनुसार कोई भी उपभोक्ता रोज़ाना 20MB तक का डाटा बिलकुल मुफ्त उपयोग कर सकता है, और बदले में उसे सिर्फ एक विज्ञापन देखना होता है. यदि वाकई में “सेवाभाव” की बात है तो यह नियम भारत में भी लागू किया जा सकता है. जिसे मुफ्त में डाटा चाहिए होगा, पहले वह विज्ञापन देखेगा, इसमें क्या दिक्कत है? एक और उदाहरण अफ्रीका का भी है, जहाँ Orange नामक कम्पनी 37 डॉलर (लगभग 2300 रूपए) का मोबाईल बेचती है, जिस पर उपभोक्ता को प्रतिमाह 500MB का इंटरनेट डाटा मुफ्त मिलता है. अंबानी-बिरला और मित्तल यदि वास्तव में गरीब छात्रों के हितचिन्तक हैं तो उनके लिए यह योजना भी लागू की जा सकती है. लेकिन यह “फ्री-बेसिक्स” की जिद क्यों?? उपभोक्ता उनके द्वारा तय की गई सूची के हिसाब से क्यों देखे-पढ़े-सुने? उसे चुनाव की स्वतंत्रता चाहिए. असल में मार्क जुकरबर्ग को यह समझने और समझाने की जरूरत है कि “फ्री-बेसिक” की अवधारणा भारत में तेजी से पनप रहे “युवा स्टार्ट-अप” के लिए भी खतरनाक है. मान लीजिए कि कोई युवा एक शानदार स्टार्ट-अप कम्पनी खड़ी करता है, उसकी वेबसाईट पर सारी जानकारियाँ देता है, अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए डिजिटल इण्डिया के नारे के तहत तमाम वेबमीडिया का सहारा लेने की कोशिश करता है. लेकिन उसे पता चलता है कि चूँकि एयरटेल ने गूगल के साथ, फेसबुक ने अंबानी के साथ अथवा आईडिया ने किसी और बड़े मगरमच्छ के साथ अपने-अपने गठबंधन एवं समझौते कर लिए हैं तथा वे उनके मोबाईल और नेट कनेक्शन पर “उनकी सूची” के मुताबिक़ फ्री इंटरनेट सेवा दे रहे हैं तो फिर इस नए स्टार्ट-अप कम्पनी की वेबसाईट पर कौन आएगा? कैसे आएगा और क्यों आएगा? यानी एक स्थिति यह भी आएगी कि उस स्टार्ट-अप कम्पनी को रिलायंस अथवा गूगल के सामने गिडगिडाना पड़ेगा कि “हे महानुभावों, मुझ गरीब की इस वेबसाइट को भी अपनी मुफ्त वाली सूची में शामिल कर लो”, हो सकता है कि ये महाकाय कम्पनियाँ उस छोटी स्टार्ट-अप से इसके लिए भी कोई वार्षिक शुल्क लेना शुरू कर दें. और ऐसी किसी भी वेबसाईट के मालिक को यह प्रक्रिया उन सभी गठबंधनों के साथ करनी पड़ेगी जहाँ-जहाँ वह अपनी वेबसाईट मुफ्त में ग्राहकों को दिखाना चाहता है. यदि रिलायंस के मोबाईल पर स्नैपडील की साईट मुफ्त है लेकिन मुझे फ्लिप्कार्ट से सामान खरीदना है तो मुझे अतिरिक्त पैसा चुकाना पड़ेगा, फिर मैं फ्लिप्कार्ट की साईट पर क्यों जाने लगा? यानी अंततः बेचारी फ्लिप्कार्ट को भी मजबूरी में नाक रगड़ते हुए रिलायंस के साथ गठबंधन करना होगा, इसी प्रकार स्नैपडील को एयरटेल से करना पड़ेगा. यानी हमारी पसंद-नापसंद का मालिक कौन हुआ?? ज़ाहिर है कि चंद बड़े उद्योगपति... यानी जुकरबर्ग-अंबानी-मित्तल-बिरला आदि. यह पूर्णतः अलोकतांत्रिक विचार है तथा आपसी मुक्त प्रतिस्पर्धा एवं इंटरनेट के मूल सिद्धांत के खिलाफ है. अब आप खुद सोचिये कि “नौकरी.कॉम” जैसी बड़ी वेबसाईट भला यह क्यों चाहेगी कि उसके बेरोजगार ग्राहकों को फेसबुक अपनी मनमर्जी से चलाए और विभिन्न वेबसाईटों की तरफ Redirect करके उन्हें चूना लगाए? फेसबुक अथवा गूगल की एकाधिकारवादी मानसिकता खुलकर सामने आने लगी है, उनका पेट विज्ञापनों से होने वाली अरबों-खरबों रूपए से भी नहीं भर रहा, इसीलिए अब वे “गिरोह” बनाकर इंटरनेट जैसी शानदार चीज़ पर कब्ज़ा जमाना चाहते हैं ताकि वे अपने हिसाब से उपभोक्ताओं को हाँक सकें. यानी जो ठग शुरू में मुफ्त की चॉकलेट और बिस्किट देकर हमें उसकी लत लगा चुका है, वह अब अपनी कीमत वसूलने पर आ गया दीखता है. 

Posted on: 12 January 2016 | 10:57 pm

Minority Vs Majority Discourse

अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक विमर्श... इस देश में अल्पसंख्यकों (Minorities) और बहुसंख्यकों (Majority) का वैमर्शिक ताना बाना कितना बेमेल और बेडौल हो चुका है उसकी बानगी कभी कभी बहुत साधारण लोगों की बातचीत एक अजनबी के रूप में दूर से पढ़ने सुनने पर प्रतीत मिलती है !! अभी कुछ दिनों पहले मेरे एक मित्र ने एक फोटो फेसबुक पर शेयर किया , कोई मुस्लिम ट्विटर पर ये कह रहा था की हमें हिन्दुओं के प्रति आभार प्रकट करना चाहिए की सैकड़ों सालों के हिन्दुओं के नरसंहार से भरे पड़े नकारात्मक इतिहास के बावजूद उन्होंने हमें अपना लिया , आत्मसात कर लिया और पिछली किसी याद को अपने संबंधों का आधार नहीं बनाया !! इस पोस्ट पर एक ईसाई मोहतरमा आपत्ति दर्ज़ कराने आयीं और कहने लगी की भारत को और सहिष्णु होना होगा , इस पर मेरे मित्र ने कहा की जितनी सहिष्णुता "आपको" यहाँ मिल रही है दुनिया के बड़े बड़े देशों में भी नहीं मिल रही (जैसे कल ट्रम्प की रैली से एक मुस्लिम महिला को हूट कर बाहर खदेड़ दिया गया , और ऐसा हम भारत में कल्पना में भी नहीं कर सकते) !! इस पर उन ईसाई मोहतरमा को बड़ा बुरा लगा और कहने लगी "आपको" नहीं "हम सब को" "तुम्हारा देश" नहीं "हमारा देश" !! इस बहस का मेरा आंकलन यहाँ से शुरू हुआ जो बिन्दुवार प्रस्तुत है 1 . इस देश का कोई भी ईसाई तब आपत्ति दर्ज़ क्यों नहीं कराता जब इनके जॉन दयाल जैसे बड़े बड़े नेता और धर्मगुरु किसी चर्च में छोटी छोटी चोरी की घटनाओं तक पर कहते फिरते हैं की "ईसाई भारत में डर के साये में जी रहे हैं" या की "अल्पसंख्यक" खतरे में हैं" ? तब इन सभी की "भारतीयता" की भावना अपने "ईसाई" होने की भावना के सामने क्यों क्षीण होने लगती है ? तब कानून व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा धार्मिक मुद्दा कैसे बन जाता है ? तब "आपका" और "हमारा" का भेद क्यों खत्म होने लगता है ? 2. कई विचारवान हिन्दू भी अलग अलग विमर्शों में बार बार हिन्दू शब्द का प्रयोग करने की बजाये "भारतीय" शब्द का प्रयोग करने पर जोर देने लगे हैं , पर वे इस बारीक कड़ी को कभी नहीं जोड़ पाते या इस "फाल्ट लाइन" को कभी नहीं समझ पाते जिसके तहत अल्पसंख्यकों का खतरे में होना सीधे सीधे बहुसंख्यकों के प्रति दुर्भावना नहीं तो कम से कम दुष्प्रचार की भावना तो निर्मित करता ही है , जिसके मूल में दूरगामी धर्म परिवर्तन की चेष्टाएँ हमेशा रही ही हैं , कई लोगों को ये समझाना बड़ा दुश्वर होने लगा है की कोई भी "अल्पसंख्यक" समूह अगर डर के साये में जीने का आरोप करता है तो चाहे आप माने या ना माने आरोप सीधे "बहुसंख्यक समूह " पर ही लग रहा है नाकि किसी सरकार पर या किसी विचारधारा पर !! 3. इसलिए इस पूरे विमर्श का सबसे बड़ा पाखंडी संकट तब उत्पन्न हो जाता है जब अल्पसंख्यकों को तो अपने अल्पसंख्यक होने का पूरा अधिकार मिल जाता है , अपने ऊपर हुए किसी भी तथाकथित अपराध को "अल्पसंख्यक" के ऊपर हुए अपराध का दर्जा देने का मौका मिल जाता है जो की अन्यथा (अगर सब भारतीयता की भावना लिए होते तो ) सिर्फ एक कानून व्यव्यस्था का विषय बनता , पर अगर उसी विषय पर बहुसंख्यक अपने बहुसंख्यक होने पर गौरवान्वित हो अपनी अच्छाईयां बताने का अपराध करे (जो की उसका अधिकार है क्योंकि आरोप उस पर लगा है ) तो उसे तुरंत सिर्फ "भारतीय" होने का उलाहना देकर चुप करने की या नीचा दिखाने की कोशिश होती है और यहीं कहीं से शायद शुरू होता है इस देश का "लिबरल बौद्धिक आतंक"!! 4. अपने आस पास देखिये थोड़े अच्छे पढ़े लिखे सर्कल में , आप अपने "हिन्दू" होने की बात करेंगे या उससे जुड़ा कोई मुद्दा उठाएंगे तो उसे सीधे नकरात्मक भाव में ही लिया जायेगा जैसे की हिन्दू का सिर्फ हिन्दू होना ही, ये पहचान स्थापित हो जाना भर ही अल्पसंख़्यकों के साथ उनके सह अस्तित्व को ख़त्म करता है , भारतीयता को खत्म करता है , इसलिए इस "धर्मनिरपेक्ष" मानसिक अवस्था में मुस्लिम शान से मुस्लिम बने रहें , ईसाई शान से ईसाई बने रहें पर हिन्दू सिर्फ भारतीय बने रहें , क्योंकि उनके हिन्दू बन जाने भर से अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं !! 5. आखिरी बात , थोड़ी गहरी है , पर इस विस्तृत मनोवैज्ञानिक कूटनीति को समझिए , हिन्दुओं को सिर्फ और सिर्फ भारतीय बने रहने का ये बहुपक्षीय बहुआयामी दबाव क्यों ? क्योंकि उसके पीछे छिपा वामपंथी बुद्धिजीवियों का ये डर है की हिन्दू पहचान स्थापित हो गयी तो , इतिहास की कलाई भी खुलेगी , उसमे छिपे गौरवान्वित पल भी खुलेंगे , बच्चा बच्चा ये समझने लगेगा की जो आज अपने अल्पसंख्यक होने का दम्भ भर रहे हैं अथवा असुरक्षित होने का रोना रोकर राजनीतिक रूप से संरक्षित हैं उन्हें हज़ारों साल इस देश में किसने पाला ? और सबसे महत्वपूर्ण बात ये की कौन है इस ज़मीन का असली वंशज ? और जब वे ये समझ जायेंगे तो ये पूरी अल्पसंख्यक बहुसंख्यक बहस की जीत किसकी झोली में गिरेगी ये भी समझा जा सकता है !! इसलिए हिन्दुओं को आधुनिक सेक्युलर कोन्वेंटी मदरसों में "सेक्युलर भारतीयता" का पाठ पढ़ाओ और अल्पसंख्यकों को सिर्फ अपनी पहचान में जीने का !! मालिक को किरायेदार सी असुरक्षा दो और किरायेदारों को मालिक सा ढांढस , इसी में सेक्युलरिस्म की सफलता छिपी है !! 6 . तो मेरे लेख के मुताबिक क्या मुस्लिम और ईसाई इस देश में किरायेदार हुए ? नहीं भी और हाँ भी !! अगर हम सब बिना शर्त सिर्फ और सिर्फ भारतीय हैं तो "नहीं" , अगर तुम मुस्लिम हो , तुम ईसाई हो तो "हाँ" , तो मैं हिन्दू हूँ , मकान मालिक हूँ और तुम किरायेदार !! सच्ची भारतीयता तभी स्थापित होगी जब अल्पसंख्यक शब्द पर प्रतिबन्ध लगे , बोलिए है मंजूर ?? ================= साभार :- फेसबुक वॉल गौरव शर्मा (Gaurav Sharma)

Posted on: 10 January 2016 | 6:12 am

Kejriwal and Rajinder Kumar Corruption Case

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे... भारत में चोरों को लेकर तीन कहावतें मशहूर हैं, पहली “चोरी और सीनाजोरी”, अर्थात चोरी करने के बावजूद न सिर्फ बेख़ौफ़ रहना बल्कि दबंगई दिखाना... दूसरी कहावत है “चोर मचाए शोर” अर्थात जब चोर सार्वजनिक रूप से चोरी करता हुआ पकड़ा जाए तो वह भीड़ का ध्यान बँटाने के लिए शोर मचाने लगे, ताकि उसकी चोरी की तरफ कम लोगों का ध्यान जाए... और तीसरी कहावत है “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” यानी जो व्यक्ति चोर हो, वह अपनी चोरी छिपाने के लिए पकड़ने वाले कोतवाल को ही डाँटने लगे... हाल ही में भारतीय राजनीति में ऐसी ही दो प्रमुख घटनाएँ घटित हुईं जहाँ उक्त कहावतें साक्षात चरितार्थ होती दिखाई दीं. पहली घटना है नेशनल हेराल्ड अखबार का मामला और दूसरी घटना है केजरीवाल के प्रमुख सचिव राजेन्दर कुमार के दफ्तर पर सीबीआई का छापा.इन दोनों ही मामलों में देश ने तमाम तरह की नौटंकियाँ, धरने, प्रदर्शन और बयानबाजी देखी-सुनी और पढ़ी. सामान्य तौर पर आम जनता चैनलों पर अंग्रेजी में जारी बकबक को देखती नहीं है, देखती है तो गहराई से समझती नहीं है. इसलिए वास्तव में जनता को पता ही नहीं है कि नेशनल हेरल्ड मामला क्या है और राजिंदर कुमार पर छापों की वास्तविक वजह क्या है? जनता की इसी अज्ञानता का फायदा उठाकर काँग्रेस (यानी सोनिया-राहुल की जोड़ी) ने “पीड़ित-शोषित” कार्ड खेलने की कोशिश की तथा संसद को बंधक बना लिया. वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के युगपुरुष केजरीवाल ने भी इस “पीड़ित-शोषित” गेम (जिसके वे शुरू से ही माहिर रहे हैं) को और विस्तार देते हुए अरुण जेटली को इसमें लपेट लिया, ताकि जनता के मन में उनके “क्रांतिकारी” होने का भ्रम बना रहे. दोनों मामलों के तथ्य एक के बाद एक सामने रखकर देखना ही उचित होगा कि काँग्रेस द्वारा लोकतंत्र को बंधक बनाने, न्यायपालिका के निर्णय पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का जो खेल खेला गया वह कितना खोखला है. चूँकि काँग्रेस तो अब अपने अस्तित्त्व की लड़ाई लड़ रही है, चवालीस सांसदों के होते हुए भी उसमें अभी तक जिम्मेदार विपक्ष का कोई गुण नहीं आया है इसलिए काँग्रेस-सोनिया और नेशनल हेरल्ड की बात बाद में करेंगे... पहले हम देखते हैं कि “ट्वीटोपाध्याय, क्रान्तिकारीभूषण, स्वराज-प्रतिपादक, झाड़ूधारी, IIT-दीक्षित, सिनेमा रिव्यू लेखक, सलीम उर्फ योगेन्द्रमारक, 49 दिवसीय भगोड़े, निर्भया बलात्कारी प्रेमी, अर्थात युगपुरुष श्रीश्रीश्री अरविन्द केजरीवाल के मामले को... जिस दिन सीबीआई ने दिल्ली में राजिंदर कुमार के दफ्तर पर छापा मारा, उस दिन केजरीवाल को कतई अंदाजा नहीं था कि कभी ऐसा भी हो सकता है. परन्तु सीबीआई अपने पूरे कानूनी दस्तावेजों के साथ आई और उसने “आप” सरकार के प्रमुख सचिव राजिंदर कुमार के यहाँ छापा मारा. ऐसा नहीं है कि उस दिन अकेले राजिंदर कुमार के दफ्तर पर छापा पड़ा हो, बल्कि सीबीआई 2002 से लेकर 2012 तक के बीच दिल्ली में हुए कई घोटालों की जाँच पहले से कर रही थी, इसलिए उस दिन नौ और बड़े अफसरों के यहाँ छापा मारा गया. परन्तु ईमानदारी की कसमें खाने वाले, भ्रष्टाचार निर्मूलन के वादे करने वाले राजा हरिश्चंद्र के अंतिम अवतार उर्फ अरविन्द केजरीवाल से यह सहन नहीं हुआ. उन्होंने बिना सीबीआई से कोई बातचीत किए, बिना अदालती कागज़ देखे, मामले की पड़ताल किए बिना ही सुबह दस बजे से ताबड़तोड़ ट्वीट के गोले दागने शुरू कर दिए. केजरीवाल क्रोध में इतने अंधे हो गए कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद की गरिमा को किनारे रखते हुए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुने हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “कायर” और “मनोरोगी” तक कह डाला (यही वह केजरीवाल थे, जो कुछ दिनों पहले भाजपा को “असहिष्णुता” के मुद्दे पर लेक्चर दे रहे थे). किसी को समझ नहीं आया कि आखिर केजरीवाल के इतना बिलबिलाने की वजह क्या थी. असल में सीबीआई के इस छापे ने केजरीवाल की “कथित ईमानदार” वाली छवि (जो उन्होंने अन्ना हजारे के साथ पहले साँठगाँठ करके, फिर उन्हीं की पीठ में छुरा घोंपकर बड़ी मुश्किल से रची है) को बुरी तरह तार-तार कर दिया. आगे बढ़ने से पहले हमें यह देखना होगा कि आखिर राजिंदर कुमार कौन हैं, और क्या चीज़ हैं? जनता को जितना पता है, वह यह है कि राजिंदर कुमार 1989 बैच के IAS अधिकारी हैं, सरकार में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं. लेकिन CBI छापों से पहले यह बात कम लोग जानते थे कि राजिंदर कुमार IIT खडगपुर से पढ़े हुए हैं और केजरीवाल के खास दोस्तों में से एक हैं. लेकिन केजरीवाल के बिलबिलाने की एकमात्र वजह मित्रता नहीं, बल्कि उनकी “गढी हुई छवि” के ध्वस्त होने की चिंता है. बहरहाल, सीबीआई ने जो छापा मारा वह राजिंदर कुमार द्वारा 2007 से 2014 के बीच उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों को लेकर था. इस कालावधि के दौरान पहले पाँच ठेकों में साढ़े नौ करोड़ के भ्रष्टाचार की शिकायत सीबीआई को मिली थी. इन ठेकों में दिल्ली जल बोर्ड का 2.46 करोड़ का वह ठेका भी शामिल है, जिसे राजिंदर कुमार ने पहले शासकीय सार्वजनिक कम्पनी ICSIL कंपनी को दिया, लेकिन उस कम्पनी ने “रहस्यमयी” तरीके से यह ठेका फरवरी 2014 में एन्डेवर सिस्टम्स नामक कंपनी को दे दिया. यह वही समय था, जब केजरीवाल अपनी 49 दिनों की सरकार से भागने की तैयारी में थे और राजिंदर कुमार उनके सचिव थे. यह एन्डेवर सिस्टम्स नाम की कम्पनी 2006 में बनाई गई जिसके चार निदेशक थे योगेन्द्र दहिया, विकास कुमार, संदीप कुमार और दिनेश गुप्ता. आगे चलकर दहिया और विकास कुमार ने इस्तीफ़ा दे दिया और कम्पनी संदीप कुमार और दिनेश गुप्ता के पास 80% - 20% की भागीदारी में बनी रही. लेकिन इस भ्रष्टाचार की परतें उस समय खुलनी शुरू हुईं, जब दिल्ली संवाद आयोग के सदस्य एक अफसर आशीष जोशी ने दिल्ली पुलिस की भ्रष्टाचार निवारण शाखा में लिखित आवेदन दिया. दिल्ली पुलिस ने मामले की गंभीरता और उलझन को देखते हुए यह आवेदन सीबीआई को सौंप दिया. आशीष जोशी वही अधिकारी हैं जिन्हें दिल्ली सरकार ने काम के दौरान गुटखा खाने के “भयानकतम आरोप” के तहत निकाल बाहर किया था. जबकि उन्हें निकालने की असल वजह यह थी कि आशीष जोशी, दिल्ली संवाद आयोग के उपाध्यक्ष आशीष खेतान की मनमानी और ऊटपटांग निर्णयों के सामने झुकने को तैयार नहीं थे और इसे लेकर खेतान से एक बार उनकी तीखी झड़प भी हुई थी. चूँकि आशीष खेतान, केजरीवाल के खासुलखास हैं इसलिए ईमानदार अफसर आशीष जोशी को हटाने के लिए “गुटखे” का बहाना खोजा गया. सीबीआई ने मामले की तहकीकात की और आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी के आरोपों पर राजिंदर कुमार, संदीप कुमार व दिनेश गुप्ता पर मामला दर्ज कर लिया. सीबीआई द्वारा दर्ज रिपोर्ट में ICSIL के एमडी एके दुग्गल, जीके नंदा और आरएस कौशिक के नाम भी शामिल हैं.जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि ICSIL ने अपनी साख के चलते कई सरकारी ठेके हासिल किए, लेकिन रहस्यमयी तरीके से उसने ये सारे ठेके सिर्फ और सिर्फ एंडेवर सिस्टम्स को ट्रांसफर कर दिए. सूत्रों के अनुसार जब राजिंदर कुमार दिल्ली सरकार में सचिव थे, तब उन्होंने ही इस कम्पनी एंडेवर सिस्टम्स को ज़ोरशोर से बड़ी रूचि लेकर आगे बढ़ाया. इसी को आधार बनाकर सीबीआई ने एंडेवर सिस्टम्स और राजिंदर कुमार के आपसी रिश्तों और रूचि को लेकर जाँच शुरू की और पाया कि जब राजिंदर कुमार स्कूली शिक्षा विभाग में सचिव रहे तब भी उन्होंने पाँच ठेके एन्डेवर सिस्टम्स कम्पनी को दिलवाए थे. जिसमें 2009 में बिना कोई टेंडर निकाले डाटा मैनेजमेंट सिस्टम का चालीस लाख का एक ठेका, फिर 2010 में स्वास्थ्य सचिव रहते हुए ICSIL के माध्यम से 2.43 करोड़ का एक ठेका, 2012 में टैक्स कमिश्नर के पद पर रहते हुए सॉफ्टवेयर विकास का 3.66 करोड़ का एक ठेका तथा 2013 में इसी कम्पनी को 45 लाख का एक और ठेका दिलवाने में राजिंदर कुमार की खासी रूचि रही. “खले रहस्य” की बात यह कि जब-जब और जहाँ-जहाँ राजिंदर कुमार पद पर रहे, उन सभी विभागों से एंडेवर सिस्टम्स को ही ठेके मिल जाते थे. राजिंदर कुमार के खिलाफ लगातार दबी ज़ुबान से शिकायतें मिलती रहती थीं, परन्तु केजरीवाल का वरदान उन पर होने के कारण कोई खुलकर कुछ नहीं बोलता था. 2009 से 2014 के बीच ऊर्जा, रियल एस्टेट, कोचिंग, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट इत्यादि के नाम पर धीरे-धीरे कई कम्पनियाँ खड़ी की गईं. इन सभी कंपनियों के मालिकों का पता एक जैसा था और इन कंपनियों के निदेशक भी एक जैसे ही थे, और जाँच में पाया गया कि अधिकाँश निदेशकों के नाते-रिश्ते राजिंदर कुमार के साथ जुड़े हुए थे. तो ऐसे “उम्दा कारीगर” यानी राजेंदर कुमार, अरविन्द केजरीवाल के खास चहेते अफसर थे.ऐसे “कर्मठ”(??) अफसर के साथ ईमानदारी की प्रतिमूर्ति बने बैठे केजरीवाल का मधुर सम्बन्ध इतना अधिक मधुर था कि विश्वव्यापी भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संस्था “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” ने जब केजरीवाल को बाकायदा लिखित में यह बताया कि राजेंदर कुमार एक दागी अफसर हैं और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, तो केजरीवाल ने राजिंदर कुमार को हटाना तो दूर, इस पत्र का कोई जवाब तक नहीं दिया. और जब ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने इस पत्र की प्रति उप-राज्यपाल नजीब जंग को भेजकर उनसे कार्रवाई की माँग की तो केजरीवाल ने इसे अपने अधिकारों में हस्तक्षेप बता दिया. कहने का तात्पर्य यह है कि केजरीवाल द्वारा प्रधानमंत्री के प्रति “कायर-मनोरोगी” जैसे शब्द उपयोग करना इसी बौखलाहट का नतीजा है कि मेरे परम मित्र को सीबीआई ने हाथ कैसे लगाया? जबकि राजिंदर कुमार की (कु)ख्याति रही है कि वे जिस विभाग में भी पदस्थ हुए, वहीं उन्होंने नए विवादों को जन्म दिया. फिर चाहे VAT कमिश्नर के रूप में उनके तुगलकी आदेश हों, अथवा ऊर्ज सचिव के रूप में निजी विद्युत कंपनियों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर वित्तीय संस्थानों से ऋण हासिल करने की सलाह देना हो... अथवा ऊर्जा मंत्री सत्येन्द्र जैन से मिलीभगत करके तत्कालीन ऊर्जा सचिव शकुंतला गैम्लिन को धमकाने का मामला हो... सभी जगह राजिंदर कुमार की टांग फँसी हुई दिखाई देती है, लेकिन केजरीवाल ऐसे अधिकारी को बेगुनाह साबित करने के लिए कभी सीबीआई, कभी अरुण जेटली तो कभी प्रधानमंत्री को कोसने में लगे हुए हैं, जबकि सीबीआई ने न्यायालय की अनुमति से छापा मारा था. होना तो यह चाहिए था कि केजरीवाल खुद आगे बढ़कर यह कहते कि चूँकि मैंने अपनी “क्रान्ति” भ्रष्टाचार के खिलाफ ही की है, इसलिए मैं जाँच में पूर्ण सहयोग करूँगा. लेकिन ऐसा कहते ही केजरीवाल खुद अपने ही चक्रव्यूह में घिर जाते कि जब छह माह पहले ही उन्हें बताया जा चुका था कि राजिंदर कुमार के खिलाफ पिछले कई मामलों में जाँच हो रही है तथा “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” भी उन्हें चेतावनी दे चुका है फिर भी उन्होंने ऐसे अफसर को अपना प्रमुख सचिव क्यों नियुक्त किया? अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि केजरीवाल अपनी छवि के मोह में ऐसे फँसे हुए हैं कि वे खुद को ऐसे “मिडास” समझने लगे हैं कि वे जिस व्यक्ति को छू दें, वह ईमानदार माना जाएगा. और बिना किसी सबूत के सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस में जिस पर आरोप मढ़ देंगे वह दोषी माना जाएगा. दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले शीला दीक्षित के खिलाफ 370 पृष्ठों का सबूत होने का दावा केजरीवाल ने किया था, परन्तु अभी तक शीला के खिलाफ कोई मुकदमा दायर होना तो दूर, दिल्ली सरकार ने उन्हें क्लीन चिट तक दे दी है.  असल में केजरीवाल की दूसरी चिंता सिर पर खड़े पंजाब चुनाव भी हैं. चूँकि केजरीवाल की महत्त्वाकांक्षा सिर्फ दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने की नहीं है, उनके लक्ष्य ऊँचे हैं. इसीलिए उन्होंने दिल्ली में खुद के पास कोई विभाग नहीं रखा है, वे देश के अकेले मुख्यमंत्री हैं जिनके पास कोई काम नहीं है, सिवाय दूसरों के फटे में टांग अडाने के. चूँकि कोई काम नहीं है, इसलिए वे कभी गुजरात जाकर भ्रष्टाचार खोजते हैं तो कभी बनारस जाकर चुनाव लड़ते हैं तो कभी फिल्मों के रिव्यू लिखते रहते हैं. यहाँ तक कि बिहार जाकर लालू जैसे “घोषित एवं साक्षात भ्रष्टाचार” से गले मिलने में भी केजरीवाल को कतई शर्म महसूस नहीं होती, परन्तु केजरीवाल के पास नौटंकी करने, चिल्लाचोट करने, तमाशा और हंगामा करने का तथा मीडिया का ध्यान आकर्षित करने जो “गुण” मौजूद है, उसके कारण हमेशा वे खुद को पीड़ित-शोषित और ईमानदारी के एकमात्र जीवित मसीहा के रूप में पेश करते आए हैं. परन्तु उन्होंने सोचा भी नहीं था कि ऐन उनकी नाक के नीचे बैठे मुख्य सचिव पर सीबीआई हाथ डाल देगी. सूत्रों के अनुसार सीबीआई को राजिंदर कुमार के दफ्तर से “आआपा” सरकार के दो अन्य मंत्रियों के खिलाफ भी कुछ तगड़े सबूत हाथ लगे हैं, और इसी बात ने अरविन्द केजरीवाल को अंदर तक हिला दिया है और इस कारण उस दिन वे अंट-शंट ट्वीट करने लगे. पंजाब के चुनावों में केजरीवाल के पास “खुद के हस्ताक्षरित” ईमानदारी सर्टिफिकेट के अलावा और कोई सकारात्मक बात नहीं है. चूँकि पंजाब की जनता अकालियों के भ्रष्टाचार, भाजपा के निकम्मेपन और नशीले पदार्थों के रूप में फैले सामाजिक कोढ़ से बुरी तरह त्रस्त हो चुकी है. इसलिए वहाँ आम आदमी पार्टी के बहुत उजले अवसर हैं. ऐसे में केजरीवाल यह जानते हैं कि दिल्ली में सीबीआई का यह छापा, राजिंदर कुमार की भ्रष्ट छवि तथा नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा उन्हें ख़ासा नुक्सान पहुँचा सकती है. इसीलिए मामले को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए उन्होंने सदा की तरह हंगामे, आरोपों और प्रेस कांफ्रेंस को अपना हथियार बनाया है. यह कितना काम करेगा, अभी से कहना मुश्किल है, परन्तु वे जानते हैं कि पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों में यदि एक शक्ति के रूप में उभरना है तो उन्हें जल्दी से जल्दी इस प्रकरण में अपने हाथ साफ़ करने होंगे. इसलिए देशवासी आगामी कुछ माह तक नित नई नौटंकियाँ झेलने को अभिशप्त है.  खैर यह तो हुई “चोर मचाए शोर” एपिसोड की पहली कथा... अब देखेंगे इसी सीरीज की दूसरी कथा अर्थात “उल्टा चोर, कोतवाल को डांटे” टाईप नेशनल हेरल्ड और सोनिया-राहुल गाँधी का मामला. जो कि इस लेख के अगले भाग में जारी रहेगी... तब तक, जय झाड़ू, जय चन्दा, जय (बे)ईमानदारी...अगले भाग को पढ़ने के लिए (यहाँ क्लिक करें...)

Posted on: 30 December 2015 | 11:30 pm

Sonia Rahul and National Herald Corruption Case

चोर मचाए शोर (भाग - २) पिछले भाग (यहाँ क्लिक करके पढ़ें) में आपने पढ़ी “चोर मचाए शोर” एपिसोड की पहली कथा... अब देखेंगे इसी सीरीज की दूसरी कथा अर्थात “उल्टा चोर, कोतवाल को डांटे” टाईप नेशनल हेरल्ड और सोनिया-राहुल गाँधी का मामला.केजरीवाल का मामला तो उनके सचिव से जुड़ा हुआ था, लेकिन नेशनल हेरल्ड मामले में तो सीधे-सीधे सोनिया गाँधी और राहुल फँसते नज़र आ रहे हैं. डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी के बारे में उनके दोस्त व दुश्मन दोनों एक बात जरूर कहते हैं, कि स्वामी जी को कभी भी हलके में नहीं लेना चाहिए, वे हमेशा गंभीरता से हर लड़ाई लड़ते हैं. परन्तु देश के कांग्रेसी तीर्थस्थल उर्फ “पवित्र परिवार” (यानी ऐसा परिवार, जिस पर देश में कोई उँगली नहीं उठा सकता) ने हमेशा डॉक्टर स्वामी को मजाक में लिया और यह सोचते रहे कि यह अकेला आदमी क्या कर लेगा जिसकी ना तो कोई अपनी राजनैतिक पार्टी है और ना ही कोई राजनैतिक रसूख. इसीलिए पिछले दस-बारह वर्ष से लगातार काँग्रेस ने डॉक्टर स्वामी के आरोपों की सिर्फ खिल्ली उड़ाई, क्योंकि काँग्रेस को विश्वास था कि उनके खिलाफ कोई सबूत ला ही नहीं सकता, भारत में प्रशासन से लेकर न्यायपालिका तक उनके “स्लीपर सेल” समर्थक इतने ज्यादा हैं, कि उन्हें आसानी से कानूनी जाल में फँसाया ही नहीं जा सकता, परन्तु गाँधी परिवार यह भूल गया कि डॉक्टर स्वामी भी हारवर्ड शिक्षित हैं, ख्यात अर्थशास्त्री हैं, चीन और रूस में उन्हें गंभीरता से सुना जाता है तथा उनका पिछला इतिहास भी सदैव उठापटक वाला रहा है, चाहे वह राजीव गाँधी की हत्या का मामला हो, चंद्रास्वामी का केस हो, जयललिता से दुश्मनी हो अथवा वाजपेयी सरकार को गिराने के लिए उसी जयललिता को साधना हो... डॉक्टर स्वामी हमेशा तनी हुई रस्सी पर आराम से कसरत कर लेते हैं. इसीलिए सन 2012 में जब एक सार्वजनिक सभा में राहुल गाँधी ने तत्कालीन जनता पार्टी अध्यक्ष डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी को यह धमकी दी कि यदि उन्होंने नेशनल हेरल्ड मामले में अपनी बयानबाजी जारी रखी तो वे उन पर मानहानि का मुकदमा दायर कर देंगे, राहुल ने आगे कहा कि उन पर तथा सोनिया गाँधी पर स्वामी के सभी आरोप मिथ्या, दुर्भावनापूर्ण और तथ्यों से परे हैं. उस समय एक और दरबारी जनार्दन द्विवेदी ने यह कहा था कि प्रत्येक लोकतांत्रिक देश के समाज में ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जो ऊटपटांग बकवास करते रहते हैं, कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता... तब सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि यदि काँग्रेस में हिम्मत है तो मुझ पर मानहानि का दावा करे, मैं सिद्ध कर दूँगा कि सोनिया-राहुल ने “यंग इन्डियन” नामक कंपनी बनाकर नेशनल हेराल्ड की समूची संपत्ति (जो कि लगभग 5000 करोड़ है) हड़प कर ली है. उसके बाद काँग्रेसी खेमे में चुप्पी छा गई और आज चार वर्ष बाद जब निचली अदालत ने गाँधी परिवार को “समन” जारी किए और अदालत में पेशी रुकवाने के लिए सोनिया-राहुल ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की तो उल्टा हाईकोर्ट ने इस मामले में “प्रथमदृष्टया आपराधिक षड्यंत्र” होने की टिप्पणी भी इसमें जोड़ दी तथा काँग्रेस को जोर का झटका, धीरे से दे दिया. नेशनल हेरल्ड का यह मामला अभी भी जिनकी जानकारी में नहीं है, आगे बढ़ने से पहले मैं उन्हें संक्षेप में समझा देता हूँ कि आखिर रियल एस्टेट की यह “सबसे बड़ी लूट” किस तरह से की गई. १) पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आजादी से पहले 1938 में नेशनल हेरॉल्‍ड अखबार की स्थापना की थी. वर्ष 2008 में इसका प्रकाशन बंद हो गया. इस अखबार का स्वामित्व एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) नाम की कम्पनी के पास था, जिसे कांग्रेस से आर्थिक कोष मिलता था. देश उस समय आज़ाद नहीं हुआ था. २) समय के साथ धीरे-धीरे यह अखबार और इसकी साथी पत्रिकाएँ कुप्रबंधन के कारण बन्द होती चली गईं, परन्तु देश में लगातार काँग्रेस की सत्ता होने के कारण इस अखबार को देश के कई प्रमुख शहरों में मौके की जमीन और इमारतें “समाजसेवा” के नाम पर लगभग मुफ्त दी गईं. अखबार का घाटा बढ़ता ही गया और एक समय आया जब 2008 में यह बन्द हो गया. ३) इसके बाद 2011 में “यंग इन्डियन” नामक गैर-लाभकारी (Section 25) कंपनी बनाई गई, जिसके 76% शेयर मालिक सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी हैं, बाकी के शेयर मोतीलाल वोरा, सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के पास हैं. 26 फरवरी 2011 को बन्द हो चुकी कम्पनी अर्थात AJL (Associated Journal Limited) के बोर्ड ने प्रस्ताव पास किया कि वे काँग्रेस पार्टी से शून्य ब्याज दर पर नब्बे करोड़ का ऋण लेकर अपनी समस्त देनदारियाँ चुकाएँगे. वैसा ही किया गया, जबकि क़ानून के मुताबिक़ कोई राजनैतिक पार्टी किसी निजी कम्पनी को ऋण नहीं दे सकती. ४) काँग्रेस पार्टी द्वारा की गई इस “कृपा” के बदले में AJL कम्पनी ने अपने नौ करोड़ शेयर (दस रूपए प्रति शेयर) के हिसाब से नब्बे करोड़ रूपए “यंग इन्डियन” कंपनी के नाम ट्रांसफर कर दिए और इसके मूल शेयरधारकों को इसकी सूचना भी नहीं दी (यह भी कम्पनी कानूनों के मुताबिक़ अपराध ही है). इस प्रकार सिर्फ पचास लाख रूपए से शुरू की गई कंपनी अर्थात “यंग इन्डियन” देखते ही देखते पहले तो नब्बे करोड़ की वसूली की अधिकारी हो गई और फिर AJL की सभी संपत्तियों की मालिक बन बैठी.  डॉक्टर स्वामी ने न्यायालय में मूल सवाल यह उठाया है कि गठन के एक माह के भीतर ही सोनिया-राहुल की मालिकी वाली यंग इन्डियन कम्पनी, AJL की मालिक कैसे बन गई? अपना नब्बे करोड़ का ऋण चुकाने के लिए AJL कम्पनी ने अपनी देश भर में फ़ैली चल संपत्तियों का उपयोग क्यों नहीं किया, जबकि बड़े आराम से ऐसा किया जा सकता था, क्योंकि AJL के पास वास्तव में 5000 करोड से अधिक की संपत्ति है. सिर्फ दिल्ली के भवन की कीमत ही कम से कम 500 करोड़ है. असल में यह सारा खेल काँग्रेस के वफादार मोतीलाल वोरा को आगे रखकर खेला गया है और परदे के पीछे से सोनिया-राहुल इसमें सक्रिय भूमिका निभा रहे थे. अब मजा देखिये... AJL के प्रबंध निदेशक “मोतीलाल वोरा” ने, यंग इन्डियन के 12% शेयरधारक “मोतीलाल वोरा” से कहा कि वे काँग्रेस के कोषाध्यक्ष “मोतीलाल वोरा” से ऋण दिलवाएँ और फिर AJL के “मोतीलाल वोरा” ने यंग इन्डियन के “मोतीलाल वोरा” को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए समस्त ऋणों के चुकता करने के बदले में अपने समस्त शेयर (बिना इसके शेयरधारकों की अनुमति के) ट्रांसफर कर दिए, और इस तरह यंग इन्डियन के 76% मालिक अर्थात सोनिया-राहुल AJL की विराट संपत्ति के मालिक बन बैठे और यह सब कागज़ों पर ही हो गया, क्योंकि लेने वाला, बेचने वाला, अनुमति देने वाला और फायदा उठाने वाला सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे थे. नेशनल हेरॉल्‍ड अखबार के “मास्टहेड” के ठीक नीचे उद्देश्य वाक्य लिखा रहता था - ‘फ्रीडम इज इन पेरिल, डिफेंड इट विद ऑल योर माइट (अर्थात आज़ादी खतरे में है, अपनी पूरी ताकत से इसकी रक्षा करो). यह वाक्य एक पोस्टर से उठाया गया था, जिसे इंदिरा गांधी ने ब्रेंटफोर्ड, मिडिलसेक्स से नेहरू जी को भेजा था. यह ब्रिटिश सरकार का पोस्टर था. नेहरू को यह वाक्य इतना भा गया कि इसे उन्होंने अपने अखबार के माथे पर चिपका दिया. दुर्भाग्य है कि नेहरू के वारिस तमाम बातें करते रहे, पर उन्होंने जानबूझकर इस अखबार और उसके संदेश को कभी गंभीरता से नहीं लिया. पहले नेहरू की पुत्री ने देश पर आपातकाल थोपा और अब इंदिरा की पुत्रवधू ने बड़ी ही सफाई से पहले तो नरसिंहराव और सीताराम केसरी को निकाल बाहर किया और षड्यंत्रपूर्वक नेहरू की इस विरासत पर कब्ज़ा कर लिया. “नेशनल हेरॉल्‍ड”, “नवजीवन” और “कौमी आवाज” की मिल्कियत वाले एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड की परिसंपत्तियों की कीमत एक हजार से पांच हजार करोड़ तक आंकी जा रही है. इस कंपनी के पास दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, इंदौर, भोपाल और पंचकूला में जमीनें और भवन हैं. ये सभी संपत्तियां इन शहरों के मुख्य इलाकों में स्थित हैं - दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग पर मूल्य और आकार के अनुसार सबसे बड़ी संपत्ति है, जहां एक लाख वर्ग फुट में पांच-मंजिला भवन बना है. इस संपत्ति की कम-से-कम कीमत 500 करोड़ रुपये है. इसकी दो मंजिलें विदेश मंत्रालय और दो मंजिलें टीसीएस ने किराये पर लिया है, जिनमें पासपोर्ट संबंधी काम होते हैं. ऊपरी मंजिल खाली है, जिसे “यंग इंडियन कंपनी” ने अपने जिम्मे ले रखा है. इस भवन से हर साल सात करोड़ रुपये की आमदनी होती है. (जो पता नहीं किसके खाते में जाती है).  - लखनऊ के ऐतिहासिक कैसरबाग में स्थित भवन से तीन भाषाओं में अखबार छपते थे. इस दो एकड़ जमीन पर 35 हजार वर्ग फुट में दो भवन हैं. अभी एक हिस्से में राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा इंदिरा गांधी नेत्र चिकित्सालय एवं शोध संस्थान संचालित किया जाता है. यहां से निकलनेवाले संस्करण 1999 में बंद हो गये.  - मुंबई के बांद्रा में अखबार को 3,478 वर्ग फुट जमीन 983 में दी गयी थी. यह जमीन अखबार निकालने और नेहरू पुस्तकालय एवं शोध संस्थान बनाने के लिए दी गयी थी, लेकिन 2014 में इस जमीन पर 11-मंजिला वाणिज्यिक भवन बना दिया गया है. नियम के अनुसार गैर-लाभकारी संस्था को आवंटन के तीन वर्षों के अंदर भवन बना लेना चाहिए था, जिसका उपयोग सिर्फ मूल उद्देश्य के लिए किया जा सकता था. इसमें 14 कार्यालय और 135 कार पार्किंग हैं. एक लाख वर्ग फुट से अधिक के कार्यालय क्षेत्र के इस संपत्ति की कीमत करीब 300 करोड़ रुपये है. इसका किराया और दुकानों-दफ्तरों की बिक्री का पैसा किसके खाते में गया किसी को नहीं मालूम. - इसी प्रकार पटना के अदालतगंज में दी गयी जमीन खाली पड़ी है और फिलहाल उस पर झुग्गियां बनी हुई हैं. इस प्लॉट की कीमत करीब सौ करोड़ है. इस पर कुछ दुकानें बनाकर बेची भी गयी हैं. - पंचकूला में 3,360 वर्ग फुट जमीन अखबार को 2005 में हरियाणा सरकार ने दी थी. इस पर अभी एक चार-मंजिला भवन है जो अभी हाल में ही बन कर तैयार हुआ है. इस संपत्ति की कीमत 100 करोड़ आंकी जाती है. - इंदौर की संपत्ति इस लिहाज से खास है कि यहां से अब भी नेशनल हेरॉल्‍ड एक फ्रेंचाइजी के जरिये प्रकाशित होता है. एबी रोड पर 22 हजार वर्ग फुट के इस प्लॉट की कीमत करीब 25 करोड़ है. भोपाल के एमपी नगर में हेरॉल्‍ड की जमीन को एक कांग्रेसी नेता ने फर्जी तरीके से एक बिल्डर को बेच दिया था, जिसने उस पर निर्माण कर उन्हें भी बेच दिया था. इसकी कीमत तकरीबन 150 करोड़ आंकी जाती है. तात्पर्य यह है कि AJL की तमाम संपत्तियों के रखवाले(??) यंग इण्डियन तथा काँग्रेस के लेन-देन और खातों की गहराई से जाँच की जाए तो पता चल जाएगा कि कितने वर्षों से यह गड़बड़ी चल रही है, और अभी तक इस लावारिस AJL नामक भैंस का कितना दूध दुहा जा चुका है. काँग्रेस और सोनिया-राहुल पर यह संकट इसलिए भी अधिक गहराने लगा है कि अब इस लड़ाई में AJL के शेयरधारक भी कूदने की तैयारी में हैं. प्रसिद्ध वकील शांतिभूषण भी एक शेयरधारक हैं और उन्होंने कम्पनी एक्ट के तहत मामला दायर करते हुए पूछा है कि कंपनी की संपत्ति और शेयर बेचने से पहले शेयरधारकों से राय क्यों नहीं ली गई? उन्हें सूचित तक नहीं किया गया. इसी प्रकार मार्कंडेय काटजू के पास भी पैतृक संपत्ति के रूप में AJL के काफी शेयर हैं, और वे भी इस घोटाले से खासे नाराज बताए जाते हैं. जब नेशनल हेरल्ड की स्थापना हुई थी, उस समय जवाहरलाल नेहरू के अलावा, कैलाशनाथ काटजू, रफ़ी अहमद किदवई (मोहसिना किदवई के पिता), कृष्णदत्त पालीवाल, गोविन्दवल्लभ पंत (केसी पंत के पिता) इसके मूल संस्थापक थे. वर्तमान में AJL के 1057 शेयरधारक हैं, जिनमें से एक को भी नहीं पता कि इस कंपनी की संपत्ति को लेकर मोतीलाल वोरा, सोनिया-राहुल, सैम पित्रोदा, सुमन दुबे और ऑस्कर फर्नांडीस ने परदे के पीछे क्या गुल खिलाए हैं. अब तक तो पाठकगण समझ ही गए होंगे कि किस तरह बड़े ही शातिर तरीके से यह सारा गुलगपाड़ा किया गया. डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी को जब यह भनक लगी तब उन्होंने अपने निजी स्तर पर खोजबीन आरम्भ की और कई तथ्य उनके हाथ लगे, जिसके आधार पर उन्होंने न्यायालय में 2012 में मामला दायर किया, उस समय स्वामी जनता पार्टी के अध्यक्ष थे, भाजपा से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था. दस्तावेजों की जाँच-पड़ताल के बाद 26 जून 2014 को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट गोमती मनोचा ने सभी को समन्स जारी किए और उन्हें 7 अगस्त 2014 को अदालत में पेश होने का आदेश दिया. अपने निर्णय में मजिस्ट्रेट ने कहा कि प्रथमदृष्टया साफ़ दिखाई देता है कि “यंग इण्डियन” कम्पनी का गठन सार्वजनिक संपत्ति और AJL को निशाने पर रखकर किया गया तथा सभी कंपनियों एवं संस्थाओं में मौजूद व्यक्तियों के आपसी अंतर्संबंध मामले को संदेहास्पद बनाते हैं”. पेशी पर रोक लगवाने हेतु सोनिया-राहुल ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हुआ उल्टा ही. सात दिसंबर 2015 के अपने आदेश में न्यायाधीश सुनील गौड़ ने ‘कांग्रेस द्वारा एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को ब्याज-मुक्त कर्ज देने और 90 करोड़ के कर्ज को यंग इंडियन को देने’ पर सवाल खड़ा किया, जिसका आधार यह था कि कांग्रेस के पास धन सामान्यतः चंदे के द्वारा आता है और उस कर्ज को AJL की परिसंपत्तियों के द्वारा चुकाया जा सकता था. न्यायाधीश ने कहा कि ‘इसमें अपराध की बू है, धोखाधड़ी की गंध है’, और “इसलिए इसकी पूरी पड़ताल जरूरी है” अतः आरोपियों को कोर्ट में पेशी से छूट नहीं दी जा सकती. अब, जबकि दो भिन्न-भिन्न न्यायाधीश अपने न्यायिक ज्ञान के प्रयोग द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो इसे राजनीतिक बदला कैसे कहा जा सकता है? परन्तु काँग्रेस इसे यही रंग देने में लगी हुई है... जबकि हकीकत यह है कि डॉक्टर स्वामी किसी की सुनते नहीं हैं, वे अपने मन के राजा हैं और “वन मैन आर्मी” हैं, फिर भी काँग्रेस की पूरी कोशिश यही है कि नेशनल हेरल्ड मामले को नरेंद्र मोदी से जोड़कर इसे “राजनैतिक बदला” कहकर भुनाया जाए. दरअसल, काँग्रेस इस समय सर्वाधिक मुश्किल में फँसी हुई है. जहाँ एक तरफ उसका कैडर राहुल गाँधी की भविष्य की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाने के मूड में दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ यूपीए-२ के काले कारनामे लंबे समय तक उसका पीछा छोड़ने वाले नहीं हैं. अगले दस वर्ष में काँग्रेस के कई नेताओं को भारत की “महीन पीसने वाली चक्की” अर्थात न्यायपालिका के चक्कर लगाते रहने पड़ेंगे, और जब आगाज़ ही सोनिया-राहुल से हुआ है तो अंजाम कैसा होगा? चूँकि भारत के मतदाता न सिर्फ भोलेभाले और भावुक होते हैं, बल्कि वे जल्दी ही माफ भी कर देते हैं. ऐसे में यदि चुनावी मंचों से सोनिया गाँधी सिर पर पल्ला लेकर और आँखों में आँसू लेकर जनता से कहेंगी कि नरेंद्र मोदी उन्हें झूठा ही फँसा रहे हैं तो महँगाई से त्रस्त ग्रामीण मतदाता का बड़ा हिस्सा काँग्रेस की भावनाओं में बह सकता है. 44 सीटों पर सिमटने के बाद लोकसभा में काँग्रेस के पास खोने के लिए कुछ है नहीं, सौ साल पुरानी पार्टी अब इससे नीचे क्या जाएगी? इसलिए काँग्रेस की रणनीति यही है कि कैसे भी हो सोनिया-राहुल की अदालत में पेशी को राजनैतिक रंग दिया जाए, इसीलिए आठ दिनों तक संसद को भी बंधक बनाकर रखा गया और पेशी के वक्त भी जमकर नौटंकी की गई. कुछ जानकारों को उस समय आश्चर्य हुआ जब सोनिया-राहुल ने जमानत लेने का फैसला किया. परन्तु यह भी काँग्रेस की रणनीति का ही भाग लगता है कि चूँकि फिलहाल किसी भी बड़े राज्य में तत्काल विधानसभा चुनाव होने वाले नहीं हैं, तथा यह सिर्फ पहली ही पेशी थी और अभी मामला विधाराधीन है, आरोप भी तय नहीं हुए हैं. इसलिए अभी जमानत से इनकार करके जेल जाने का कोई राजनैतिक लाभ नज़र नहीं आता था. हमारी धीमी न्याय प्रक्रिया के दौरान अभी ऐसे कई मौके आएँगे जब इस मामले में सोनिया-राहुल खुद को “शहीद” और “बलिदानी” सिद्ध करने का मौका पा सकेंगे, बशर्ते डॉक्टर स्वामी के पास सबूतों के रूप में कोई “तुरुप के इक्के” छिपे हुए ना हों. इस तरह जमानत लेने और जेलयात्रा नहीं करने का फैसला एक “सोचा-समझा जुआ” लगता है, जिसे उचित समय आने पर भुनाने की योजना है, तब तक राज्यसभा में अपने बहुमत की “दादागिरी” के बल पर मोदी सरकार को सभी महत्त्वपूर्ण बिल और कानूनों को पास नहीं करने दिया जाए, ताकि जनता के बीच सरकार की छवि गिरती रहे.  लब्बेलुआब यह है कि जहाँ एक तरफ केजरीवाल अपनी सनातन नौटंकियाँ जारी रखेंगे, छापामार आरोप लगाते रहेंगे, केन्द्र-दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर नित-नए ड्रामे रचते रहेंगे, और दिल्ली में एक अच्छी सरकार देने की बजाय अपने मंत्रियों एवं समर्थकों पर लगने वाले प्रत्येक आरोप को आंतरिक लोकपाल द्वारा निपटाने लेकिन “मोदी” से जोड़ने की कोशिश जरूर करेंगे... वहीं दूसरी तरफ गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे काँग्रेसी अपनी “रानी मधुमक्खी” पर क़ानून की आँच आती देखकर उत्तेजित होंगे, एकजुट होंगे तथा और अधिक कुतर्क करेंगे. कुल मिलाकर बात यह है कि आगामी दो वर्ष के भीतर होने वाले पंजाब, बंगाल, उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड के विधानसभा चुनाव बड़े ही रंगीले किस्म के होंगे, जहाँ भारतवासियों को नए-नए दांवपेंच, नई-नई रणनीतियाँ, विशिष्ट किस्म की नौटंकियाँ देखने को मिलेंगी...

Posted on: 30 December 2015 | 11:30 pm